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  • Feb 19 2019 6:05AM

पुलवामा आतंकी हमले के मायने

आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक,
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
aakar.patel@gmail.com
 
जैशे-मोहम्मद मतलब मोहम्मद की सेना. यह आश्चर्यजनक है, क्योंकि इस्लाम के पैगम्बर की जीत की कोई आकांक्षा नहीं थी. अरब का विस्तार मोहम्मद की मृत्यु के बाद खलीफाओं, विशेषकर उमर के दौर में शुरू हुआ. 
 
जैश एक पाकिस्तानी संगठन है और यह ज्यादातर पाकिस्तान के ग्रामीण पंजाबियों की भर्ती करता हैै. यह लश्करे-तैयबा से बहुत छोटा है और इसकी विचारधारा भी अलग है. इस्लाम की एक विशेष विचारधारा सलाफी, जिसमें आत्महत्या एक बड़ा गुनाह माना गया है, के कारण लश्कर आत्मघाती हमले को पसंद नहीं करता है. 
 
इसकी बजाय लश्कर अपने आतंकी कृत्य को फिदायीन हमला कहता है, जिसमें हमलावर तब तक लड़ाई जारी रखता है, जब तक वह मारा नहीं जाता. उरी और मुंबई में हुए आतंकी हमले संभवत: लश्कर द्वारा अंजाम दिये गये थे, हालांकि इसने हमलों की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था. 
 
जैश एक देवबंदी संगठन है. इसका अर्थ यह नहीं कि उत्तर प्रदेश के देवबंद के दारुल उलूम मदरसे से इसका कोई संबंध है. लेकिन, वे उसी मूलभूत शिक्षाओं को मानते हैं, जो आठवीं शताब्दी के विद्वान अबू हनीफा के सिद्धांतों पर आधारित हैं. यह संगठन सूफीवाद और मकबरों पर पूजा को गलत मानता है, जबकि इस उपमहाद्वीप के अधिकतर मुसलमान इनके प्रति श्रद्धा रखते हैं.
 
जैश सिपहे-सहाबा पाकिस्तान और लश्करे-झांगवी से जुड़ा हुआ है, जो पंजाबी संगठन हैं और इन्होंने पाकिस्तानी शियाओं की हत्या की है. जैश चाहता है कि पाकिस्तान को पूरी तरह से शरिया कानून के तहत संचालित किया जाये. वह यह भी चाहता है कि अमेरिका अफगानिस्तान से हट जाये. जैश का गठन 2000 में हुआ था और हरकत-उल मुजाहिदीन समूह के ज्यादातर अनुयायी इसमें शामिल हो गये थे. 
 
इसके सरगना मसूद अजहर को भारत में पकड़ा गया था, लेकिन वाजपेयी सरकार द्वारा इसे रिहा कर दिया गया था. वह जेल में बंद उन तीन आतंकवादियों में से एक था, जिसे तत्कालीन केंद्रीय मंत्री जसवंत सिंह कंधार लेकर गये थे. वहां एयर इंडिया का एक विमान अपहृत कर ले जाया गया था.  
 
दिसंबर, 2001 में हमारी संसद पर चार आतंकवादियों द्वारा फिदायीन हमले के लिए भारत ने जैश व लश्कर को दोषी ठहराया था. इसके बाद तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति मुशर्रफ ने इन दोनों संगठनों को प्रतिबंधित कर दिया था. पर, लश्कर ने अपना नाम बदलकर अपनी गतिविधियां जारी रखी. इसका बड़ा मुख्यालय पाकिस्तानी पंजाब प्रांत के मुरीदके में है और इससे कई संगठन और धार्मिक संस्थाएं जुड़ी हुई हैं. 
 
कुछ पाकिस्तानी विश्लेषकों का मानना है कि लश्कर की तुलना में पाकिस्तानी सेना और आइएसआइ का जैश पर ज्यादा नियंत्रण था. पाबंदी से पहले ही उसने अपने खातों से सारा पैसा निकालकर अपने निचले कैडर में बांट दिया था. साल 2003 में जैश ने मुशर्रफ के काफिले पर दो बार आत्मघाती हमला कर उन्हें मारने की कोशिश की थी.  
 
