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patna

  • Nov 14 2019 9:08PM
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अलविदा वैज्ञानिक बाबू! आपका जीवन प्रतिभाओं को रोशनी देता रहेगा

अलविदा वैज्ञानिक बाबू! आपका जीवन प्रतिभाओं को रोशनी देता रहेगा

।। रजनीश उपाध्याय ।। 

साल 2013 का वह 31 मार्च था. दो दिन बाद वशिष्ठ नारायण सिंह का जन्मदिन था और उन पर एक स्टोरी करनी थी. पटना से आरा होते बसंतपुर गांव पहुंचा. गांव के सीवान पर मिली एक बच्ची से वशिष्ठ नारायण सिंह के घर का पता पूछा, तो उसने ‘ना’ में सिर हिलाया. पास खड़े एक नौजवान ने कहा- ‘विज्ञानी बाबू के घरे जाये के बाऽ? चलीं सभे.’ गलियों से गुजरते हुए नौजवान बताते रहे कि गांव में सभी लोग उन्हें विज्ञानी बाबू ही कहते हैं. यहां तक कि छोटे बच्चे भी. 

 

देश-दुनिया में मशहूर महान गणितज्ञ वशिष्ठ नारायण सिंह के लिए उनके गांव ने संबोधन का शब्द ढूंढ़ निकाला था- वैज्ञानिक या विज्ञानी बाबू. यह गांव के लोगों की उनके प्रति अटूट श्रद्धा का द्योतक भी था. 

 

सिजोफ्रेनिया नामक बीमारी से ग्रस्त वशिष्ठ बाबू ने बसंतपुर गांव में लंबा समय गुजारा. प्रारंभिक पढ़ाई-लिखाई भी यही हुई. यहीं से उन्होंने पटना साइंस कॉलेज, बर्कले यूनिवर्सिटी, नासा और फिर वापस अपने देश में- सबका केंद्र बिंदू उनका यह गांव ही रहा. जीवन के अंतिम पांच-छह साल उन्होंने पटना में गुजारे. 

 

उस दिन पहली बार वशिष्ठ बाबू से आमने-सामने हुआ था. तब वह अपने पैतृक घर के एक कमरे में कागज पर गणित की गुत्थी सुलझा रहे थे. कागज पर लिखा- ‘सीआर वन-वन. आर माइनस रौक दैन साइन टू आर.’ बोले- कंडीशन बा इ. कैलकुलस. फिर झट से हाथ बढ़ाया- ‘दस रोपेया बा?’ मैंने बढ़ा दिया. बड़े भाई अयोध्या प्रसाद सिंह ने अतीत के पन्ने खोले- ‘भइया दिनभर कागज पर गणित का सूत्र लिखते रहते हैं. कभी-कभार बक्सा में से किताब ढूंढ़ते हैं.’ उनके परिवार ने पूरा चार ट्रंक किताब सहेज कर रखा था, जो वह अमेरिका से लेकर लौटे थे. 

 

साइंस कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद वशिष्ठ बाबू 1963 में अमेरिका चले गये थे. उन्होंने 1969 में यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया से पीएचडी की उपाधि हासिल की. 1974 में उनका शोध पत्र (रीप्रोड्यूसिंग केनेल्स एंड ऑपरेटर्स वीथ ए साइकीलिक वेक्टर वन) प्रकाशित हुआ. तब गणित की दुनिया में इस शोध पत्र ने तहलका मचा दिया था. शायद गणित का सूत्र लिख वशिष्ठ बाबू इन सुखद स्मृतियों से दो-चार होते थे. 

 

दो अप्रैल, 2013 के अंक में प्रभात खबर के सभी संस्करणों में वशिष्ठ नारायण सिंह पर आधारित मेरी रिपोर्ट जैकेट और इनसाइड पेज (कुल दो पेज) पर छपी. इंगलैंड के महान वैज्ञानिक डॉ स्टीफन हॉकिन्स से उनके जीवन संघर्ष की तुलना की गयी थी. मुद्दा यह था कि प्रतिभा को धरोहर मान कर समाज व सरकार को पहल करनी चाहिए. स्टोरी छपने के बाद खूब फोन आये. कई लोग मदद के लिए आगे आये. 

