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vishesh aalekh

  • Mar 17 2019 6:47AM
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उम्मीदवारों के दाग ढूंढ़ते रह जाओगे

उम्मीदवारों के दाग ढूंढ़ते रह जाओगे
राजीव कुमार, राज्य समन्वयक एडीआर 

मतदाता को होनी चाहिए वोटिंग से पहले प्रत्याशी की पृष्ठभूमि की जानकारी 
 
सुप्रीम कोर्ट के  पांच जजों की संविधान पीठ ने कहा कि सिर्फ आरोपों के आधार पर किसी को चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता. कानून बनाने  वालों पर गंभीर अपराध के केस नहीं होने चाहिए. उन्हें रोकना संसद का काम है. संसद ऐसे कानून लाये कि अपराधी चाह कर भी पब्लिक लाइफ में न आ सकें. न्यायालय ने  पांच निर्देश भी दिये.  
 
ताकि, मतदाता को वोटिंग से पहले प्रत्याशी की पृष्ठभूमि का पता चल सके. प्रत्याशी को अपनी पृष्ठभूमि समाचारपत्र और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिये तीन बार बतानी होगी. चुनाव आयोग के फार्म में मोटे अक्षरों में लिखना होगा कि उसके खिलाफ कितने आपराधिक मामले हैं.  उसे इस फार्म में हर पहलू की जानकारी देनी होगी. 
 
किसी भी सवाल को छोड़ा नहीं जा सकता.  पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ रहा है तो उसे मामलों की जानकारी पार्टी को भी देनी होगी.  पार्टी को अपने प्रत्याशियों को आपराधिक पृष्ठभूमि की जानकारी अपनी वेबसाइट पर डालनी होगी.  ताकि, वोटर  उम्मीदवार की पृष्ठभूमि से अनजान न रहे. 
 
 चुनाव आयोग ने भी उम्मीदवारों को चेतावनी देते हुए कहा कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान आपराधिक रिकॉर्ड के ब्योरे सहित विज्ञापन नहीं देने वाले उम्मीदवारों को अदालत की अवमानना की 
 
कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है. अपने प्रतिद्वंंदियों के बारे में गलत आपराधिक रिकॉर्ड प्रकाशित करवाने वालों पर भ्रष्ट तरीके से इस्तेमाल करने के आरोप में जुर्माना लगाया जायेगा. 
 
चुनाव मैदान में किस्मत आजमा रहे प्रत्याशियों को निर्वाचन अायोग ने यह चेतावनी दी है. गौरतलब है कि पिछले बार के पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के दौरान कोर्ट के आदेश पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाया.  
 
अब लोकसभा चुनाव 2019 सामने है. 18 मार्च से नामांकन की प्रक्रिया प्रारंभ होने वाली है. कोर्ट का आदेश था कि उम्मीदवार कम-से-कम तीन बार अखबार और टीवी चैनल में प्रचार कर अपनी आपराधिक पृष्ठभूमि का ब्योरा देंगे. कोर्ट के आदेश के आयोग ने एक अधिसूचना तो जारी की लेकिन उसमें यह नहीं बताया कि किस स्तर के अखबारों में उम्मीदवार इस तरह की  प्रचार करेंगे.  
 
ऐसे में उम्मीदवार किसी भी छोटे-मोटे अखबार में ब्योरा देकर खानापूरी कर सकते हैं. टीवी चैनल में समय तय न होने के कारण देर रात इस बारे में प्रचार किया जा सकता है. नेशनल इलेक्शन वाच के अध्ययन भी इसी ओर इशारा करते हैं.
 
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव के दौरान विभिन्न अखबारों में प्रकाशित तीन दर्जन से अधिक विज्ञापनों के अध्ययन में पाया गया कि ज्यादातर विज्ञापन छोटे अखबारों या  कम विज्ञापन दर वाले अखबारों में छपे है. आयोग ने अपने निर्देश में अखबारों के सर्कुलेशन के प्रमाण को लेकर कुछ नहीं कहा है. आयोग का निर्देश है कि अखबार व्यापक सर्कुलेशन वाला हो. अखबारी दुनिया में इसकी व्याख्या अस्पष्ट है.  टीवी विज्ञापनों के बारे में आम राय है कि कब विज्ञापन आया,  पता ही नहीं चल पाता है.  
 
कुछ विज्ञापनों को देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल था कि कि ये विज्ञापन था या स्टोरी के भीतर का बॉक्स.  अध्ययन में यह भी देखा गया कि ज्यादातर विज्ञापन अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण माने जाने वाले बायीं ओर के पन्ने पर छापे गये. ऐसे में अखबारों से दागी उम्मीदवारों को ढूंढ पाना मुश्किल है. 

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