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vishesh aalekh

  • Feb 12 2019 8:59AM
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बिहार तरक्की की राह पर तेजी से बढ़ रहा आगे, हवाई यात्री व वाहन बढ़े, पैसे जमा करने की आदत भी बढ़ी

बिहार तरक्की की राह पर तेजी से बढ़ रहा आगे, हवाई यात्री व वाहन बढ़े, पैसे जमा करने की आदत भी बढ़ी
बिहार तरक्की की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है. बेहतर योजनाएं और उनका समय पर क्रियान्वयन इस तरक्की के माध्यम बने हैं. सरकार की कोशिशों और विभागीय सक्रियता ने राज्य की तस्वीर खुशनुमा बना दी है. बिहार की विकास दर 2017-18 में 11.3 प्रतिशत रही. जो देश में सबसे ज्यादा है. आर्थिक सर्वेक्षण पर रिपोर्ट...
 
आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में बढ़ते बिहार की दिखी तस्वीर
 
राज्य में हवाई यात्रा करने वालों की संख्या तेजी से बढ़ रही है. आर्थिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट में यह बात सामने आयी कि वित्तीय वर्ष 2016-17 के दौरान 21 लाख 12 हजार यात्रियों ने हवाई यात्रा किया. जबकि 2017-18 में यह संख्या बढ़ कर 31 लाख 11 हजार हो गयी. इसमें करीब 50 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. वित्तीय वर्ष 2018-19 के दौरान सितंबर तक 20 लाख 59 हजार लोग हवाई यात्रा कर चुके हैं. इससे विमानों की उड़ान संख्या में भी बढ़ोतरी हुई है. 2016-17 के दौरान 15 हजार 508 विमानों ने उड़ानें भरी. अगले साल यह संख्या बढ़कर 24 हजार 479 हो गयी. 
 
वाहनों की संख्या में भी बढ़ोतरी
 
राज्य में सभी तरह के वाहनों की संख्या में तेजी से बढ़ोतरी हुई है. इसमें सबसे ज्यादा दो पहिया वाहनों की संख्या बढ़ी है. 2016-17 के दौरान सात लाख 64 हजार नये वाहन खरीदे गये. 2017-18 के दौरान यह संख्या बढ़ कर 11 लाख 18 हजार हो गयी. एक साल में नये वाहनों की संख्या में करीब साढ़े तीन लाख की बढ़ोतरी हुई है. सबसे ज्यादा दो पहिया वाहनों की संख्या बढ़ी है. 2016-17 में पांच लाख 93 हजार दो पहिया वाहन खरीदे गये. इनकी संख्या में 2017-18 के दौरान नौ लाख 29 हजार की बढ़ोतरी हुई. 
 
मोबाइल रखने में दूसरा नंबर
 
मोबाइल फोन रखने के मामले में बिहार का देश में दूसरा स्थान है. बिहार में प्रति 100 लोगों की आबादी पर फोन घनत्व (टेली डेनसिटी) 221 कनेक्शन या नंबर का है. देश में सबसे ज्यादा टेली डेनसिटी केरल का 260 है. 
 
यह आंकड़ा बिहार के शहरी क्षेत्रों का है. हालांकि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिति बिलकुल अलग है. यहां यह घनत्व 44 है, जो राष्ट्रीय घनत्व 59 से भी कम है. दूसरी तरफ राज्य में पोस्ट ऑफिस की संख्या नौ हजार 47 है, जिसमें आठ हजार 590 (95 फीसदी) डाक घर ग्रामीण और 457 (5 प्रतिशत) शहरी इलाकों में मौजूद हैं. देश की कुल जनसंख्या का 8.6 प्रतिशत बिहार में मौजूद है. फिर भी डाक घरों का प्रतिशत महज 5.8 प्रतिशत है. 
 
