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vishesh aalekh

  • Jul 19 2019 10:18AM
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कुंड़ुख भाषा साहित्य को जानने के लिए जरूरी किताब

कुंड़ुख भाषा साहित्य को जानने के लिए जरूरी किताब

महादेव टोप्पो
कुंड़ुख भाषा साहित्य संबंधी विविध जानकारी देने के लिए यह एक उपयोगी व पठनीय पुस्तक है. आशा है भविष्य में कुंड़ुख में और बेहतर किताबें प्रकाशित होंगी और अन्य लेखक भी कुंड़ुख में दूसरे विषयों पर भी किताबें लिखेंगे.

पिछले तीन-चार वर्षों से देखा जा रहा है कि झारखंड में आदिवासी-भाषाओं में इतिहास, लोक कथाओं से लेकर इतिहास और भाषा संस्कृति पर कई तरह की किताबें प्रकाशित हुईं हैं. संभवतः, इसी जागरुकता के कारण ही महेश भगत ने ‘कुंड़ुख कत्था-कत्थपंडी गहि कुन्दुरना अरा परदना ( कुंड़ुख भाषा-साहित्य का उद्भव और विकास)’ लिखा है. सामान्यतः, अब तक किसी आदिवासी भाषा-साहित्य संबंधी अधिकतर किताबें गैर-आदिवासी भाषाओं- हिंदी, बंगला, ओड़िया, मराठी या अंग्रेजी में लिखी मिलती हैं. जैसे संताली साहित्य इतिहास की प्रमुख पुस्तक परिमल हेंब्रम द्वारा बंगला में लिखी गई है. इसी तरह अधिकांश आदिवासी भाषाओं के साथ यही बात लागू होती है. ऐसे में कुंड़ुख भाषा साहित्य के उद्भव और विकास के बारे महेश भगत ने मूल कुंड़ुख में किताब लिखकर सराहनीय प्रयास किया है. इससे न केवल कुंड़ुख साहित्य को मूल कुंड़ुख में लिखने की सहायता मिलेगी बल्कि नयी कुंड़ुख आलोचना शब्दावली का भी विकास होगा जो भविष्य में कुंड़ुख भाषा के विकास का आधार बनेगा.

पुस्तक में कुल पच्चीस खंड हैं, जिसके माध्यम से कुंड़ुख भाषा संबंधी विविध पहलुओं की जानकारी दी गयी है. कुंड़ुख भाषा के विकास संबंधी विभिन्न कार्यों, गतिविधियों को संकलित किया गया है. देशी विदेशी शोधकर्ताओं, लेखकों द्वारा लिखी महत्वपूर्ण किताबों की जानकारी है. कुंड़ुख में लिखे गये गीत, कविता, नाटक, उपन्यास का विवरण है. कुंड़ुख भाषा के विकास के लिए ‘हिंदराजी कुंड़ुख बकलबरिया खोंड़हा’ के अतिरिक्त देशी, विदेशी ऐसी संस्थाओं की चर्चा है, जिन्होंने कुंड़ुख भाषा के विकास के लिए काम किया है या कर रहे हैं.

कुंड़ुख के लिए आयोजित बारह राष्ट्रीय और दो अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन को भी यहां स्थान दिया गया है. कुंड़ुख में अब तक किये गये लगभग पचास पीएचडी डिग्री के लिए कृत शोधकार्यों व शोधकर्ताओं का भी उल्लेख एक अलग खंड में किया गया है. कुंड़ुख में कुछ लघु फीचर फिल्में, डॉक्युमेंट्री फिल्में भी बनीं हैं. कुंड़ुख भाषा के विकास में इनके योगदान की भी चर्चा की गई है और इन फिल्मों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है. आकाशवाणी द्वारा रेडियो वार्ता, कहानी, कविता, निबंध आदि के प्रसारण की चर्चा है. आकाशवाणी रांची द्वारा कुंडुख के प्रचार-प्रसार के लिए कृत कार्यों, प्रसारणों की पुस्तक में चर्चा है. लेकिन, कभी आकाशवाणी रांची द्वारा आदिवासी भाषाओं के सीखने के लिए कार्यक्रम प्रसारित होता था, इस महत्वपूर्ण कार्य की भी चर्चा की जाती तो अच्छा रहता. वैसे आकाशवाणी एवं दूरदर्शन द्वारा कुंड़ुख सहित अन्य आदिवासी और क्षेत्रीय भाषाओं के विकास में योगदान की संभावना हमेशा से बनी हुई है. कुंड़ुख में प्रकाशित पत्रिकाओं के बारे में विवरण है. धुमकुड़िया, आदिवासी, सिनगी दई, नाम कुंड़ुखत, बोलता आदि महत्वपूर्ण पत्रिकाओं का उल्लेख किया गया है. इस तरह हमें पुरखों की सांस्कृतिक, साहित्यिक गतिविधियों की जानकारी तो मिलती है लेकिन वर्तमान में रांची, गुमला, लोहरदगा जैसे कुंड़ुख भाषी शहरों में कुंड़ुख भाषा, साहित्य, संस्कृति की गतिविधियों का न होना खलता है.

प्रायः आदिवासी भाषाओं की किताबों का मुद्रण उचित तरीके से नहीं होता देखा गया है. लेकिन, इस पुस्तक की छपाई, कागज और मुखपृष्ठ आदि का स्तर काफी अच्छा है. फोंट का आकार महीन नहीं है फलतः, यह नवसाक्षर कुंड़ुख भाषियों के लिए पढ़ने में कठिनाई पैदा नहीं करेगा. कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि कुंड़ुख भाषा साहित्य संबंधी विविध जानकारी देने के लिए यह एक उपयोगी व पठनीय पुस्तक है. आशा है भविष्य में कुंड़ुख में और बेहतर किताबें प्रकाशित होंगी और अन्य लेखक भी कुंड़ुख में दूसरे विषयों पर भी किताबें लिखेगे.

-पुस्तक का नाम  कुंड़ुख कत्था-कत्थपंडी गहि कुन्दुरना अरा परदना ( कुंड़ुख भाषा-साहित्य का उद्भव और विकास)

-लेखक  डॉ महेश भगत
-प्रकाशक हिंदराजी कुंड़ुख वकलूरिया खोंड़हा, 202/सी, अर्जुन नगर, नई दिल्ली-29.
-पृष्ठ 140
-मूल्य 200रु.
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