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muzaffarpur

  • Dec 23 2018 7:56AM
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119वीं जयंती : शराब से नफरत करते थे रामवृक्ष बेनीपुरी, मधुशाला छपी तो हरिवंश राय से हुए थे नाराज

119वीं जयंती : शराब से नफरत करते थे रामवृक्ष बेनीपुरी, मधुशाला छपी तो हरिवंश राय से हुए थे नाराज

- विनय-

मधुशाला छपी तो हरिवंश राय बच्चन पर नाराज हो गये थे रामवृक्ष बेनीपुरी

मुजफ्फरपुर : 'कलम के जादूगर' रामवृक्ष बेनीपुरी शराबबंदी के पक्षधर थे. बेनीपुरी को शराब के नाम से भी नफरत थी. उनका मानना था कि शराब समाज व परिवार को खोखला बनाती है. 

यह नयी पीढ़ी को गलत रास्ता दिखाती है. बेनीपुरी साहित्यकार को समाज-निर्माता मानते थे और इस नाते शराब पर केंद्रित कोई भी रचना उन्हें स्वीकार नहीं थी, चाहे वह रचना कितने भी बड़े साहित्यकार की क्यों नहीं हो. बेनीपुरी जी की शराब के खिलाफ सोच सार्वजनिक रूप से तब सामने आयी, जब डॉ हरिवंश राय बच्चन ने मधुशाला लिखी.  


मधुशाला प्रकाशन के बाद ही चर्चित हो गयी, लेकिन शराबबंदी के पक्षधर बेनीपुरी जी ने इसका जबरदस्त विरोध किया था. रामवृक्ष बेनीपुरी की 23 दिसंबर को 119वीं जयंती है. शराब को लेकर उनके विरोध और मधुशाला के प्रति जाहिर राय की प्रासंगिकता इस वजह से भी है कि बिहार में शराबबंदी है. बेनीपुरी जी का जन्म मुजफ्फरपुर जिले के औराई प्रखंड के बेनीपुर गांव में हुआ था. 

उन्होंने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया और बाद में समाजवादी आंदोलन में सक्रिय रहे. 'योगी' पत्रिका में छपे एक लेख में बेनीपुरी जी ने यहां तक कह दिया था कि बच्चन (हरिवंश राय बच्चन) बिहार में पांव रखेगा तो गोली मार दूंगा. योगी पत्रिका के माध्यम से उनका यह विचार साहित्यकारों व पाठकों के बीच पहुंचा. उनके इस वक्तव्य के कारण डॉ बच्चन से उनका संबंध खराब हो गया था. डॉ हरिवंश राय बच्चन ने मुजफ्फरपुर के कवि सत्यनारायण श्रीवास्तव को 27 अप्रैल, 1985 को लिखे पत्र में स्वीकार किया था कि उनकी 'मधुशाला' का बिहार में काफी विरोध हुआ. बेनीपुरी ने बगावत कर दी थी.

बेनीपुरी के हाथों गोली नहीं, रसगुल्ला खाकर लौटा

डॉ बच्चन ने सत्यनारायण श्रीवास्तव को लिखे पत्र में कहा है कि बेनीपुरी के विरोध के बावजूद वह बिहार गये. बेनीपुरी से भेंट हुई, लेकिन उन्होंने बहुत आत्मीय व्यवहार किया. उन्होंने गोली नहीं मारी, बल्कि अपने हाथों से रसगुल्ला खिलाया. कवि सत्यनारायण श्रीवास्तव कहते हैं कि डॉ हरिवंश राय बच्चन उनके सभी पत्रों का जवाब देते थे. वर्ष 1966 से 1992 तक करीब 300 पत्र उन्होंने मुझे लिखे. मेरे साथ उनका पिता-पुत्र का संबंध था.

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