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  • Jan 11 2019 8:16AM
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भारतीय विज्ञान की प्रामाणिकता !

अभिषेक कुमार सिंह

टिप्पणीकार

abhi.romi20@gmail.com

जालंधर में संपन्न भारतीय राष्ट्रीय साइंस कांग्रेस की 106वीं बैठक की उपलब्धियों की चर्चा जब होगी, तब होगी, फिलहाल वह विज्ञान के मिथकीय उल्लेखों का अखाड़ा बन गयी. इसमें एक बार फिर प्राचीन मिथकों के हवाले से कहा गया कि रामायण-महाभारत कोई मिथकीय ग्रंथ नहीं, बल्कि इतिहास हैं और इनमें वर्णित विमान आदि के संदर्भ वैज्ञानिक हैं. 

साल 2015 में भी मुंबई में आयोजित कांग्रेस में भी केरल के पायलट ट्रेनिंग स्कूल के प्रिंसिपल आनंद बोडस ने दावा किया था कि प्राचीन काल में भारतीयों ने एयरक्राफ्ट खोजा था, जो कई ग्रहों पर पहुंचा था. पर इस बार जैसे दावे किये गये, उन्होंने विज्ञान-गल्पों (साइंस फिक्शन) को भी पीछे छोड़ दिया.

आंध्र यूनिवर्सिटी के कुलपति नागेश्वर राव और तमिलनाडु के एक वैज्ञानिक के कृष्णन के दावे इस संदर्भ में ज्यादा उल्लेखनीय हैं. नागेश्वर राव का मत है कि महाभारत काल में स्टेम सेल और टेस्ट ट्यूब बेबी तकनीक अपने चरम पर थी, सौ कौरवों की थ्योरी से यही साबित होता है. 

उन्होंने दावा भी किया कि रावण के पास 24 तरह के एयरक्राफ्ट थे और श्रीलंका में उन दिनों एयरपोर्ट होते थे. कृष्णन ने भी दावा किया कि न्यूटन और आइंस्टाइन की थ्योरी पूरी तरह गलत थीं. इसलिए जल्द ही गुरुत्वाकर्षण तरंगों का नाम बदल कर 'नरेंद्र मोदी तरंग' रखा जायेगा. जबकि फिजिक्स में ग्रैविटेशनल लेंसिंग इफेक्ट को 'हर्षवर्धन इफेक्ट' के नाम से जाना जायेगा. हालत यह हो गयी कि साइंस कांग्रेस एसोसिएशन के अध्यक्ष मनोज कुमार चक्रवर्ती को खेद जताना पड़ा कि जब साइंटिस्ट व कुलपति ऐसी बातें बोलते हैं, तो हैरानी होती है.

वर्ष 2016 में पहला मौका था, जब प्राचीन भारतीय विज्ञान के दावों को चर्चा के लिए साइंस कांग्रेस का विषय बनाया गया था. इसमें कहा गया कि प्राचीन भारत का विज्ञान तर्कसंगत है. यह दावा तत्कालीन केंद्रीय विज्ञान और तकनीक मंत्री हर्षवर्धन ने भी किया था कि प्राचीन भारतीय ऋषियों (कथित वैज्ञानिकों) ने अपनी खोज का श्रेय दूसरे देशों के वैज्ञानिकों को दे दिया. 

जब विवाद हुआ, तो कांग्रेस सांसद शशि थरूर उनके पक्ष में बोले कि प्राचीन भारत की विज्ञान की प्रामाणिक उपलब्धियों को ‘हिंदुत्व ब्रिगेड के बड़बोलेपन’ के कारण खारिज नहीं किया जाना चाहिए. उसी साइंस कांग्रेस में यह मत भी दिया गया कि अंकगणित (अल्जेब्रा) और पाइथागोरस के सिद्धांत भारत की देन हैं, जबकि इसका श्रेय अन्य देशों के गणितज्ञों-वैज्ञानिकों को दिया जाता है.

