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vishesh aalekh

  • Feb 9 2019 2:35AM
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दरगाह में वसंत पंचमी

दरगाह में वसंत पंचमी

 सूफीवाद का सिर्फ एक ही सिद्धांत है - इंसान चाहे किसी भी मजहब, जाति या रंग का हो, सभी की सेवा करना. सूफी संत की शांति और एकता का 13वीं सदी का संदेश आज भी मायने रखता है. समाज में बहुत अधिक ध्रुवीकरण होने के बावजूद दरगाह ने हमेशा सभी धर्मों के लोगों और उनके विचारों को स्थान दिया है.

इसी की मिसाल है हजरत निजामुद्दीन औलिया का दरगाह, जहां पर वसंत पंचमी पूरे हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है. यह परंपरा 700 वर्षों से जारी है. यह हमारी गंगा-जमुनी तहजीब का हिस्सा है. यह हमें एकजुट करता है. इसके संदेश को फैलाने की जरूरत है. मौसम और त्योहारों को धर्म से ऊपर उठ कर देखा जाना चाहिए और यही रिवाज निजामुद्दीन दरगाह पर भी सालों से वसंत का रंग चढ़ता रहा है. इसके पीछे दिलचस्प दास्तां है. 

 करीब 700 साल पहले जब हजरत निजामुद्दीन औलिया अपने भतीजे की मौत के बाद उदास रहने लगे थे. हजरत निजामुद्दीन अविवाहित थे, लेकिन उन्हें अपने भाई-बहनों के बच्चों से गहरा प्रेम था. उनका एक भतीजा तकीउद्दीन नूह उनकी बहन जैनब का बेटा था. उन्हें उससे बहुत लगाव था और जब उनके उस चहेते भतीजे की मौत हो गयी, तो निजामुद्दीन को बड़ा सदमा लगा. वे उदास रहने लगे. संत के शिष्य अपने गुरु की इस हालत को देख बहुत चिंतित थे और उन्हें खुश करने के तरीके खोजने लगे.
 
एक दिन कवि अमीर खुसरो कुछ सूफी दोस्तों के साथ सैर पर थे. उन्होंने रास्ते में मीरा महिलाओं के एक समूह को सरसों के फूल ले जाते हुए देखा, जो चटक पीले रंग के कपड़े पहने मस्त हो कर गाते-बजाते-नाचते जा रहे थे, जहां आज हुमायूं का मकबरा है. इस माहौल ने खुसरो का मन मोह लिया. उन्होंने भक्तों से वजह पूछी, तो पता चला कि वह ज्ञान की देवी सरस्वती को खुश करने के लिए उन पर पर सरसों के फूल चढ़ाने जा रही हैं.
 
 अमीर खुसरो ने उनसे इस तरह के मीरा के पहनावे का कारण पूछा. महिलाओं ने कहा कि आज वसंत पंचमी है और वे मंदिर जा रही हैं. तब खुसरो ने भी अपने गुरु को खुश करने के लिए पीली पोशाक पहन ली और ढोलक बजाते हुए निजामुद्दीन के पास जाकर नाचने लगे. जानकार मानते हैं कि खुसरो महिला की तरह कपड़े पहने थे.
 
उनका यह रूप व अंदाज हजरत निजामुद्दीन के होठों पर एक मुस्कान ले आया. तब निजामुद्दीन ने उनसे पूछा कि तुम इस तरह से कपड़े क्यों पहने हो? खुसरो ने जवाब दिया कि आपके चेहरे पर मुस्कान वापस लाने के लिए.
 
 तब से जब तक खुसरो जीवित रहे, वसंत पंचमी का त्योहार मनाते रहे. खुसरो के देहांत के बाद भी चिश्ती सूफियों द्वारा हर साल निजामुद्दीन औलिया की दरगाह पर यह त्योहार मनाया जाने लगा और आज तक वसंत पंचमी के दिन हर साल निजामुद्दीन की दरगाह पर यह परंपरा कायम है.
 
 वरिष्ठ पत्रकार मेहर मुर्शीद अपनी किताब- 'सॉन्ग ऑफ दरविश : निजामुद्दीन औलिया- द सेंट ऑफ होप एंड टॉलरेंस' में लिखते हैं कि वसंत को हर साल निजामुद्दीन की दरगाह पर मनाया जाता है, जिस दिन खुसरो को दुख और अवसाद की गहराई से अपने गुरु की मुस्कान वापस मिली.
 
  दरगाह पर एक पीरजादा और निजामुद्दीन के प्रत्यक्ष 21वीं पीढ़ी के वंशज अल्तमश निजामी के मुताबिक इस दिन दरगाह द्वारा वसंत पंचमी के लिए पीले रंग की पोशाक का दान किया जाता है और हजारों भक्त पीले रंग के कपड़े पहनकर व सरसों के फूल लेकर दिल्ली के संत का अभिवादन करते हैं, जिन्होंने अपने जीवनकाल में एक हिंदू वसंत उत्सव में खुशी पायी थी. 
 
3 अप्रैल, 1325 को निजामुद्दीन औलिया दुनिया से रुख्सत हो गये. निजामुद्दीन औलिया के जाने के छह महीने बाद ही खुसरो ने भी अपने प्राण त्याग दिया. उन्हें औलिया की मजार के पास ही दफ्न कर दिया गया.
 
 निजामुद्दीन ने एक बार अपने शिष्यों से कहा कि 'हर कौम रास्त राहे, दीन-ओ किबला गाहे' (अर्थ : हर मजहब का अपने-अपने मक्का जाने का रास्ता साफ है) तात्पर्य है कि प्रत्येक विश्वास का ईश्वर को खोजने का अपना तरीका है. बाद में अमीर खुसरो की कविता में यह देखा गया- 'मन किबला रास्त करदम बार सिम्त कजकुलाहे' (अर्थ : मैं तो अपना सारा ध्यान उस तिरछी टोपीवाले (निजामुद्दीन औलिया) में ही लगाता हूं.
 
 
भारतीय अंतरात्मा में निज़ामुद्दीन की दरगाह के महत्व का अंदाजा इस घटना से लगाया जा सकता है कि विभाजन की अशांति के दौरान जब दरगाह पर सांप्रदायिक हमले की आशंका थी, तब तत्कालीन गृह मंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल ने व्यक्तिगत रूप से दरगाह का दौरा किया और अपने सहयोगियों को कहा कि 'हमें संत के पास जाना चाहिए, इससे पहले कि दरगाह और इसके लोगों को कोई नुकसान पहुंचे, ताकि हम उनकी नाराजगी को समझ सकें'. 
ताज खान
 
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