बैंकों में जमा राशि 7.2% बढ़ी
 
बिहार के बैंकों 2017-18 के दौरान राशि जमा करने में 7.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है. पिछले साल की तुलना में 21 हजार 242 करोड़ रुपये बैंकों में ज्यादा जमा हुए हैं. इसके मुकाबले बैंकों से कर्ज देने की रफ्तार 11.7 प्रतिशत है. बैंकों ने 10 हजार 636 करोड़ के अधिक ऋण इस दौरान बांटे हैं. बैंकों ने वार्षिक क्रेडिट प्लान का 90.8 प्रतिशत लक्ष्य 2017-18 के दौरान हासिल किया था. मार्च 2018 तक बैंकों से 77 लाख 35 हजार स्वयं सहायता समूह सीधे तौर पर जुड़ गये हैं. 
 
छह साल में बढ़ गयी तीन साल औसत आयु
 
राज्य मानव विकास में खूब तरक्की कर रहा है. आर्थिक सर्वेक्षण को आधार मानें तो शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर काम हुआ है. मानव विकास के क्षेत्र में  बिहार का औसत देश के औसत से अधिक है. इसका परिणाम यह है कि छह साल में बिहार के लोगों की औसत आयु में दो साल नौ महीने की वृद्धि हुई है.  2006-10  की अवधि में औसत आयु 65.8  वर्ष थी. 2012-16 में यह बढ़कर 68.7 वर्ष हो गयी है. 
 
2011-12 की तुलना में  2017-18 में प्रति व्यक्ति विकास व्यय भी 15.8% से बढ़ा है. इस अवधि में शिक्षा पर व्यय 10,214 करोड़ रुपये से बढ़कर 26,394 पर पहुंच गया. यह राष्ट्रीय औसत 12.5 से 1.9% ज्यादा है. अस्पतालों में होने वाली संस्थागत प्रसव में भी 16.3% की वृद्धि हुई है. 12 से 23 माह के बच्चों के टीकाकरण 29% बढ़ा है.  सरकार ने वृद्ध ,विधवा और निशक्तजनों के लिये पैसे की कमी नहीं होने दी. इस मद में 2016-17 में 2797.22 करोड़ खर्च था.  2017-18 में 28% अधिक 3692.41 करोड़ रु. खर्च किया गया. 
 
प्रारंभिक शिक्षा में रजिस्ट्रेशन बढ़ा, ड्राॅप आउट 9.5% घटा
 
बेसिक शिक्षा में उत्साहजनक सुधार हुआ है. प्रारंभिक कक्षाओं में 2.3 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ा है. वर्ष 2012-13 के 214.87 लाख से बढ़कर  2016 17 में 235.64 लाख हो गया है. ड्राॅप आउट की दर भी 31.7 प्रतिशत की दर से घटकर 22.2 फीसदी हो गयी है.  प्रारंभिक शिक्षा में लैंगिक अंतराल घट रहा है क्योंकि 2012-13 से  2016-17  के बीच लड़कियों की नामांकन की वृद्धि दर 2.3  फीसदी थी. जबकि लड़कों की 2.2 प्रतिशत ही थी.
 
शहरों का हुआ विकास राज्य में 10 वर्षों में. पटना के बाद नालंदा, शेखपुरा, बेगूसराय, भागलपुर व मुंगेर में शहरीकरण पांच प्रतिशत से अधिक और कैमूर, शिवहर, मधुबनी, समस्तीपुर, बांका, सुपौल और मधेपुरा में शहरीकरण का स्तर पांच प्रतिशत से कम रहा. 
 
राज्य की कुल शहरी आबादी में अकेले पटना का 14 प्रतिशत हिस्सा है और उसके बाद गया शहर का चार फीसदी. आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 में बताया गया है कि बिहार में शहरीकरण का राष्ट्रीय स्तर से काफी कम है. यहां आबादी की तुलना में सिर्फ 11.3 प्रतिशत लोग ही शहर में रहते हैं. राष्ट्रीय स्तर पर आबादी के 31.2 प्रतिशत है.
 
