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  • Nov 15 2018 9:32AM
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महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर पढ़ें , ‘आरसी’ होने के मायने...

महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि पर पढ़ें , ‘आरसी’ होने के मायने...

-त्रिपुरारि-


आज 15 नवंबर को मैथिली और हिंदी के महाकवि आरसी प्रसाद सिंह की पुण्यतिथि है. उन्हें रूप, यौवन और प्रेम के कवि के रूप में जाना जाता है. उनका जन्म बिहार के समस्तीपुर में हुआ था. उनकी प्रमुख रचनाएं हैं-माटिक दीप, पूजाक फूल, सूर्यमुखी,कागज की नाव और अनमोल वचन. उनके पौत्र त्रिपुरारि, जो खुद एक युवा शायर और अफ़्साना निगार हैं ने इस मौके पर उनके संग बिताये कुछ पलों को साझा किया है, पढ़ें और जानें अपने इस महाकवि की शख्सीयत को:-


वह गोधुली बेला थी, जब गाँव के ज़्यादातर दरवाज़ों पर घूरा लगाने की तैयारी हो चुकी थी. गाय और भैसें अपनी गर्दन से बंधी घंटियाँ बजाती हुई घर की ओर लौट रही थीं. कुछ ग्वाले मध्यम सुर में गीत भी गा रहे थे. बीच-बीच में दूर कहीं रेडियो पर बज रहे फ़िल्मी गाने की धुन सुनाई पड़ जाती थी. एक तरफ़ सूरज बागमती नदी में डूब रहा था. दूसरी तरफ़, गाँव के पोस्ट ऑफ़िस के सामने हरी घास पर बैठे हुए एक शख़्स के ज़ेहन में कुछ ख़यालात उभर रहे थे. मैंने देखा कि उसके एक हाथ में ‘एम्प्रो’ बिस्कुट का खुला पैकेट था. दूसरे हाथ की अंगुलियों में उलझा हुआ एक बिस्कुट. वह चाहता था कि जीवन और मृत्यु की गुत्थी को सुलझा ले. उसने वक़्त की कमी महसूस हुई.

कुछ बरस बाद ही उसकी सुलगती हुई साँसें अपने आप में सिमट कर बुझ गईं . यह महाकवि आरसी (जिन्हें मैं बाबा कहता हूँ) से मेरी पहली मुलाक़ात की एक धुंधली सी स्मृति है. उस वक़्त मैं सात या आठ बरस का रहा होऊँगा. अ‍ब जब कभी गाँव जाता हूँ लगता है वो आज भी वहीं बैठे हैं. मैं उनकी जानिब क़दम बढ़ाता हूँ. वो अचानक से ग़ायब हो जाते हैं. कहीं कुछ भी दिखाई नहीं देता लेकिन बहुत सी यादें हैं जो सितारों की तरह आँखों के आसमान में दिखाई पड़ती हैं. अपने समय में बाबा की बड़ी धूम थी. उन्हें ‘जीवन-जोश-जवानी’ और ‘आस्था-अर्पण-अध्यात्म’ का का कवि कहा जाता था. एक ऐसा कथाकार, जिसकी कहानियों में वक़्त की महीन बुनावट का बेहतर नमूना मिलता है. एक ऐसा एकांकीकार, जिसके एकांकी नाटकों में सामाजिक, राजनीतिक तथा मनोवैज्ञानिक स्वरूप झलकता है. जिसके ख़िला़फ युवावस्था में ही तत्कालीन पत्रिका ‘युवक’ (संपादक : रामवृक्ष बेनीपुरी) में प्रकाशित रचनाओं में क्रांतिकारी शब्दों का प्रयोग करने पर अंग्रेजी हुकूमत ने गिरफ़्तारी का वारंट जारी कर दिया. जिसने न सिर्फ़ हिंदी भाषा, बल्कि मैथिली भाषा के साहित्य को भी समृद्ध किया. जिसे साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य सम्मानों से नवाज़ा गया. जो देश-प्रदेश की अनेक संस्थाओं एवं सरकार द्वारा समय-समय पर सम्मानित और पुरस्कृत होता रहा. 