कश्मीर में पहला आत्मघाती हमला 19 अप्रैल, 2000 को तब हुआ था, जब जैश के आतंकी ने भारतीय सेना के बादामी बाग स्थित मुख्यालय को निशाना बनाया था. 
 
अक्तूबर, 2001 में जैश ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा पर बम दागे थे, जिसमें 38 लोग मारे गये थे. वर्ष 2013 से जैश कम सक्रिय रहा है. हालांकि, पाकिस्तान को लगता है कि मसूद अजहर उसके लिए कीमती है. हमें यह इसलिए पता है, क्योंकि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् द्वारा अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने से रोकने में (चीन के वीटो के जरिये) सफल रहा है.
 
सीआरपीएफ पर हुआ आतंकी हमला दुखद है और यह भविष्य की कई आशंकाओं का संकेत हो सकता है. आत्मघाती बम की योजना बनाने के लिए व्यापक समर्थन और उच्च स्तरीय समन्वय की आवश्यकता होती है.
 
विस्फोटकों की तस्करी करने या खरीदने या यातायात के जरिये इसे लाने और उपकरणों को बनाने की तैयारी तथा तकनीकी जानकारी के साथ सुरक्षाबलों की टुकड़ी की आवाजाही की खुफिया जानकारी और जरूरी सहायता (जैसे कार की व्यवस्था) के लिए स्थानीय मदद की आवश्यकता होती है. प्रशिक्षण और भंडारण के लिए भी ऐसी सहायता की दरकार होती है. जैश यह हमला करने लायक बना, इसका मतलब है कि आत्मघाती हमलावर के अलावा कई और लोग भी हैं, जो इस हमले में शामिल थे. वे अब भी हमें नुकसान पहुंचाना चाहते हैं. 
 
एक ग्रामीण कश्मीरी लड़के को सफलतापूर्वक तैयार किया गया और खुद को व दूसरों को मारने के लिए उसकी सोच को पूरी तरह से बदल दिया गया. इसका अर्थ यह है कि वहां एक सक्रिय संगठन मौजूद है, जो ऐसे लड़कों की भर्ती करता है. अभी ऐसे ही कई संभावित आतंकी वहां छुपे हो सकते हैं. 
 
दुखद है कि कि मजहबी समुदायों के संबंधों में आयी दरार के कारण हमारे लिए मुखबिर मिलना मुश्किल है. कश्मीर के सामाजिक नेटवर्क को भेदने की क्षमता हमारे पास बहुत कम है. खुफिया ब्यूरो में बहुत-थोड़े मुस्लिम हैं. 
 
भारत के कई वरिष्ठ खुफिया अधिकारी उर्दू तक नहीं पढ़ सकते. सितंबर, 2002 में जब अहमदाबाद के अक्षरधाम मंदिर में दो फिदायिनों ने हमला किया था, तब उनके नोट को एक स्थानीय गुजराती इमाम के माध्यम से पुलिस पढ़ सकी थी. साल 1993 दंगों और बम धमाकों के बाद मुंबई पुलिस के सामने भी ऐसी ही समस्या आयी थी. 
 
लंबे समय से उसके पास खबरियों के अच्छे स्थानीय नेटवर्क का अभाव है. संसद हमले के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी के दबाव में मुशर्रफ द्वारा जैश पर पाबंदी लगायी गयी थी. उस समय उस हमले से देश क्रोधित था और सरकार ने राजस्थान सीमा पर सेना तैनात कर दी थी.
 
अगर मोदी सरकार के बयानों पर ध्यान दें, तो कुछ ऐसी ही योजना बनायी जा रही है. इसे अंजाम देने पर सोच-विचार करना होगा, क्योंकि पाकिस्तान से निपटने के मामले में भारत दुनिया का दखल नहीं चाहता. लेकिन जब दो परमाणु शक्ति-संपन्न देश युद्ध के कगार पर खड़े हों, तो दुनिया स्वाभाविक रूप से हस्तक्षेप करना चाहेगी. 
 
पुलवामा की घटना कश्मीरियों की जिंदगी को और मुश्किल बना देगी. वे अब भी केंद्रीय शासन के तहत हैं तथा सरकार के कठोर रवैये से उनकी नागरिक स्वतंत्रता में और अधिक कटौती होगी. 
 

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