सालाना दर से सूचना व संचार प्रौद्योगिकी 
 
पिछले पांच साल में विकास हुआ. 16 विश्वविद्यालयों, 273 अंगीभूत महाविद्यालयों, तीन इंजीनियरिंग कॉलेज, नौ मेडिकल कॉलेज, आठ कृषि विश्वविद्यालयों व 10 अन्य शैक्षणिक संस्थानों व नव निर्मित संस्थानों में वाइ-फाइ हॉटस्पॉट के जरिये मुफ्त इंटरनेट उपलब्ध कराया जा रहा है.
घंटे का क्लास युवाओं के लिए सभी जिलों में चलाया जा रहा.  नवंबर, 2018 तक 1726 केंद्र खोले गये. दस लाख 81 हजार 832, प्रशिक्षण पूरा करने वाले युवाओं की संख्या पांच लाख एवं प्रमाण पत्र पाये गये कुल आवेदकों की संख्या चार लाख 20 हजार 439 है. यह राज्य सरकार के सात निश्चय में से एक आर्थिक हल युवाओं का बल योजना के तहत हो रहा है.
 
पर्यटक 2018 सितंबर तक बिहार में आये. इनमें विदेशी पर्यटक 7700 और देशी पर्यटक 1,87200 हैं. बिहार को वैश्विक व घरेलू स्तर पर आकर्षित बनाने के लिए पर्यटन विभाग ने केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय के साथ मिलकर विभिन्न पर्यटन स्थलों पर जनसुविधाओं को बढ़ाया है. पर्यटन विभाग ने राज्य में आठ पर्यटन सर्किट की पहचान की है.
 
ड्रॉप आउट घटा है. यह दर 31.7% की दर से घटकर 22.2% हो गयी है.  प्रारंभिक शिक्षा में लैंगिक अंतराल घट रहा है क्योंकि 2012-13 से  2016-17  के बीच लड़कियों की नामांकन की वृद्धि दर 2.3%  थी. जबकि लड़कों की 2.2% ही थी. प्रारंभिक कक्षाओं में 2.3% की वार्षिक दर से बढ़ा है. वर्ष 2012-13 के 214.87 लाख से बढ़कर  2016-17 में 235.64 लाख हो गया है. 
 
बढ़ गये हैं सांस की तकलीफ वाले रोगी, जो मरीजों की संख्या के लिहाज से सर्वाधिक हैं. 2018 में श्वसन रोग से पीड़ित लोगों की संख्या 12.80 लाख है. बीमारियों में दूसरे स्थान पर अज्ञात प्रकार का बुखार है. ऐसे नौ लाख मरीज अस्पताल में पहुंचे. इस दौरान डायरिया से पीड़ित 4.20 लाख बच्चों का इलाज किया गया. कुत्ता काटने के बाद अस्पताल में 3.70 लाख मरीज पहुंचे. बच्चों के न्यूमोनिया में भी कमी हुई है
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कृषि

कृषि आधारित उद्योगों की विकास दर हुई पांच गुनी
 
राज्य में चीनी का उत्पादन बढ़ा है. राज्य की चीनी मिलें औसतन 125 दिन चालू रहीं. राज्य की 11 चीनी मिलों में नौ निजी क्षेत्र में और दो सार्वजनिक क्षेत्र में हैं. सोमवार को विधानसभा में पेश आर्थिक सर्वेक्षण  2018-19 के अनुसार राज्य में ईख का उत्पादन बढ़ा है. 
 
2017-18 में 747.89  लाख क्विंटल ईख की पेराई हुई, जो पिछले साल की तुलना में 176.75 लाख क्विंटल अधिक है. राज्य में साल 2017-18 में 71.54 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ,  जबकि 2016-17 में 52.48 लाख टन चीनी का उत्पादन हुआ था.  राज्य में कृषि आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है. राज्य में कृषि आधारित उद्योगों की विकास दर 19.2 प्रतिशत है. यह देश के सभी राज्यों द्वारा हासिल 3.6% विकास दर  की लगभग पांच गुना है. राज्य में उद्योग के बजट में भी बढ़ोतरी हुई है. 
 
सुधर रही शिक्षा

20.77 लाख बच्चे पहुंचे स्कूल
 
बिहार सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को पटरी पर लाने की गंभीरता दिखायी तो परिणाम भी सामने आये. पिछले पांच सालों में 20.77 लाख बच्चों को स्कूल लाने में सरकार को कामयाबी मिली है. वर्ष 2012-13 से 2016-17 के बीच प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्कूलों में नामांकन का प्रतिशत 2.3 वार्षिक दर से बढ़ा है. स्कूल जाने वाले बच्चों की संख्या 2012-13 में 214.87 लाख से बढ़कर 2016-17 में 235.64 लाख हो गया. आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट में दावा है कि छह से 14 वर्ष उम्र के सभी बच्चों का प्रारंभिक कक्षाओं में नामांकन हो चुका है.
 
