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  • May 18 2015 4:52PM

नया सफर, आरंभिक अनुभव

नया सफर, आरंभिक अनुभव

पत्रकार हरिवंश को पढ़ते रहनेवाले, करीब से जाननेवाले जानते रहे हैं कि राजनीति उनके रग-रग में रही है.  झारखंड को केंद्र बनाकर और मूलत: पूरे पूर्वी भारत के इलाके को कर्मक्षेत्र का दायरा बनाकर करीब ढाई दशक तक प्रभात खबर के जरिये पत्रकारिता करते हुए उन्होंने यह काम परोक्ष तौर पर लगातार किया है़. सृजन कर्म के जरिये वे वैकल्पिक राजनीति करते रहे हैं.  प्रभात खबर के पहले रविवार और धर्मयुग  जैसी पत्रिकाओं में पत्रकारिता करते हुए भी उन्होंने राजनीति को केंद्र में रखा, उस पर सबसे ज्यादा लिखा़ . राजनीति के सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक व व्यावहारिक पक्ष पर. सिर्फ लिखा भर नहीं, वैकल्पिक तरीके से राजनीतिक हस्तक्षेप करते भी रहे हैं. 90 के दशक के आरंभिक समय में ही उन्होंने प्रभात खबर अखबार के जरिये आर्थिक रूप से कमजोर बिहार की स्थिति को केंद्र के सामने रखने के लिए दिल्ली में दस्तक दी थी़. एक आयोजन के जरिये .  चित्र प्रदर्शनी और फिल्म के जरिये . यह महज पत्रकारिता भर नहीं था, पत्रकारिता का सरोकारी पक्ष था, जिसके जरिये राजनीतिक हस्तक्षेप की कोशिश हरिवंशजी ने की थी़.  बाद में कई ऐसे अवसर आये, जब वे वैकल्पिक राजनीति के बनते रास्ते में अपनी भूमिका निभाते रहे और राजनीतिक हस्तक्षेप की संभावनाओं की तलाश कर दस्तक भी देते रहे. वह बाबा आम्टे के साथ की यात्रा हो, पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखरजी के साथ यात्रा हो या फिर झारखंड के सुदूरवर्ती गांवों, जंगल में बसे एकांत इलाके में भी जाकर लोगों को बताते-समझाते रहने की बात हो कि यह लोकतंत्र ही दुनिया में सबसे बेहतर विकल्प है और राजनीति ही है, जो चीजों को बदल सकती है़. हरिवंशजी का राजनीति से इस तरह का रिश्ता कई वजहों से रहा है. जिसमें एक मजबूत वजह शायद सिताबदियारा जैसे गांव में जनमने और बचपन से लेकर किशोरावस्था तक वहीं गुजारना भी है.  वही सिताबदियारा, जहां जेपी का जन्म हुआ था और जो पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की कर्मस्थली रहा है़,  अब वही पत्रकार हरिवंश खुद राजनेता भी हैं. राज्यसभा के  सांसद.  बिहार में सत्तारूढ़ पार्टी जदयू की ओर से राज्यसभा गये हैं.  लेकिन वैसे वाले सांसद नहीं, जिनके चलने के पहले जिले से लेकर कस्बे तक में सूचना रहती है, अमला से लेकर माला तक का मुकम्मल इंतजाम रहता है और चमचमाती हुई गाड़ियों का काफिला उम्मीदों-आकांक्षाओं को रौंदते हुए रोज निकलता रहता है. वे राजनीति में जाकर राजनीति सीखने की कोशिश में लगे हुए हैं.  संसद के हर सत्र में जाकर सीखने की कोशिश में हैं.  फिर वहां से लौटने के बाद ग्रासरूट पत्रकार की तरह आमलोगों के बीच, सामान्य तरीके से जाकर नब्ज समझने की कोशिश कर के.  