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Sampadkiya

  • May 18 2017 6:05AM

भारत की प्रतिबद्धता

स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र बनने के फिलिस्तीनी सपने को साकार करने तथा इजराइल के साथ उसके शांतिपूर्ण सहअस्तित्व के लिए भारत हमेशा से प्रयासरत रहा है. फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास के भारत आगमन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फिलिस्तीन के प्रति भारत की इस चाहत का फिर से इजहार किया है. ऐसे में लग सकता है कि फिलिस्तीन के प्रति भारत के ऐतिहासिक बरताव में कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं आया है. 
 
लेकिन, ऐसा सोचते हुए कुछ अहम बातों का ध्यान रखना होगा. एक तो यह कि फिलिस्तीन के वर्तमान राष्ट्रपति महमूद अब्बास और फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष के अगुआ यासर अराफात के बीच कोई तुलना संभव नहीं. अब्बास को न तो फिलिस्तीनी मुक्ति संघर्ष की अराफात की विरासत का ठीक-ठीक वारिस कहा जा सकता है, न ही एक बदले हुए विश्व में दोनों की प्राथमिकताओं में ही कोई आपसी मेल बैठाया जा सकता है. 
 
अराफात की मृत्यु के साथ भारत-फिलिस्तीन संबंधों का वह दौर बीत चुका है, जब गुटनिरपेक्ष आंदोलन के जन्मदाता राष्ट्र के रूप में भारत उपनिवेश होने की नियति झेल रहे तमाम मुल्कों के पक्ष में पूरी प्रतिबद्धता के साथ खड़ा दिखता था. आज गुटनिरपेक्ष आंदोलन अपनी प्रासंगिकता गंवा चुका है और तेजी से बहुध्रुवीय बनते विश्व में भारत एक आर्थिक महाशक्ति बनने की कोशिश में नयी प्राथमिकताओं के साथ दुनिया के मुल्कों से रिश्ते बना रहा है. 
 
इसकी एक मिसाल भारत-इजराइल संबंध है. इजराइल के साथ भारत इस साल अपने संबंधों की 25वीं वर्षगांठ पूरे करने जा रहा है. इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी इजराइल का दौरा करनेवाले हैं. 
 
सच्चाई यह भी है कि भारत इन बरसों में इजराइल निर्मित हथियारों का बड़ा खरीदार बन कर उभरा है. सुरक्षा, आतंकवाद, तकनीक और विकास के मसले पर दोनों के द्विपक्षीय रिश्ते प्रगाढ़ हुए हैं. जाहिर है, बीते कई सालों से फिलिस्तीन के मसले पर उसके तेवर नरम हुए हैं और अब इजराइल के प्रति पहले जैसी तल्खी नहीं है. 
 
दूसरी तरफ इजराइल भी उम्मीद नहीं रख सकता है कि फिलिस्तीन को आजाद मुल्क मानने और विकास कार्यों में सहयोग देने के अपने पुराने रुख से भारत टल जायेगा. दोनों देशों के साथ भारत की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं और इसी के अनुकूल भारत ने फिलिस्तीन के साथ पांच समझौते पर दस्तखत भी किये हैं. आपसी कटुता के इतिहास से बंधे दो देशों- फिलिस्तीन और इजराइल- के मसलों से सम्मानजनक दूरी बना कर चलना भारत की व्यावहारिक विदेश नीति का संकेतक है. यह भी अपेक्षा की जा सकती है कि भारत अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल दोनों देशों के बीच संबंध सुधारने के लिए करे.
 

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