 

शायद उन्हीं में से एक सज्जन वह भी थे, जिन्होंने वशिष्ठ बाबू के लिए पटना में अशोक राजपथ में आवास की व्यवस्था की, लेकिन नेताओं की तरह उन्होंने कभी भी इसका ढोल नहीं पीटा. गुमनाम रहते हुए उनके परिवार के लिए सहारा बन कर खड़े रहे. नेतरहाट ओल्ड ब्वॉयज एसोसिएशन (नोबा) ने भी अपने स्तर से कुछ मदद की. अन्यथा, इसके पहले तो आर्थिक तंगी में सही तरीके से इलाज भी न हो पाता था.

 

पटना में रहते हुए उनके आवास पर यदा-कदा मिलने जाता था. जब भी जाता, वशिष्ठ बाबू ब्लैक बोर्ड पर या कागज पर कुछ लिखते मिलते. एक बार उन्होंने इच्छा जाहिर की थी - हमरा साइंस कॉलेज ले चलऽ. 1963 में साइंस कॉलेज में उनका दाखिला हुआ. हायर सेंकेंड्री की परीक्षा में वे अव्वल रहे. 1964 में उनके लिए पटना विश्वविद्यालय का कानून बदला गया, क्योंकि उनकी उम्र पीजी की परीक्षा में शामिल होने की नहीं थी. उन दिनों साइंस कॉलेज में जॉन कैली नामक एक प्रोफेसर थे. उन्होंने वशिष्ठ बाबू की मेधा को देख उन्हें कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी भेजने की पहल की. यह सब सुखद स्मृतियां शायद रह-रह कर उनके जेहन में कौंधती रही होंगी.

 

वशिष्ठ नारायण सिंह के साथ तस्वीर खिंचा कर अपनी छवि चमकाने का वाकया भी कम नहीं रहा. प्रभात खबर में मेरी रिपोर्ट छपने के बाद बीएन मंडल विश्वविद्यालय ने 13 अप्रैल, 2013 को उन्हें विजिटिंग प्रोफेसर बनाया. इसकी अधिसूचना की एक प्रति लेकर विश्वविद्यालय का विशेष दूत उनके गांव बसंतपुर गया. बशिष्ठ बाबू को लेकर उनके भाई व भतीजा मधेपुरा गये. गेस्ट हाउस में ठहराया गया. इसके बाद विश्वविद्यालय ने उनकी कोई खोज खबर नहीं ली. इस बारे में मैंने तत्कालीन कुलपति से बात की थी, तो उनका जवाब था कि हमारे यहां मैथ का डिपार्टमेंट नहीं है.

 

आज सुबह-सुबह जब वशिष्ठ बाबू के निधन की सूचना मिली, तो उनसे जुड़ीं कई स्मृतियां ताजा हो गयीं. वशिष्ठ बाबू का जीवन संघर्ष हम सबके लिए प्रेरक है और एक सबक भी. एक छोटे से गांव और साधारण परिवार की प्रतिभा ने दुनिया में गणित के क्षेत्र में तहलका मचाया. अपने देश में काम करने की ललक उन्हें वापस खींच लायी. भारत के कई संस्थानों में काम करते हुए अंतत: वे सिजोफ्रेनिया के शिकार हुए. यह बहस व शोध का विषय है कि इसकी वजह क्या रही. लेकिन, इतनी बड़ी शख्सियत यदि गुमनामी में जीता रहा, तो इससे बिहारी समाज को सबक तो लेना ही होगा कि प्रतिभा को धरोहर मानकर सहेजने की चेतना हममें कब जगेगी.

 

अलविदा वैज्ञानिक बाबू! आप बिहार के मानस में जिंदा रहेंगे. आपका जीवन गांव के उन मेधावी विद्यार्थियों को रोशनी देते रहेगा, जो अभावों के अंधेरे में अपनी प्रतिभा को तराशने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

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