एक जिद की तरह कि कोई सांसद विशिष्ट बनने की बजाय आम आदमी की तरह ही क्यों नहीं रह सकता! इस जिद को पूरा करने के लिए सांसद बन जाने के बाद के दिखावे की परंपराओं के निर्वहन और तमाम दबावों को झेलते हुए खुद से लड़ रहे हैं.  इस लड़ाई में वे जीत जायेंगे या कि हार जायेंगे, अभी कहना मुश्किल है. वे सांसदी फंड को लेकर भी अपने तरीके का प्रयोग कर रहे हैं. लेकिन सबकुछ चुपचाप. बिना किसी शोर के. हरिवंशजी संसद के अनुभवों को बार-बार साझा करते हैं.  राजनीति से निकली हुई चीजें स्थितियां बदलेंगी-राजनीति अब कोई बदलाव नहीं कर सकती जैसी बातों का कोलाज बनता है, उनकी बातों से. उम्मीदी और नाउम्मीदी के बीच, आशा और निराशा का भंवरजाल जैसा बनता है. उनकी बातों से लेकिन खुद से ही जूझने के बाद आखिरी अंतर्द्वंद्व को खारिज करते हुए, खुद को विजयी करार देते हुए, निष्कर्ष भी सुनाते रहते हैं कि चीजें बदलेंगी, हालात बदलेंगे, स्थितियों  में बदलाव होगा और यह सब राजनीति से ही होगा. धीरे-धीरे ही सही, दूसरे रास्ते से ही सही़  इतने किस्म की बतकही और राजनीतिक अनुभव को सुनने के बाद कई बार आग्रह किया उनसे कि वे सक्रिय राजनीति में भूमिका निभाने की जो आरंभिक प्रक्रिया है, जो आरंभिक अनुभव है और उससे जो राय बनी है, उसे सार्वजनिक तौर पर साझा करें.  लेकिन कल-परसों पर वे टालते रहे़  दरसअल संकोच और दुविधा का आवरण इतना रहा कि कभी-हां-कभी ना करते रहे. उन्हें लगता कि जिस अखबार में काम करते हैं, उसमें क्या अपने अनुभव को लिखें ? वह खुद को ज्ञानी मान उपदेश देने जैसा हो जाएगा और अभी राजनीति के विद्यार्थी युग में ही उपदेशक व मार्गदर्शक की भूमिका निभाने लायक नहीं हैं. वे ऐसे ही कई तर्क देते रहे. तथ्यों से भरे तर्क को काटना आसान भी नहीं था. लेकिन वे बातों को साझा करते रहे,  फुटकर तौर पर. बिखरे हुए रूपों में. अलग-अलग जगहों पर सफर के दौरान उनसे हुई बतकही का ही लिखे रूप में संक्षिप्त और संपादित अंश यहां प्रस्तुत है़  इस लिखे का कुछ हिस्सा अलग-अलग माध्यमों से अलग-अलग रूप में सार्वजनिक तौर पर साझा हो चुका है़  कुछ हिस्सा तहलका पत्रिका में तो कुछ जानकीपुल जैसे हिंदी के चर्चित वेबसाइट में  जो हरिवंशजी को लगातार पढ़ते रहे हैं और उनके नियमित पाठक रहे हैं, बहुत हद तक संभव है, उन्हें इस लेख में वह प्रवाह न मिले लेकिन ताजगी और सरोकारी पक्ष की झलक मिलने की गुंजाइश है़  आज राजनीति किस रास्ते पर है और संसद भवन, जिसे लोकतंत्र का लैंप हाउस कहते हैं और नीतियों के जरिये नियति तय करने का स्थल भी मानते हैं, वहां क्या हाल हैं, उसे बहुत ही सहजता से और बिना किसी अगर-मगर के बताने की कोशिश है, इस आलेख में. यह एक पत्रकार के नया सफर पर निकलने का शुरुआती अनुभव भर है, बतकही में हुई फुटकर बातों का सहेजीकरण है, सौंदर्यबोध और शब्दों के साज-सज्जा से भरे संस्मरणों का दस्तावेज नहीं. 


