ranchi

  • Jan 19 2020 1:27AM
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राज्य के रिमांड होम की व्यवस्था लचर

राज्य के रिमांड होम की व्यवस्था लचर
  •  जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का उल्लंघन, खान-पान की व्यवस्था भी एक्ट के अनुरूप नहीं
रांची : रांची के डुमरदगा स्थित बाल सुधार गृह (प्रोबेशन या रिमांड होम) से शुक्रवार को बरामद हुई चीजें बताती हैं कि होम में सुरक्षा व्यवस्था चौपट है या इस काम में लगे लोग अपनी ड्यूटी नहीं कर रहे हैं. इससे पहले प्रभात खबर में अक्तूबर-2019 में यह खबर प्रकाशित की गयी थी कि होम के बच्चे नशापान कर रहे हैं. 
 
एेसी चीजें अंदर कैसे पहुंच रही हैं, यह जांच का विषय है. समाज कल्याण विभाग से संबद्ध राज्य बाल संरक्षण संस्था के निदेशक डीके सक्सेना ने शुक्रवार की घटना के बाद जिला समाज कल्याण पदाधिकारी, जो होम अधीक्षक भी होती हैं, से पूरी रिपोर्ट मांगी है. उन्होंने कहा कि रिपोर्ट के आधार पर ही दोषियों पर कार्रवाई होगी. 
 
 रिमांड होम, डुमरदगा की दूसरी समस्या भी है. दरअसल किसी अपराध या कानून के उल्लंघन के मामले  में रिमांड होम (अॉब्जर्वेशन होम या बाल सुधार गृह) में रहनेवाले 13 से 15  वर्षीय बच्चों को बड़े आरोपियों के साथ रहना पड़ रहा है. डुमरदगा  स्थित रिमांड होम में रांची सहित अासपास के अन्य जिले के  30-35 आरोपी ऐसे हैं, जिनकी उम्र 16-18 वर्ष से अधिक है तथा जिन  पर  रेप व मर्डर सहित अन्य गंभीर आरोप हैं. 
 
इनके साथ रहनेवाले करीब 70 छोटे बच्चे हैं, जिन्हें उन वयस्क लड़कों की मारपीट व अन्य  जुल्म सहने पड़ते हैं. नियमानुसार 18  वर्ष से अधिक के वयस्क हो चुके बच्चों को किसी अलग सुरक्षित जगह (प्लेस  अॉफ सेफ्टी) में रखा जाना चाहिए. वहीं जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड को यह अधिकार  है कि वह गंभीर अपराध वाले 16 से 18 वर्षीय बच्चों को भी प्लेस अॉफ सेफ्टी  में भेज सकता है.
 
क्या है मामला 
 यदि 18 वर्ष या अधिक उम्र  का कोई वयस्क अपराध करता है, तो उसे जेल भेजा जाता है. अपराध सिद्ध  होने  पर वह जेल में ही सजा काटता है. पर 18 वर्ष से कम उम्र वाले बच्चों को जेल  के बजाय बाल सुधार गृह (रिमांड होम) भेजा जाता है. जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के  तहत ट्रायल के दौरान यह वहीं रहते हैं.
 
आरोप सिद्ध  हो जाने पर उन्हें जेल के बजाय विशेष गृह (स्पेशल होम, जो धनबाद में है)  में रखा जाता है. वहीं, ट्रायल के दौरान ही किसी आरोपी की उम्र 18 वर्ष से  अधिक हो जाये, तो उसे रिमांड होम के बजाय किसी अन्य सुरक्षित जगह पर रखना  है. 
 
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट (सेक्शन-2 (46) अॉफ जेजे एक्ट)  में इसे प्लेस  अॉफ सेफ्टी कहा गया है, जो पुलिस लॉकअप या जेल नहीं हो  सकता. बल्कि यह कोई  अलग सुरक्षित जगह होनी चाहिए. पर झारखंड में कोई प्लेस अॉफ सेफ्टी है ही  नहीं. इसलिए वयस्क हो चुके लड़के बच्चों के साथ रिमांड होम में ही रह रहे  हैं. 
 
पहले होटवार जेल में थे : इससे पहले रेप, मर्डर व अन्य गंभीर अपराध  के अारोपी 16 वर्ष या अधिक उम्रवाले बच्चों को होटवार जेल में रखा गया था, जबकि  जेजे एक्ट के अनुसार जेल, प्लेस अॉफ सेफ्टी नहीं हो सकता. 
 
बाद में इस संबंध  में गैर सरकारी संस्था बचपन बचाओ आंदोलन की ओर से झारखंड उच्च न्यायालय  में एक जनहित याचिका दायर की गयी. इस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने जुलाई  2018 में यह आदेश दिया कि होटवार जेल में रखे गये ऐसे सभी बच्चों को उनके  जिले या पास के रिमांड होम शिफ्ट किया जाये. पर रिमांड होम में लौटने के बाद वयस्क बच्चे यहीं रह गये. 
 
खान-पान प्रावधान के अनुरूप नहीं 
 उधर राज्य भर के बाल संरक्षण संस्थानों (चाइल्ड  केयर इंस्टीट्यूशंस) में रह रहे बच्चों के खाने-पीने में भारी कटौती होती  है. झारखंड में कुल 13 बाल संरक्षण संस्थान (अॉब्जर्वेशन या रिमांड होम-10,  स्पेशल होम-एक तथा चिल्ड्रेन होम-दो) हैं, जहां करीब 525 बच्चे रह रहे  हैं. इन बच्चों के पोषण के लिए जरूरी दूध, अंडा या चिकेन उन्हें नहीं  मिलता. बच्चों को हर सुबह नाश्ते में 150 मिली दूध दिया जाना है. 
 
पर बजाय इसके उन्हें हर शाम सिर्फ चाय मिलती है. यही नहीं हर रोज खाने में बटर मिल्क या दही  (100 ग्राम या मिली) देने का प्रावधान भी फेल है. यह किशोर न्याय अधिनियम  (जुवेनाइल जस्टिस या जेजे एक्ट) की धारा-33 का उल्लंघन है. एक्ट में  खाने-पीने के समय के साथ-साथ इसका मेनू भी तय है. 
 
इसके अनुसार बच्चों को हर  सप्ताह 115 ग्राम चिकेन दिया जाना है. यदि चिकेन नहीं दिया जाता, तो  उन्हें सप्ताह में चार दिन अंडा दिया जाना है. पर बाल संरक्षण संस्थानों के  बच्चों को सप्ताह में सिर्फ एक ही दिन अंडा दिया जाता है. शाकाहारी बच्चों  के लिए एक्ट में चिकेन के बजाय पनीर देने का प्रावधान किया गया है. 
 
पर  झारखंड के बाल संरक्षण संस्थानों ने कभी यह सब नहीं दिया. जेजे एक्ट में बीमार बच्चों के लिए अलग मेनू निर्धारित है. यह साफ कर  दिया गया है कि बाल संरक्षण संस्थान में रह रहे बच्चे यदि  बीमार हों, तो  उन्हें रोटी के साथ दिन भर में आधा किलो दूध तथा खिचड़ी  देनी है. पर यहां  किसी बीमार बच्चे को भी दूध नहीं मिलता. 
 

 

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