इसमें संदेह नहीं कि कई चीजों की खोज और आविष्कार भारत में काफी पहले हो चुके थे. शून्य भारत का आविष्कार है और सुश्रुत व चरक संहिताओं में चिकित्सा के नये आयामों की सबसे पहले खोज की गयी थी. तो समस्या क्या है, जिसे लेकर इतना हंगामा खड़ा हुआ है और जिसके समाधान की जरूरत है. असली दिक्कत यह है कि जिन प्राचीन वैदिककालीन उल्लेखों के सहारे भारतीय विज्ञान की महत्ता साबित करने की कोशिश की जा रही है, उनमें से कई बेतुके हैं. 

जिन पर कोई मतैक्य बन सकता है, उन दावों के समर्थन में दस्तावेजों-प्रमाणों का अभाव है. जैसे कैप्टन आनंद जे बोडास ने भारत में हजारों साल पहले की जिन तकनीकी उपलब्धियों का दावा किया था, उनका एकमात्र स्रोत वैमानिक प्रकरणम नामक ग्रंथ है, जो उनके मुताबिक ऋषि भारद्वाज ने लिखा था. लेकिन, वैमानिक प्रकरणम में सुझायी गयी तकनीक से बनाया गया कोई प्राचीन विमान भारत के पास सबूत के तौर पर नहीं है.

असल समस्या इसी मोर्चे पर है. पश्चिमी देशों ने विज्ञान संबंधी जो उपलब्धियां अर्जित कीं, उन्होंने उनका सही ढंग से दस्तावेजीकरण किया- जैसे उन पर फिल्में बनायीं. राइट बंधुओं को शुरुआती विमान उड़ाते देखा जा सकता है. 

पश्चिम का विज्ञान क्रमिक विकास की देन है. यानी जो चीजें वहां की किताबों में दर्ज थीं, उन पर सिलसिलेवार ढंग से काम हुआ और वे आगे बढ़ीं. लेकिन, यहां जो चीजें वेदों में लिखी गयीं, उन पर शोध करके उन्हें निरंतर आगे बढ़ाते रहने में हमारा देश पिछड़ गया. इसलिए आज सवाल उठ रहे हैं कि जब इतना सारा ज्ञान भारतीय ग्रंथों में था, तो उसका इस्तेमाल करके कुछ बनाया क्यों नहीं गया. 

निश्चय ही हमारी प्राथमिकता देश को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की होनी चाहिए.

देश में नयी और कायदे के रिसर्च का माहौल बने और पश्चिम की चुरायी या कॉपी की गयी तकनीकों की बजाय आधुनिक-स्वदेशी तकनीकों का इस्तेमाल बढ़े. ऐसा करके देश अपना पिछड़ापन दूर कर सकता है. लेकिन, इस मोर्चे पर काम होते हुए नहीं दिखता. इसका सबूत यह है कि हमारा पड़ोसी चीन साइंस और तकनीक के क्षेत्र में भारत के मुकाबले हर साल चार गुना ज्यादा रिसर्च पेपर छापता है. 

साल 2000 तक अमेरिका ने विकासशील देशों के जिन आविष्कारों पर पेटेंट जारी किया था, वे अमेरिका की तुलना में सिर्फ एक फीसदी थे. यह भी उल्लेखनीय है कि 2016 तक चार फीसदी पेटेंट अकेले चीन ने हासिल कर लिये थे. क्या जरूरी नहीं है कि पुरानी आधारहीन उपलब्धियों का बखान करने से पहले साइंस की मौजूदा चुनौतियों को समझा जाये? 

बेशक, ज्ञान-विज्ञान की प्राचीन विरासत को उसका गौरव वापस दिलाना चाहिए, लेकिन ऐसा करने से पहले एक बार तो उन तथ्यों व दावों की तटस्थ जांच कर लेनी चाहिए कि जो बातें हमारे वेद-ग्रंथों में दर्ज हैं, क्या उनमें रत्ती भर भी सच्चाई है? ऐसा न करके महज खोखले दावे करना तो भारतीय गौरव को और भी रसातल में पहुंचा देता है. 

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