                                                         - निराला



नया सफर : आरंभिक अनुभव

 

लगभग ग्यारह महीने हुए, राज्यसभा का सदस्य बने़  लगातार मन में यह सवाल उठता रहा है कि यह अनुभव कैसा है? हालांकि यह शुरुआत के ही दिन हैं. दिसंबर, 2014 के अंत तक दिल्ली में घर नहीं मिला या छोटा आफिस नहीं बना सका था. बिना आफिस बने एक सार्थक भूूमिका (बतौर एमपी) संभव नहीं.  प्रक्रिया ही ऐसी है़.  अप्रैल 10, 2014 से राज्यसभा सदस्य के तौर पर कार्यकाल की शुरुआत हुई. जून में शपथ ली. एक महीने का बजट सत्र था. उसमें शरीक रहा़ फिर शीतकालीन सत्र में, इस सत्र में थोड़ा अनुपस्थित रहना पड़ा. राजनीतिक काम, अस्वस्थता व झारखंड चुनाव के कारण. कुछेक पार्लियामेंट्री कमेटी की बैठकों में शरीक हुआ़  इस पद पर जाने का प्रस्ताव अचानक आया.  वह रात अब भी जेहन या स्मृति में हैं. तब पिछले कुछेक महीनों से रात दस से साढ़े दस के बीच खाना खाकर सोने का क्रम चल रहा था, पर उस दिन किसी राष्ट्रीय मुद्दे पर एक टीवी आयोजन की परिचर्चा में भाग लेना था. टीवी चैनल के लोग अपना ओबी वैन लेकर घर आये थे. उल्लेख कर दूं कि पिछले कुछेक वर्षो से टीवी चैनलों के डिबेट से भी बचता हूं. कम मौकों पर ऐसे आयोजनों में शरीक होता हूं.  उस दिन इस डिबेट के कारण सोने में सोने में देर हुई.  लगभग ग्यारह बजे रात में फोन आया कि आपको राज्यसभा जाना है़.  अगले दिन शाम में इसकी घोषणा हुई. पहली प्रतिक्रिया एक किस्म की आनंद की, खुशी की थी़,  क्योंकि इस व्यवस्था में राज्यसभा, लोकसभा जाना एक बड़ी उपलब्धि मानी जाती है. इसके पहले 1991 में जब चंद्रशेखर जी प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने प्रधानमंत्री कार्यालय में, प्रधानमंत्री के अतिरिक्त सूचना सलाहकार, संयुक्त सचिव भारत सरकार के रूप में, इसी तरह अचानक बुलाया. जब तक वह सरकार में रहे, रहा, जिस दिन उन्होंने इस्तीफा दिया, उसी दिन प्रधानमंत्री कार्यालय के रिसेप्शन पर इस्तीफा, गाड़ी, घर की चाबी, सबको छोड़ कर रांची लौट आया था, उस वक्त भी पहली बार खबर पाकर एक उल्लास हुआ था कि व्यवस्था की अंदरूनी दुनिया देखने का अवसर मिलेगा़. तब युवा था उत्सुकता थी कि देखूं कि सरकार चलती कैसे है? सही भूमिका की कितनी गुंजाइश है? इससे अधिक न तब कोई कामना थी, न अब कोई कामना है. यह व्यवस्था अंदर से कैसे चलती है? इसके महत्व क्या हैं? इसी क्रम में राज्यसभा जाने का यह अवसर आया़. याद आया कि प्रभात खबर में आना एक बदलाव का प्रतीक था, निजी जीवन में. कोलकाता में आनंद बाजार पत्रिका (रविवार) और मुंबई में टाइम्स आफ इंडिया समूह के धर्मयुग में काम करने के बाद. यानी दो सबसे बड़े अखबार घरानों के दो सबसे महत्वपूर्ण हिंदी प्रकाशनों में काम करने के बाद एक बंद प्राय अखबार प्रभात खबर में आना. उसको खड़ा करनेवाली टीम के सदस्य के रूप में होना. पिछले 25 वर्षो तक इससे जुड़े रहने के बाद एक ठहराव का एहसास होना. उस दौर या मन:स्थिति में राज्यसभा जाने का यह प्रस्ताव, निजी जीवन में एक बदलाव का प्रतीक लगा़ यह बदलाव कैसा रहेगा? पिछले कुछेक महीनों से यह सवाल मन में उठता रहा है? अंर्तद्वंद्व के रूप में यह सवाल उठता रहा कि क्यों इस पद के लिए लोग 100-200 करोड़ रुपये खर्च करते हैं?

 

राज्यसभा में किस प्रभाव के लोग पहुंचते हैं, इसकी चर्चा पढ़ी थी. आज केंद्र में जो ग्रामीण विकास मंत्री हैं, वीरेंद्र सिंह. वह हरियाणा की राजनीति में असरदार व्यक्ति रहे हैं. लंबे समय तक कांग्रेस में रहे. कद्दावर व्यक्ति. कांग्रेस छोड़ने से पहले उनका बयान आया कि सौ करोड़ में हमारे यहां से लोग राज्यसभा जा रहे हैं. इन सब बातों से परे रहकर ही बात की जाये, तो जिस झारखंड में 22 विधायक कम से कम ऐसे हैं, जो राज्यसभा चुनावों में संदेहास्पद मतदान या पक्षपतापूर्ण मतदान के घेरे में आये. सीबीआइ जांच के प्रभावों में. विजय माल्या, जो किंगफिशर के मालिक रहे हैं, और जिनकी कही खबरें सुर्खियां बनती रही हैं, वह भी राज्यसभा में हैं. कुछ ही महीनों पहले एचडी कुमार स्वामी, जो कर्नाटक में मुख्यमंत्री रहे, उनका एक टेपरिकार्डेड बयान, देश के सारे अखबारों की सुर्खियों में रहा. उन्होंने अपने यहां एमएलसी के एक व्यक्ति को टिकट देने के लिए पांच करोड़ रुपये की मांग की. जब यह खबर सार्वजनिक हुई, तब उन्होंने कहा कि हां, पार्टी के लिए हमलोगों ने चंदा मांगा. झारखंड से कैसे-कैसे लोग राज्यसभा पहुंचे, यह सब जानते हैं. इसी राजनीतिक माहौल या दौर से मैं राज्यसभा गया. जदयू पार्टी ने सबकुछ किया. चुनाव निर्विरोध हुआ, बिहार में. चुनाव परिणाम आने के बाद वो दस हजार रुपये भी वापस हो गये. चुनाव पूर्व डिपाजिट में यह जमा होता है. इस दौर में जब राजनीति व्यवसाय हो रही है, तब सामन्य लोगों को चुन कर राज्यसभा भेजना, चुनाव का निर्विरोध होना, कैसे संभव हुआ? बिहार पिछड़ा हो सकता है, पर बिहार की राजनीति में आज भी मूल्य व नैतिक सत्व हैं. नीतीश कुमार ने इसी राजनीतिक धारा को बिहार-देश में मजबूत किया. इस चलन से यह निजी धारणा पुष्ट हुई कि आज भी राजनीति में कुछेक लोग ऐसे हैं, जिनके अंदर मूल्य, आस्था और वैचारिक राजनीति है. 