यह बात किसी अचरज से कम नहीं कि 74 वर्षों तक (किसी भी कवि के जीवन में सबसे लम्बा रचनाकाल) लगातार लिखने के बावजूद ‘आरसी और उनके साहित्य’ का विवेचन एक व्यापक दृष्टि के तहत नहीं किया गया. आलोचक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ते रहे हैं कि आरसी के लेखन में कोई केंद्रीय भाव नहीं है. उनकी कोई तय विचारधारा या लेखन क्षेत्र नहीं है. एक आलोचक व्यक्तिवादी गीति कविता-धारा (जिसमें आरसी भी शामिल हैं) के बारे में लिखते हैं, “इनके पास जीवन-दृष्टि नहीं थी—न तो पुरानी आध्यात्मिक जीवन-दृष्टि और न नवीन समाजवादी दृष्टि. ये कवि अपने अनुभवों से परिचालित हो रहे थे, उनके अनुभव भावुक हृदय के अनुभव थे. उनकी दृष्टि रोमानी थी, अत: वे व्यक्ति को न तो सामाजिक शक्ति से जोड़ सके न आध्यात्मिक आदर्शों से. जीवन-दृष्टि के अभाव में यह व्यक्तिवादी अनुभव निराशा, मृत्यु की छाया और नियति बोध से ग्रस्त हैं.” मैं इनकी बातों से पूरी तरह सहमत नहीं हूँ. ठीक है कि आरसी (और उस समय के कवियों) के पास जीवन-दृष्टि नहीं थी. लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि जिनके पास जीवन-दृष्टि होती है, उनके पास जीवन नहीं होता. यह बात स्वंय साबित हो जाती है कि आरसी के पास जीवन-दृष्टि न सही, जीवन था. इसीलिए तो हम उन्हें जीवन और यौवन का कवि कहते हैं. दूसरी बात, क्या बिना किसी दृष्टि के कविता सम्भव है? हाँ, आरसी की दृष्टि समय के साथ बदलती रही है, जिसे मैं सकारात्मक पक्ष समझता हूं. आलोचक शायद इस बात से सहमत होंगे कि नदी तभी तक ज़िंदा मानी जाती है, जब तक उसमें प्रवाह है. अपनी रचनाओं में विविधता संजोने वाले आरसी ने गुणात्मक रूप से प्रयोग किए हैं. मुझे लगता है यही विविधता आरसी की सबसे बड़ी ख़ूबी है और सच्चा-सार्थक कवि होने का सबसे बड़ा प्रमाण भी. तीसरी बात, मैं नहीं मानता कि कविता का काम कोई आदर्श स्थापित करना नहीं है. न तो सामाजिक और न आध्यात्मिक. कविता तो सभी आदर्शों-अनादर्शों के पार ले जाती है. जहाँ से कवि की पुकार उठती है. यही पुकार आरसी को ‘उमर ख़य्याम’ की परम्परा से जोड़ती हुई आगे लेकर भी जाती है. जब आरसी कहते हैं : तेरा पथ जाता उधर जहाँ बहती निशिबासर मद-धारा / मेरे हित शूली, दमन, दंड मेरा विश्राम भवन कारा. / करबद्ध सदैव मनाता तू, मेरी मधुशाला रहे अचल. / मैं कहता, मानव की जय हो निर्भय हो जगतीतल सारा. (कलापी) इसी सिलसिले में आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री का कथन उचित मालूम पड़ता हैं, “आरसी का काव्य मर्म-मूल से प्रलम्ब डालियों और पल्लव-पत्र-पुष्पों तक जैसा प्राण-रस संचारित करता रहा है, वह अन्यत्र दुर्लभ है.

किसी एक विषय, स्वर या कल्पना के कवि वह नहीं हैं. उनकी संवेदना जितनी विषयों से जुड़ी हुई है, उनकी अनुभूति जितनी वस्तुओं की छुअन से रोमांचित है, उनका स्वर जितने आरोहों, अवरोहों में अपना आलोक निखारता है, कम ही कवि उतने स्वरों से अपनी प्रतिभा के प्रसार के दावेदार हो सकते हैं.” आरसी ने अपने जीवन काल में जब-जब जो-जो भोगा, लिखा. अडिग चट्टान बनकर उम्र के विभिन्न पड़ावों पर आने वाली बाधाओं का डटकर मुकाबला किया. उम्र भर नियंत्रण के ख़िलाफ आक्रोश ज़ाहिर करते रहे. जीवन को ‘निर्झर’ की तरह जिया. आरसी का साहित्य सच्चे अनुभवों की आग में पकी हुई फसल है. यह बात और है कि उनकी मस्ती से भरी रचनाएँ पाठकों को अधिक प्रिय हैं. आरसी ‘नई दिशा’ शीर्षक कविता में लिखते हैं : तुम मेरी मस्ती को देखो / इतनी मस्ती, इतनी मस्ती / मैं बहका-बहका जाता हूँ. / कुछ का कुछ हूँ सुन लेता मैं / कुछ का कुछ कह जाता हूँ. / जब आती है मौज किसी की / मैं तस्वीर सजा लेता हूँ. / जब उमंग उठती है / मैं ज़ंजीर बजा लेता हूँ. इस मस्ती की एक वजह और भी है. कवि को मालूम है कि जीवन एक यात्रा है और जन्म-मरण दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू है. इस सच से जिसका साक्षात्कार हो चुका हो वही लिख सकता है : सुंदरता अभिशाप विश्व का / सुंदरता वरदान प्रिये / इस क्षणभंगुर सुंदरता पर मत करना अभिमान प्रिये / यौवन के इस प्रखर तरणि को एक दिवस ढल जाना है / मृत्यु ताप लगते ही हिम की / इस छवि को गल जाना है. (कलापी) प्रसिद्ध आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने आरसी की कृति ‘नन्ददास’ के बारे में लिखा है, “रोमांटिक कवियों में कुछ कवि आगे चलकर अध्यात्मवाद की ओर मुड़ गए और आरसी भी उनमें से एक हैं.

