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  • Mar 29 2017 5:47AM

मिड-डे मिल में आधार अवैध

रीतिका खेड़ा

आइआइटी, दिल्ली

ऐसा माना जाता है कि ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा), सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस), सामाजिक सुरक्षा पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं में आधार के जरिये बायोमेट्रिक सत्यापन का प्रयोग इन्हें बेहतर बनाने के लिए जरूरी है. यह एक गलत धारणा है और इस लेख में इस गलत धारणा को ठीक करने की कोशिश की गयी है. हम पिछले एक दशक से इन कार्यक्रमों का अध्ययन कर रहे हैं. 

हमने यह जानने की कोशिश की है कि इनमें खामियां कहां हैं और सरकारी स्तर पर इन्हें सुधारने की क्या कोशिशें हो रही हैं. निष्कर्ष इंगित करते हैं कि यूपीए-2 सरकार ने आधार की उपयोगिता को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया, क्योंकि मनरेगा और सार्वजनिक वितरण प्रणाली में लीकेज को लेकर समझ का अभाव था.

एक बात तो यह है कि, सैद्धांतिक तौर पर भी, आधार सत्यापन की तकनीक से कल्याणकारी योजनाओं की बहुत सीमित बेहतरी ही हो सकती है. मसलन, पीडीएस में लीकेज का मुख्य स्रोत 'मात्रा की धोखाधड़ी' है, यानी राशन दुकान से कोई अपने मासिक कोटे को खरीदने जाता है, तो उसे पूरे कोटे की पावती पर हस्ताक्षर करना होता है, जबकि उसे कम अनाज मिलता है. 

ऐसे में लोगों के पास कहीं और जाने का विकल्प नहीं होता. हस्ताक्षर की प्रक्रिया को आधार सत्यापन से बदल देने से इस समस्या का हल नहीं होगा.  

दूसरी बात यह है कि व्यावहारिक स्तर पर जहां आधार सत्यापन को लागू किया गया है, वहां इसके असफल होने की आशंकाएं सही साबित हुई हैं. ऐसा कई तरह से हो सकता है- आधार संख्या को गलत तरीके से दर्ज कर लोगों को प्रखंड मुख्यालय जाने के लिए मजबूर किया जा सकता है, जहां वे सही जानकारी शामिल करा सकें. दस्तावेजों में सुधार के लिए उन्हें कुछ सप्ताह तक इंतजार करना पड़ सकता है. या फिर अंगुलियों के निशान बदल सकते हैं या मशीन उन्हें पहचानने से इनकार कर सकती है, या सर्वर डाउन हो सकता है या फिर फोन या इंटरनेट की सेवा बाधित हो सकती है. आप जीवन-रक्षा से जुड़े अधिकारों (राशन, पेंशन, छात्रवृत्ति आदि) को ऐसे कमजोर तंत्र के सहारे नहीं छोड़ सकते हैं.    

तीसरा बिंदु है कि सरकारें भ्रष्टाचार रोकने के लिए अन्य तकनीक का अच्छा इस्तेमाल कर रही हैं. कंप्यूटरीकरण, एसएमएस अलर्ट, आधिकारिक दस्तावेजों को ऑनलाइन उपलब्ध कराना, नि:शुल्क फोन नंबर जैसी तकनीकों से हम बिहार, छत्तीसगढ़ और ओडिशा को उनके पीडीएस लीकेज की दर को क्रमशः 90, 75 और 50 फीसदी से घटा कर 10-20 फीसदी के करीब लाने में कामयाब हुए हैं. 

यह बेहतरी आधार सत्यापन के लागू होने से पहले 2004-05 और 2011-12 के बीच में दर्ज की गयी थी. दुखद यह है कि आधार की तरह इन तकनीकों का कोई ब्रांड एंबेसडर नहीं है, इसलिए उनकी अवहेलना होती है.  

यह आम धारणा है कि आधार ने हजारों करोड़ रुपये बचाये हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि इस बात के पक्ष में बहुत ही कम सबूत हैं. रसोई गैस सब्सिडी में बचत को सबसे अधिक प्रचारित किया गया है. मुख्य लेखा परीक्षक ने पाया कि रसोई गैस में बचत का 92 फीसदी हिस्सा अंतरराष्ट्रीय बाजार में मूल्यों में गिरावट का नतीजा है, न कि आधार का. लेकिन सरकार अब भी बचत के आधारहीन आंकड़े बताती है.   

जब सरकार का खर्च कम होता है, तो वह उसे 'बचत' का नाम देती है. कमी को दो तरह से हासिल किया जा सकता है- एक, बेनामी या दोहरे लाभार्थियों को हटा कर, और दूसरा, उचित हकदारों की संख्या को घटा कर. सरकार दोनों बातों- सक्षमता और संख्या घटने- को बचत के रूप में देखती है. 

मसलन, जब राजस्थान में वृद्धावस्था पेंशन के जीवित हकदारों को 'गलती से' मृत मान लिया गया, तो खर्च कम हो गया, और इसे आधार लागू करने से हुई बचत के रूप में बता दिया गया. इसी तरह से लाभार्थियों की संख्या कम होने को भी बचत की श्रेणी में डाल दिया गया.

यदि आधार को मिड-डे मील स्कीम से जोड़ा गया, तो यहां भी ऐसा ही किया जायेगा. यह स्कीम देश की सबसे सफल सामाजिक नीतियों में से है और इससे स्कूलों में उपस्थिति बढ़ाने, बच्चों का बेहतर पोषण, सीखने की उपलब्धियों जैसे दूरगामी लाभ हुए हैं. मिड-डे मील की समस्याएं हैं- बेहतर खाना, सुरक्षित संग्रहण करना, समय से फंड का आवंटन आदि- ये सब आधार से जोड़ने से हल नहीं हो सकती हैं. 

अक्तूबर, 2015 के आदेश में सर्वोच्च न्यायालय ने छह योजनाओं को सूचीबद्ध किया था, जिनमें आधार का स्वैच्छिक उपयोग हो सकता है. मिड-डे मील स्कीम इस सूची में नहीं था. इसमें आधार को अनिवार्य बनाने का सरकार का हालिया निर्देश पूरी तरह से अवैध है.  (अनुवाद : अरविंद कुमार यादव)

 

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