 

यह पद पा लेने के बाद अनुभव करता हूं कि एक नया सांसद, अगर वह समृद्ध पृष्ठभूमि से नहीं आता, अगर उसके पास अपना कोई व्यवसाय नहीं, बड़ी पूंजी की आमद नहीं है, उसके घर से कोई सपोर्ट नहीं है, तो वह दिल्ली में महंगी गाड़ियां कैसे रख सकता है और उसका रखरखाव कर सकता है? यही नहीं अपने क्षेत्र में महंगी गाड़ियां रखने के साथ-साथ, अन्य चार-पांच न्यूनतम गाड़ियां लेकर वह कैसे चलता है? मैं एक नये सांसद की बात कर रहा हूं. पिछले 10-11 महीनों से मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा है कि अगर मैं प्रभात खबर से जुड़ा नहीं होता, तो एक सांसद के रूप में जो चीजें मुझे उपलब्ध हैं, उसकी बदौलत एक गाड़ी से अधिक मेनेटेन करना असंभव है. गाड़ियों का काफिला लेकर चलने की बात दूर छोड़ दें. इस पृष्ठभूमि में मैं कई राजनेताओं को देखता हूं. वे एक-दो टर्म ही विधायक या सांसद रहे, पर खुद महंगी गाड़ियों पर चढ़ते ही हैं, उनके आगे-पीछे कई गाड़ियां चलती हैं. सांसद हैं, तो दिल्ली में गाड़ी रखते हैं. जिस राज्य से सांसद हैं, उस राज्य की राजधानी में रखते हैं. फिर अपने क्षेत्र में रखते हैं. यह कैसे संभव है? स्पष्ट नहीं होता. सांसद बना. फिर लोकसभा चुनाव आ गये. इसमें व्यस्त रहने के कारण तत्काल शपथ नहीं ली. बाकी लोगों में शपथ लेने की जल्दी थी, ताकि सांसद के रूप में मिलनेवाली सुविधाएं शुरू हो जायें. विलंब से, जब पहले दिन संसद पहुंचा, अपना प्रमाणपत्र लेने, अपना परिचयपत्र बनवाने, तो एक अजीब अनुभव हुआ. वह स्मृति में है. अपना चुनाव प्रमाणपत्र देने के साथ, परिचयपत्र बनवाना था. सांसदों के डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनते हैं, वह बनवाना था. उसके लिए एक स्टेटमेंट देना होता है कि आपके खिलाफ मुकदमें या मामले नहीं हैं. जब ऐसा स्टेटमेंट देने का फार्मेट मेरे सामने आया. मैंने कहा कि नहीं, मेरे खिलाफ कोई निजी मामला नहीं है, पर मैं एक अखबार के संपादक के रूप में काम करता रहा हूं, वहां मानहानि के जो मुकदमें होते हैं, उसमें कुछेक मेरे खिलाफ भी हैं. क्योंकि जब भी किसी खबर के खिलाफ मामला या शिकायत होती है या मानहानि का मुकदमा होता है, तो वह संपादक, मुद्रक, प्रकाशक आदि सब पर होता है. नियमत: मैं इस दायरे में हूं. यह सब विवरण चुनाव आयोग को दे रखा है. इसलिए डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनाने के लिए मैं कैसे कह सकता हूं कि मेरे खिलाफ मामले नहीं हैं. मुझे पता चला कि नहीं, आमतौर पर लोग ऐसा करते हैं. मैंने मना कर दिया. इसलिए तत्काल मुझे पासपोर्ट नहीं मिला. मैंने स्पष्टत: उसमें उल्लेख किया कि मेरे खिलाफ मानहानि के मामले हैं. फिर विमर्श के बाद पासपोर्ट बना. उसी तरह सांसदों को सेक्रेटेरियट के काम के लिए भत्ता रूप में लगभग 30 हजार रुपये मिलते हैं. यह तब मिलता है, जब आप अपने सहायक के नाम दे दें. चूंकि सांसद के रूप में मैं दिल्ली गया था, मेरा कोई ठौर-ठिकाना नहीं था. मेरा कोई सहायक नहीं था, इसलिए मैंने किसी का नाम नहीं दिया. मुझे पता चला कि नहीं यहां अपने घर के परिचित लोगों के, सगे-संबंधियों के नाम दे दें, ताकि यह भत्ता प्रतिमाह मिलने लगे. मैंने मना कर दिया. मैंने कहा कि जब तब ऐसे लोग मेरे साथ कामकाज के तौर पर नहीं जुड़ जाते, दिल्ली में घर नहीं मिल जाता, मैं ऐसे लोगों को रख नहीं लेता, तब तक मैं कुछ नहीं लूंगा. मुझे पता चला कि आमतौर से कुछ लोग ऐसे ही लेते हैं. तब मुझे याद आया, लगभग वर्ष भर पहले इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर कि कैसे लगभग एक वर्ष पहले तक कुछेक सांसद अपने बेटे, बेटी या सगे-संबंधियों के नाम अपने सहायक के रूप में दे देते थे. 