स्कूलों में नामांकन कराने में छात्राएं रहीं आगे : सरकारी स्कूलों में 
 
नामांकन कराने में लड़कों को लड़कियों ने पीछे छोड़ दिया है. पांच सालों के आंकड़ों पर गौर करें तो प्राथमिक विद्यालयों में लड़कियों के नामांकन का वृद्धि दर 1.2% रहा है. 
 
वहीं, लडकों का 1.1 प्रतिशत है. ये आंकड़े 2012-13 से 2016-17 के बीच के हैं. यह फासला उच्च प्राथमिक कक्षाओं में और बढ़ जाता है. प्रारंभिक शिक्षा के इस हिस्से में लड़कों का नामांकन 4.8% की दर से बढ़ा है, जबकि लड़कियों का 5.2% की दर से.
 
 बिजली खपत में सात साल में सौ फीसदी की बढ़ोतरी
 
राज्य में ऊर्जा के क्षेत्र में काफी सुधार हुआ है. मांग और आपूर्ति में जबर्दस्त उछाल आया है. आर्थिक सर्वेक्षण 2018-19 के अनुसार पिछले सात साल में बिजली खपत में  100% की बढ़ोतरी हुई है. राज्य में साल 2011-12 में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 134 किलोवाट प्रति घंटा थी जो 2017-18 में बढ़कर 280 किलोवाट हो गयी. राज्य में बिजली का उत्पादन और खरीद साल 2013-14 में 1400.2 करोड़ यूनिट था जो साल 2017-18 में 2555.9 करोड़ यूनिट हो गया. बिजली की बिक्री बढ़ने से राजस्व भी बढ़ा है. राज्य में 2017-18 में बिजली की चरम मांग 4965 मेगावाट  रही जबकि आपूर्ति 4535 मेगावाट रही. 
 
बिजली की उपलब्धता 165 फीसदी बढ़ी : राज्य में बिजली की मांग पूरा करने के मामले में काफी सुधार हुआ है. बिजली की उपलब्धता  2011-12 के 1712 मेगावाट से बढ़कर  2017-18 में 4535 मेगावाट हो गया. बिजली की उपलब्धता सात साल में 165% बढ़ी है. बिजली की औसत उपलब्धता ग्रामीण क्षेत्रों  में  6-8 घंटा से बढ़कर 18-20 घंटा हो गयी. जबकि शहरी क्षेत्र में यह 10-12 घंटे से बढ़कर 22-24 घंटा हो गयी. राज्य में कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 3889 मेगावाट थी. इसमें सेंट्रल पुल का हिस्सा 79.1% था. 
 
बिजली खपत में पटना अव्वल : बिजली खपत के मामले में साल 2017-18 में पटना जिला पहले पायदान पर रहा. पटना जिले में 496.5 करोड़ यूनिट बिजली की खपत हुई. इसके बाद गया में 152.2  और नालंदा में 100.8 करोड़ यूनिट बिजली की खपत हुई.  बिजली खपत में तीन जिले शिवहर (7.6 करोड़ यूनिट), अरवल (13.5 करोड़ यूनिट)  और शेखपुरा (17.7 करोड़) बिजली खपत में पीछे रहे.
 
खेती-किसानी
चावल-सब्जी की पैदावार में वृद्धि
 
राज्य में अनाज उत्पादन में 4.4 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ोतरी हुई है. सर्वाधिक बढ़ोतरी मक्का और चावल में हुई है. 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार मक्का  के उत्पादन में छह प्रतिशत और चावल के पैदावार में चार प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गयी. वित्तीय वर्ष 2013-14 में अनाज का उत्पादन 15.72 लाख टन था, जो 2017-18 में बढ़ कर 17.35 लाख टन हो गया. हालांकि दलहन और तेलहन का उत्पादन घटा है. 
 