निराला ने ‘तुलसीदास’ की जीवन कथा के माध्यम से देशकाल के शर से विंधकर ‘जागे हुए अशेष छविधर’ छायावादी कवि की छवि देखलाकर परम्परा का विकास किया तो कवि आरसी ने ‘नन्ददास’ के माध्यम से परम्परा का पुनरालेखन किया है.”  आरसी की कहानियों को पढ़ते हुए अक्सर जयशंकर प्रसाद का स्मरण हो उठता है, क्योंकि प्रसाद की कहानियों (उदाहरण के लिए ‘पुरस्कार’) में कई जगहों पर प्रेम और बलिदान का द्वंद्व दिखाई देता है. इस बात की पुष्टि हरीश जायसवाल के एक कथन से होती है. हरीश लिखते हैं, “आरसी बाबू की कहानियों में जहाँ प्रेम अपनी ऊँचाई पर दीख पड़ता है वहाँ बलिदान भी अपनी चरम सीमा पर स्थित मालूम होता है. सस्ते रोमांस की कमी उनकी कहानियों को और अधिक निखारने में बहुत हद तक कामयाब हुई है. प्रेम के नाम पर आधुनिक नीचता से कहानी अछूती मालूम होती है जो शुभ है.” सच तो यह है कि आरसी की कहानियों में एक विशेष प्रकार का मनोरंजक तत्व है. इसमें न सिर्फ़ भावना, कल्पना तथा यथार्थ का अद्भुत समन्वय है, बल्कि जीवन का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है. जब हम एकांकी की बात करते हैं, तो इसमें भी भारतीय समाज की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आती है.

उदाहरण के लिए ‘पुनर्मिलन’ और ‘वैतरणों के तीर पर’. इसके अलावा, ‘जब दुनिया अबोध थी’ एकांकी में एक अजीब तरह की ‘फैंटेसी’ देखने को मिलती है. यह ‘फैंटेसी’ आरसी के विशाल कल्पना लोक का एक हिस्सा भर है. डॉ. रामचरण महेंद्र आरसी की एकांकियों का ज़िक्र करते हुए लिखते हैं, “आरसी प्रसाद सिंह एकांकियों में भी चिंतन-प्रधान गम्भीर साहित्य की सृष्टि कर सके हैं. इनमें समाज, धर्म, राजनीति, सामाजिक घटनाओं, भौतिकवाद, समाजवाद तथा साम्यवाद का विवेचन हुआ है.”  आज के दौर में जहाँ साहित्यकार बच्चों के लिए कम लिख रहे हैं, वहीं आरसी के यहाँ बच्चों के लिए विशेष सामग्री मौजूद है. बच्चों के मनोविज्ञान पर अच्छी पकड़ रखने वाले आरसी के बारे में समालोचक प्रताप साहित्यालंकार का कहना है, “आरसी शिशुओं और बालकों की अपेक्षा किशोरों के कवि हैं. कवि की अधिकांश कविताओं की रचना 12 से 16 वर्ष की उम्र के कोमल और सुकुमार मति वाले किशोरों के लिए हुई है. यद्यपि कवि ने शिशुओं के उपयुक्त काव्य का भी निर्माण किया है, तथापि उसका हृदय किशोरों के मनोरंजन के लिए ही अधिक उन्मुख है. उसे प्रकृति की ओर से बालसुलभ हृदय उपहार में मिला है, तभी वह तथ्यों को सरल और सरस बनाने की कला में निपुण है.” कहते हैं कि एक रचनाकार अपनी रचनाओं में ज़िंदा रहता है. मैं ख़ुद इस बात का गवाह हूँ कि आरसी बाबा की जितनी रचनाएँ प्रकाशित हुईं हैं, उससे कहीं ज़्यादा अप्रकाशित हैं. पता नहीं कारण क्या है?

एक दफ़ा उनके बेटे से बात करते हुए पता चला कि पांच दर्जन से अधिक पांडुलिपियां अब भी अप्रकाशित हैं. मुझे लगता है कि ‘आरसी और उनके साहित्य’ पर समग्र विचार करना अब भी शेष है. मेरी दृष्टि में आरसी ‘प्रेम और प्रगतिशीलता’ के कवि हैं. ऐसे रचनाकार, जिनके पाँव छायावाद की जड़ में जमे हैं और उंगलियाँ प्रगतिशीलता के पत्तों को छूती हैं. जो रोमांस के पेड़ों पर भारतीय दर्शन-चिंतन के फूल उगाते चलते हैं. जिनकी रचनाओं में न सिर्फ़ दैनिक जीवन की फ़िक्र है, बल्कि उसे सँवारने के उपाय भी. इन सबसे बढ़कर जो एक बात सामने आती है, वह है आम आदमी को एक इंसान के रूप में व्याख्यायित करना. उसके दुख-सुख को नज़दीक से देखना और पार जाने के रास्ते भी बताना. यही आरसी होने के मायने हैं. 

 

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