 

एक सामान्य व्यक्ति की तरह एक सांसद क्यों नहीं रह सकता? यह सवाल भी मेरे मन में उसी दिन शुरू हुआ, जिस दिन मुझे यह सूचना मिली कि मैं राज्यसभा जानेवाला हूं. इसलिए जब पटना में नामांकन दाखिल करने गया, तो अकेले गया. पटना सचिवालय में अपना नामांकन फाइल करने गया, तो देखा नामांकन करनेवाले लोग अपने-अपने समर्थकों के साथ आ रहे थे. चुनाव बाद भी मैं अकेले ही गया. प्रमाणपत्र लिया, तब भी अकेले. कोशिश की कि माला वगैरह से दूर रहूं. पार्टी की जो औपचारिकता थी, वो मैंने पूरी की. कपड़े का जहां तक सवाल था, तो जिस तरह रहता था, उसी तरह रहते हुए यह दायित्व संभालू, मन में इच्छा थी. इसलिए आमतौर से शर्ट-पैंट पहनते हुए, सामान्य कपड़े पहने हुए रहना, यह शुरू की दिनचर्या रही है, उसी तरह रहा. फिर एक सांसद मित्र ने मजाक में ही कहा कि लेफ्टिस्ट (वामपंथी) की तरह सोचिए, बात करिए, सिद्धांत रखिए. पर जीवन राइटिस्ट (दक्षिणपंथी) की तरह जीयें. यानी एक सांसद के तौर पर आपको जो सरकारी या व्यवस्थागत सुख-सुविधाएं मिलती हैं, उनका पूरी तरह उपयोग करें. और बात सामान्य लोगों की करें. मुझे लगा कि एक सांसद को जहाज में एक्जिक्यूटिव क्लास में यात्रा करने की अनुमति है. पर अगर सामान्य स्थिति में सामान्य श्रेणी में यात्रा कर सकता हूं, अब तक करता रहा हूं, तो क्यों करूं, बिजनेस क्लास में? यह देश का पैसा है, टैक्स देनेवालों का पैसा है. इसलिए तब से आज तक सिर्फ एक-दो बार, खास परिस्थितियों के कारण एक्जिक्यूटिव क्लास में हवाई यात्रा की. शेष लगभग 99 फीसदी यात्रा सामान्य क्लास में. सबसे सस्ता विमान टिकट लेकर यात्रा करने की कोशिश की. पुन: सांसद होते ही, अपनी यात्रा में, चाहे रेल से जा रहे हों या किसी अन्य साधन से, राजनेता यह एहसास कराते हैं कि राजनीतिज्ञ (सांसद-विधायक), समाज के विशिष्ट व्यक्ति हैं. इससे दूर रहना चाहता था. इसलिए हवाई जहाज में सामान्य श्रेणी की यात्रा या रेल यात्रा भी करनी है, तो खुद अपना सामान खुद उठाया. अगर कुछेक बैग अधिक रहे, तब किसी की मदद ली. नहीं तो अपना सामान एक सीमा तक खुद ढोना. एयरपोर्ट पर आगे बढ़कर अपने सांसद होने का या खास होने का परिचय नहीं बताना. आमतौर से स्थिति यह रहती है कि सांसदों के पास जो दो चार लोग रहते हैं, वे उनके पहुंचते ही वीवीआइपी रूम खुलवाते हैं, उनके अलग से बैठने की व्यवस्था करते हैं. उनकी विशिष्टता के बारे में आसपास के लोगों को बताते हैं. वहां के अधिकारियों को एहसास कराते हैं. इस तरह से लोगों से अपने बारे में कहना वल्गर लगता है. गांधी, लोहिया, जेपी की परंपरा में कहूं, तो अश्लीलता जैसी. इसलिए अब तक इससे बचता रहा. कुछ खास होने का एहसास कराना, यह राजनीति में दिखाई देती है. उससे बचना. एयरपोर्ट पर भी आम लोगों के बीच बैठना, उसी तरह चेकिंग कराना, साथ खड़े लोगों को यह एहसास तक नहीं होने देना कि हम समाज के आम लोगों से अलग हैं. लगभग आठ महीने बाद आवास आवंटित हुआ. उसमें थोड़ा बहुत काम हुआ. आवंटन के समय मैंने कहा था कि जो मामूली काम है, उसे आप करा दें, ताकि रहने लायक हो जाये. मेरी कोई खास पसंद नहीं है. स्पष्ट कर दूं, ऐसा जीने-करनेवालों में मैं अकेले नहीं हूं. अनेक सांसद-विधायक हैं. खासतौर से साम्यवादी-समाजवादी पृष्ठभूमि के. पहले के चाहे कांग्रेसी हों या जनसंघी या अन्य, अधिसंख्य गांधीवादी जीवन शैली में रहते-जीते थे. 

