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Pathak Ka Patra

  • Aug 22 2019 7:33AM
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प्रगतिशील मूल्यों को बचाने का संघर्ष करता रहा है प्रलेस

गजेन्द्र शर्मा

लेखक, प्रलेस की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य हैं.

प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) देश का सबसे पुराना और निःसन्देह आज भी लेखकों का सबसे बड़ा संगठन है़  यह गौरव इसे प्रगतिशील सोच के साथ सपने समय की चुनौतियों का रचनात्मक ढंग से सामना करने के कारण मिल पाया है़  इस अंधेरे समय में भी प्रलेस जब अपनी 83 वर्ष की उम्र में सितम्बर के मध्य जयपुर में 17वाँ राष्ट्रीय सम्मेलन करने जा रहा है तब कुछ लेखकों और प्रतिक्रियावादी गुटों की ओर से इसे चुनौतियाँ मिल रही हैं़  ऐसे में भी प्रलेस पर जबरन आरोप मढ़ने की कोशिशें चल रही हैं

नूर ज़हीर का आरोप है कि रूढ़िवादी सोच के कारण इसके पदाधिकारी मंडलों में महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता,महिला लेखन और युवा लेखिकाओं के लेखन पर चर्चा नहीं की जाती़ उन्हें ऐसा कहने से पहले यह जान लेना चाहिए था कि प्रलेस के अनेक पदाधिकारी मंडलों में महिला लेखिकाएँ हैं

वह खुद कभी प्रलेस की सदस्य नहीं रही हैं फिर भी उन्हें यह समझना चाहिए था कि किसी भी सांगठनिक पदों पर या उसके सर्वोच्च पदों पर वही व्यक्ति जा सकता है जो सबसे पहले संगठन का साधारण सदस्य रहा हो और जिसने तमाम उतार-चढ़ावों के बीच संगठन को हर प्रकार से मजबूती देने का प्रयत्न किया हो़

ऐसे आक्षेपों से पहले नूर ज़हीर को इसी साल के समांतर साहित्य उत्सव का स्मरण करना चाहिये था जिसमें वे ख़ुद शामिल थीं उसमें महिला और महिला लेखन से जुड़े विषयों पर लेखिकाओं के अनेक सत्र थे़  वह भी कई सत्रों में युवा और प्रौढ़ दोनों अवस्था की लेखिकाओं के साथ मंचासीन थीं

फिर प्रलेस पर महिला लेखन और युवा महिला लेखन पर चर्चा न करने का आरोप कैसा? प्रलेस की बुनियाद को मजबूत करने में डॉ रशीद जहाँ, हाजरा बेगम, इस्मत चुगताई,रज़िया सज़्ज़ाद ज़हीर जैसी लेखिकाओं की भूमिका का हवाला देकर वह प्रलेस पर इन्हें भुला देने का आरोप लगा रही हैं।यदि नूर ज़हीर एक बार ‛अखिल भारतीय प्रगतिशील लेखक संघ का इतिहास’ पलटकर देख ली होतीं तो संभवतः इन लेखिकाओं को भुला देने की तोहमत लगाने से बच जातीं़ 

नूर ज़हीर दलित लेखक और उनके लेखन का महिमामंडन करती हुई प्रलेस के लिए जिस प्रकार का तर्क गढ़ती हैं, उससे उनका इरादा ज़ाहिर होता है कि वह न सिर्फ प्रलेस को दलित लेखन का विरोधी साबित करना चाहती हैं बल्कि प्रेमचंद को भी कुछ इसी दायरे में घसीट लेना चाहती हैं

उन्हें फिर एक बार इसी साल के जयपुर समांतर साहित्य उत्सव का स्मरण करना चाहिए जिसमें दलित साहित्य पर अनेक सत्र थे और उनमें दलित लेखक शरण कुमार लिम्बाले,जयप्रकाश कर्दम,हीरालाल राजस्थानी सरीखे कई महत्वपूर्ण लेखक शामिल थे़  उसी जलसे में शरण कुमार लिम्बाले ने कहा था कि यदि प्रगतिशील साहित्य नहीं होता तो आज दलित साहित्य भी नहीं होता क्योंकि वर्ण व्यवस्था की देहरी पर पहली लात प्रगतिशील साहित्यकारों ने मारी थी़ 

जिन लोगों को सबकुछ भूलकर प्रलेस में विमर्शों के लिए कोई गुंजाइश नहीं दिखती, उनका फिर क्या कहना!  वास्तव में प्रलेस पर जो लोग हमला करने में लगे हैं, वे सीधे तौर पर साम्प्रदायिक फासीवाद और साम्राज्यवाद की जड़ें मजबूत कर रहे हैं़  जबकि इन बेबुनियाद मामलों से अलग प्रलेस अपनी पूरी शक्ति और सामर्थ्य के साथ साम्प्रदायिक फासीवाद और साहित्य पर बाजार के हमलों का मुकाबला कर रहा है़  

 
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