आर्थिक सर्वेक्षण में इस पर चिंता जतायी गयी है. साल 2013-14 में मक्का का उत्पादन 2.9 लाख टन था, जो 2017-18 में बढ़ कर 3.23 लाख टन हो गया. राज्य में मोटा अनाज बाजरा, जौ और ज्वार का भी उत्पादन बढ़ा है. अनाज उत्पादन की बढ़ोतरी में तकनीक का बड़ा योगदान है. राज्य के भोजपुर, रोहतास और अरवल जिले में चावल की उत्पादकता अन्य जिलों की तुलना में अधिक है. 
 
गेहूं उत्पादन में बक्सर, रोहतास और पूर्वी चंपारण अव्वल रहा, जबकि मुंगेर, किशनगंज और अरवल  में कम उत्पादन रहा.  मक्का उत्पादन में कटिहार, समस्तीपुर और पूर्णिया  अव्वल रहा.राज्य में फल और सब्जी की खेती में भी बढ़ोतरी हुई है. साल 2015-16 में राज्य में 142.42 लाख टन सब्जी का उत्पादन हुआ था. 2017-18 में यह बढ़ कर 148.12 लाख टन हो गया. 2017-18 में राज्य में 3.09 लाख हेक्टेयर में फलों की खेती हुई थी. इससे 42.29 लाख टन फल का उत्पादन हुआ था. राज्य में दूध का उत्पादन भी बढ़ा है. 
 
सड़क
सात सालों में तीन गुना बढ़ा निवेश
 
राज्य में पिछले सात वर्षों में सड़क क्षेत्र में भारी निवेश हुआ है. रोड सेक्टर में सार्वजनिक निवेश सात साल के दौरान 16.3 प्रतिशत की दर से बढ़ा है. 
 
बजट भी बढ़ा है. 2012-13 के 5998 करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में बजट अनुमान  17585 करोड़ पहुंच गया. सड़क क्षेत्र में सात साल में तिगुनी बढ़ोतरी हुई है. ग्रामीण सड़कों  पर तो सार्वजनिक निवेश लगभग 30 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ा है. 2012-13 के 1874 करोड़ रुपये से बढ़कर 2018-19 में 9799 करोड़ हो गया. वर्ष 2004-05 से 2016-17 के बीच देश में बिहार का राष्ट्रीय और राज्य उच्च पथों के अतिरिक्त निर्माण के मामले में छठा और अन्य सड़कों के मामले में पांचवां स्थान रहा था. 
 
बिहार प्रति 100  वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल पर सड़कों की लंबाई के मामले में केरल और पश्चिम बंगाल के बाद तीसरे स्थान पर  है. राज्य में अभी 4917 किमी एनएच, 4006  किमी एसएच, 12357  किमी  मुख्य जिला पथ  और 129473  किमी ग्रामीण सड़क है. 2004-05 और 2016-17 के बीच एनएच में 1302  किमी और एसएच में 1871  किमी तथा अन्य सड़कों में 1.229 लाख  किमी की बढोतरी हुई. राज्य में सड़कों के रखरखाव पर भी सरकार का फोकस है. 
 
19 जिलों में एनएच की लंबाई नहीं बढ़ी : राज्य में सितंबर 2018 तक 43 एनएच थे जिसकी लंबाई 4917 किलोमीटर है. 2014 में राज्य में एनएच की संख्या 35 थी और लंबाई 4321 किमी थी. पिछले छह साल में 19 जिलों में राष्ट्रीय उच्च पथों की लंबाई नहीं बढ़ी. हालांकि तीन जिलों में सबसे अधिक लंबाई बढ़ी है. एमएमजीएस में 6144 करोड़ खर्च कर 8607 किलोमीटर और जीटीएसएनवाइ में 533 करोड़ से 674 किलोमीटर सड़क का निर्माण कराया गया.
 
ऐसे कम होता गया राजकोषीय घाटा
 
राज्य  ने बेहतर वित्तीय प्रबंधन का परिचय देते हुए अपने राजकोषीय घाटा को  एफआरबीएम एक्ट के  तीन प्रतिशत के मानक के अंदर रखा है. 
 