 

एक एयरपोर्ट पर, एक दिन बहुत रोचक दृश्य देखा. केंद्र सरकार (यूपीए) के मंत्री रहे एक व्यक्ति थे. पहले जेपी भक्त थे. जनता पार्टी में थे. बाद में कांग्रेसी हो गये. वह जहाज से उतर कर टर्मिनल तक बस से नहीं गये. सबके साथ वे जहाज से उतरे. एक दूसरे आदिवासी क्षेत्र के मंत्री (एनडीए) भी उतरे, वह अपना सूटकेस लेकर जा रहे थे. लेकिन पूर्वमंत्री तब तक वहां खड़े रहे, जब तक वीआइपी गाड़ी उन्हें लेने नहीं आ गयी. दिल्ली एयरपोर्ट पर भी ऐसा एक और दृश्य देखा. एक सज्जन, जो आज से छह साल पहले केंद्र में मंत्री रहे थे, यूपीए- एक में. अब किसी पद पर नहीं हैं. पर जिस एयरलाइंस से हम सब आ रहे थे, एयरपोर्ट से प्लेन पकड़ने के लिए वह कॉमन बस से नहीं आये. उनके लिए अलग वीआइपी गाड़ी की व्यवस्था की गयी. ऐसे अनेक दृश्य रोज दिखते हैं. 

 

दरअसल, गुजरे महीनों में यह सारा जो जद्दोजहद रहा, वह इस मानस के कारण कि सांसद बनकर सामान्य नागरिक की तरह क्यों नहीं रहा जा सकता? देखता हूं कि भाजपा के बड़े नेता दीनदयालजी की बातें करते हैं. उन्हें योजनाओं के द्वारा अमर बनाने की कोशिश करते हैं. हम सब तो लोहिया, जेपी की बात करते रहे हैं. पर आज सार्वजनिक जीवन में सादगी के प्रति आदर है? आप राजनीति में मामूली विधायक या जिला परिषद के सदस्य या मुखिया हैं, तो आप खास हैं, यह एहसास सामनेवाले को कराना जरूरी हो गया है. यह है, नये दौर की राजनीति. अगर राजनीति को सचमुच बदलना है, तो सोचने का तरीका बदलना होगा. यह याद दिलाना होगा कि यह देश कामराज का है, लालबहादुर शास्त्री जैसे नेताओं का है, यह लोहिया जैसे नेताओं का है, जो दो जोड़ी कुरता-धोती लेकर रेल में यात्रा करते रहे. ऐसे लोगों की बड़ी जमात है. रामसुभग सिंह, रामसेवक यादव, भोला पासवान शास्त्री, कर्पूरी ठाकुर, रामानंद तिवारी जैसे लोग आज स्मृति में हैं? समाज की प्रेरणा के स्रोत हैं? मैं मानता हूं कि यह दौर पैसे का दौर है, लोभ व लाभ का दौर है, भोग का दौर है, इसमें अगर आपके पास संसाधन नहीं है, तो आप समाज में टिक नहीं सकते हैं. समाज का सामाजिक आधार, भावात्मक आधार टूट चुका है. पहले गांवों में संयुक्त परिवार होते थे. वह ढांचा बिखर चुका है. इस तरह सोशल सपोर्ट सिस्टम टूट गया है. इसलिए आज एक ईमानदार आदमी को भी जीवन के अंतिम दौर के लिए ईमानदार तरीके से संग्रह या संचय कर जीना जरूरी है. अपनी चिकित्सा के लिए. बेतहाशा बढ़ते दबावों के बीच सामान्य जीवन स्वाभिमान के साथ जीने के लिए. पर यह सब एक सीमा तक. यह सीमा खुद तय करनी है. इस सीमा का अतिक्रमण होना लोभ है.  

