Sampadkiya

  • Jan 24 2020 7:46AM
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कर संग्रहण बढ़े

अनुमानों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष में कुल कर संग्रहण निर्धारित लक्ष्य से तीन से साढ़े तीन लाख करोड़ कम हो सकता है. खबरों की मानें, तो जनवरी के मध्य तक इस साल पिछले वित्त वर्ष की इसी अवधि की तुलना में प्रत्यक्ष करों की वसूली में छह फीसदी से अधिक की कमी आयी है. 
 
अप्रैल से नवंबर के बीच वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का संग्रहण बजट अनुमान से करीब 40 फीसदी कम है. इसका मतलब यह है कि सरकार के पास योजनाओं के लिए कम धन उपलब्ध होगा और वित्तीय घाटे के तय लक्ष्य को पाना बहुत मुश्किल होगा. ऐसे में अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए उपभोग बढ़ाने, कमजोर आर्थिकी को ठीक करने तथा अधिक धन खर्च करने जैसे उपायों पर ध्यान केंद्रित करना होगा. इस कोशिश में कर संग्रहण बढ़ाने की दिशा में ठोस पहलकदमी जरूरी है, क्योंकि यह आम तौर पर भी बहुत कम है. 
 
केंद्र व राज्य सरकारें सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) का लगभग 17 फीसदी ही करों से जुटा पाती हैं. इस वजह से उन क्षेत्रों में समुचित निवेश नहीं हो पाता है, जहां केवल सरकारें ही धन मुहैया करा सकती हैं. इससे विकास पर नकारात्मक असर पड़ता है. केंद्र सरकार का बजट ही जीडीपी का करीब 13 फीसदी होता है तथा केंद्र व राज्य सरकारों के कुल खर्च में राज्यों का हिस्सा 58 फीसदी के आसपास है. 
 
करों की दरें बढ़ाकर अधिक संग्रहण करने का विचार आर्थिकी के लिए लाभदायक नहीं है. मंदी या नगदी की कमी से निपटने के लिए तात्कालिक तौर पर कर छूट दी जा सकती है, पर इसे स्थायी नियम नहीं बनाया जाना चाहिए. सबसे जरूरी करों की चोरी या आमदनी छुपाने की प्रवृत्ति पर रोक लगाना है. 
 
सरकारों के पास जीएसटी और पैन के जरिये पर्याप्त सूचनाएं हैं, जिनके सहारे सटीक कराधान किया जा सकता है. दरों को तार्किक स्तर पर रखकर अधिक लोगों और व्यवसायों को कर देने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. बीते सालों में आय और कारोबार का ब्यौरा देनेवालों की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है, लेकिन अब भी आयकर व जीएसटी देनेवालों की संख्या बहुत कम है. 
 
कर वसूली में लगे विभागों में जरूरत से कम कर्मचारी होने तथा संसाधनों के अभाव की वजह से भी संग्रहण में बाधा आती है. तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल से सुविधा और पारदर्शिता बढ़ी है तथा भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में मदद मिली है, लेकिन इसे निरंतर सरल बनाने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए. 
 
बजट से पहले अनेक करों को हटाने या दरें कम करने का दबाव बढ़ जाता है. ऐसा कोई भी निर्णय पर्याप्त समीक्षा और विचार के आधार पर ही लिया जाना चाहिए. कराधान में आर्थिक असमानताओं का भी संज्ञान लेना जरूरी है और धनिकों व बड़े कॉरपोरेट समूहों से अधिक योगदान की अपेक्षा की जा सकती है, ताकि प्राप्त राजस्व को प्रगति में निवेश किया जा सके. कर चुकाने के लिए लोगों में जागरूकता का प्रसार भी कारगर हो सकता है.
 
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