वर्तमान में यह 2.9  प्रतिशत है. सरकार का प्राथमिक घाटा 2016-17 के दौरान 8,289  करोड़ था, जो 2017-18 में घटकर पांच हजार 251 करोड़ हो गया. इस कारण सकल  राजकोषीय घाटा 2016-17 के 16 हजार 480 करोड़ से घटकर 2017-18 में 14 हजार  305 करोड़ पर पहुंच गया. इस कमी आने के कारण ही राजकोषीय घाटा तीन फीसदी के अंदर नियंत्रित हो पाया है. 
 
राज्य टैक्स संग्रह बढ़ा 70 प्रतिशत, केंद्रीय मदद भी बढ़ी : राज्य  के सभी आंतरिक टैक्स संग्रह स्रोतों में बढ़ोतरी दर्ज की गयी है. टैक्स  संग्रह में  2013-14 के दौरान 19,961 करोड़ प्राप्त हुए थे. 2017-18  के दौरान यह बढ़कर 23,742 करोड़ हो गया. इसी वित्तीय वर्ष के दौरान  गैर-टैक्स संग्रह में बढ़ोतरी 1545 करोड़ से बढ़कर 3,507  करोड़ रुपये हो गयी है. 
 
वित्तीय वर्ष 2013-14 के दौरान कुल राजस्व  संग्रह 68,919 करोड़ हुआ था, जो 2017-18 के दौरान एक लाख 17  हजार 447 करोड़ हो गया. इसमें 70% की बढ़ोतरी है. केंद्रीय टैक्स पुल से राज्य को मिलने वाली हिस्सेदारी में भी बढ़ी है. इस मद में 2013-14 के दौरान 34,829 करोड़ रुपये मिले थे, जो  2017-18 में बढ़कर 65083 करोड़ हो गया. केंद्र प्रायोजित योजनाओं में  मिलने वाले ग्रांट में भी दोगुना बढ़ोतरी हुई है. 
एफआरबीएम मानक को 3.5 प्रतिशत करने की मांग
 
वित्त  मंत्री ने कहा कि एफआरबीएम एक्ट के मानक को तीन फीसदी से बढ़ाकर साढ़े तीन  प्रतिशत करने की मांग 15वीं वित्त आयोग से की गयी है. बिहार ने अपने  राजकोषीय घाटा को सकल घरेलू उत्पाद के तीन फीसदी के दायरे में रखकर इस मानक  को बनाये रखा, लेकिन आंध्र प्रदेश, केरल और पश्चिम बंगाल जैसे नौ राज्यों  का राजकोषीय घाटा तीन फीसदी से कहीं ज्यादा है. 
 
ये राज्य रेवेन्यू डिफिसिट  वाले राज्यों की श्रेणी में हैं. इस वजह से 14वें वित्त आयोग ने इन राज्यों  के बीच एक लाख 94 हजार करोड़ रुपये रेवेन्यू डिफिसिट ग्रांट के रूप में  वितरित किये हैं. अगर बिहार का भी राजकोषीय घाटा अधिक होता, तो उसे इसके  तहत ग्रांट मिलता. परंतु बेहतर वित्तीय प्रबंधन के कारण बिहार को यह ग्रांट  नहीं मिला. हालांकि इस तरह के ग्रांट को खत्म करने की सिफारिश वित्त आयोग  से की गयी है.
 
मामले ही 2018 -19 में दूसरी विवाह के दर्ज हुए हैं. सामाजिक सशक्तीकरण के अंतर्गत संचालित महिला हेल्प लाइन में 2016-17 में 88, 2017-18 में 101 मामले दर्ज किये गये थे. कार्यालय और अन्य स्थानों पर यौन उत्पीड़न के मामले भी कम हुए हैं. 2016-17 में 98, 2017-18 में 148 मामले आये. चालू साल में सितंबर तक 68 मामले ही दर्ज हुए हैं. मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना के तहत सरकार घरेलू हिंसा और मानव व्यापार की शिकार महिला और किशोरियों को मुफ्त सामाजिक-मनोवैज्ञानिक और कानूनी सहायता उपलब्ध करायी जा रही है. राज्य में 38 हेल्प लाइनों में 24 घंटे सेवा दी जा रही है.
 

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