  

राज्यसभा में आने के बाद अनेक लोगों ने संपर्क करना शुरू किया कि मेरे बच्चे का नामांकन करा दें. आमतौर से मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि सिस्टम ऐसा हो कि बच्चा जन्म ले या बच्ची जन्म ले, तो आसपास स्थित स्कूलों में स्वत: उसका दाखिला हो जाये. चीन में यह व्यवस्था है. जिस मुहल्ले में आप रहते हैं, उस मुहल्ले के स्कूल में ही आपके बच्चे पढ़ सकते हैं. साम्यवादी देश चीन में ही सिर्फ यह व्यवस्था नहीं है. ऐसी ही व्यवस्था पूंजीवादी देश, अमेरिका में भी है. पर गांधी के देश में एकसमान शिक्षा की व्यवस्था महज सपना रह गया. बहरहाल, मुझे पता चला कि सांसद के पास यह कोटा है कि एक सांसद होने के नाते वह छह बच्चों को नामांकन के लिए सेंट्रल स्कूल में अनुमोदन कर सकता है. इसके तहत सबसे पहले मुख्यमंत्री के निवास पर एक चपरासी मिला था. तब सांसद बना भी नहीं था, पेपर भरने जा रहा था कि उसने अपने दो बच्चों के नाम एडमिशन के लिए दिये. तब तक मुझे अपने कोटे की उपलब्धता के बारे में जानकारी नहीं थी. मुझे लगा कि उसने कहा कि जब आप सांसद हो जायेंगे, तो सांसद होने के प्रभाव के तहत यह दाखिला करायेंगे. पर बाद में पता चला कि नहीं एक सांसद को सेंट्रल स्कूल में नामंकन कराने के लिए कोटा है. सही रूप में आप पूछें तो किसी भी तरह के सांसदों के ऐसे कोटे या विशेषाधिकारों के खिलाफ हूं. एक सांसद को प्राथमिकता के आधार पर किसी को टेलिफोन या गैस देने-दिलाने की बात पहले हुआ करती थी. बजाज स्कूटर या और भी कई चीजों के आवंटन के विशेषाधिकार होते थे. निजी दृष्टि में ये चीजें गलत हैं. पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी, क्यों सांसद-मंत्री बांटे? हमारे समाज में स्पष्ट नीति होनी चाहिए, ताकि गैस हो, टेलिफोन हो, गाड़ी या स्कूटर हो... ये सब चीजें उस नीति के तहत लोगों तक पहुंचे. नीतियां बनाने का काम जरूर राजनीति के हाथ है. पर अपने हाथ में विशेषाधिकार रखना, तो एक गैर बराबरी वाले समाज को जन्म देना है. पर भारत के शासक या राजनेता, चाहे वह किसी पंथ या विचारधारा के रहे हों, पिछले साठ वर्षों में, अपने अधिकार कम करने की ओर कम उन्मुख हुए. गांधी के सपनों के तहत. अभी यह यात्रा पूरी होनी बाकी है. यह सही है कि अब टेलिफोन या गैस देने का वह विशेषाधिकार नहीं रहा, क्योंकि बाजार में यह प्रचुरता से उपलब्ध है. अब ऐसी चीजें आप देने भी जायें, तो कोई लेनेवाला नहीं मिलेगा? इसलिए जो चीजें हम सबको दे सकते हैं, उनके लिए नियम या नीति बनाकर हमें चलना चाहिए. सांसद होने की वजह से या ताकतवर राजनीतिज्ञ होने की वहज से कोई किसी मनपसंद या खास का भला करे, ऐसी व्यवस्था नहीं होनी चाहिए. फिर भी जब यह अधिकार था, तो इस अधिकार के तहत उस चपरासी के एक बेटे को एडमिशन के लिए रिकमेंड किया. मेरे गांव के एक अध्यापक हुआ करते थे. वह थे, तो किसी और जगह के. बाद में उनकी हत्या हो गयी थी, उनके  बेटे के बेटे यानी पौत्र को, जो कक्षा चार में होगा, पढ़ने में अच्छा था, लेकिन गांव में पढ़ रहा था, उसे चुना. गुरु ऋण. तीसरा एक मेरे परिचित व्यक्ति के ड्राइवर के बेटे को, जिसे बड़ी इच्छा थी कि वह कहीं अच्छा स्कूल में पढ़े, उसका दाखिला कराया. हालांकि उस ड्राइवर से मेरा निजी परिचय या मिलन नहीं हुआ है. एक पार्टी कार्यकर्ता, जो पार्टी में बहुत दिनों से काम कर रहे हैं, उन्होंने एप्रोच किया. सीतामढ़ी के एक गांव के एक किसान परिवार के बच्चे को करवाया. इस तरह ऐसे लोगों के बच्चों के बीच अपना एक-एक कोटा बांट दिया. इसके लिए संबंधित कार्यालयों को लिखा. लिखने के बाद भी मेरे मन में यह सवाल उठता रहा है कि क्या हम कोई ऐसी व्यवस्था बना सकते हैं, जहां पूरे देश में एक समान, एक स्तर के स्कूल हों. नीतीश कुमार ने बड़ी पहल की थी, जब वह बिहार में, सत्ता में आये थे. समान शिक्षा की नीति. जहां तक मुझे ज्ञात है, पूर्व विदेश सचिव मुचकुंद दुबे इस समिति के अध्यक्ष थे. उन्होंने रिपोर्ट भी तैयार की थी. पर बाद में अनेक राजनीतिक कारणों में उलझने के बाद शायद रिपोर्ट पीछे छूट गयी. पर एक राज्य चाहे भी, तो यह बड़ा कदम नहीं उठा सकता है. यह कदम नयी राजनीति का एजेंडा होना चाहिए. साथ ही यह कदम पूरे देश में एक साथ उठना चाहिए. ऐसे सारे बुनियादी सवालों से नयी राजनीति शुरू हो, तो शायद संभव है. पर उस नयी राजनीति का माहौल अभी दिखायी नहीं देता. आज की राजनीति सत्ता तक सीमित हो गयी है. राजनीति का मकसद सत्ता पाना है. आज से सात-आठ महीने पहले, जो लोग सत्ता पाने के लिए बड़े सपने, बदलाव की बड़ी-बड़ी बातें और धरती पर स्वर्ग उतार देने की बात किया करते थे, क्या वे आज ऐसे बड़े परिवर्तन, जिससे समाज बदले, समाज में समानता आये, उठा पा रहे हैं? नहीं कर पा रहे हैं. 

 

पार्लियामेंट का दो सत्र नजदीक से देखा. राष्ट्रपति का संबोधन देखा, उसके बाद बजट सत्र देखा. बजट सत्र में दो बार, दो विषयों पर बोला भी. पर प्रभात खबर के स्थापना दिवस यानी 14 अगस्त 2014 को मुझे रांची आना पड़ा. उस दिन इस बजट सत्र का अंतिम दिन था. उस दिन उपस्थित नहीं रह सका. नहीं तो रोज समय से सदन जाना और बैठने का काम किया. गंभीरता से. बहुत इन्वाल्व होकर. दो दिनों का नये सांसदों का प्रशिक्षण हुआ. उसमें उपस्थित रहा. हालांकि इसमें कम लोग रहे, पर मैं रहा. डिफेंस कमेटी, हाउस कमेटी का सदस्य बना. डिफेंस कमेटी के आरंभिक दो बैठकों में रहा. बाद की दो-तीन बैठकों में छठ और अन्य व्यस्तता के कारण उपस्थित नहीं हो सका. उनके टूर कार्यक्रम में नहीं जा सका. चूंकि दिल्ली में तब तक आवास नहीं मिल सका था. (दिसंबर 6-7 के पास आवास मिला. पर पूरी व्यवस्था करने में 20-25 दिन लगे). आवास पाना भी जटिल प्रक्रिया है. अगर आपका प्रभाव नहीं है. एसर्ट नहीं कर सकते. निजी तौर पर दबदबा नहीं है, तो आपकी चीजें सामान्य गति से चलती हैं. और सामान्य गति यही है कि घर आवंटन, जो जुलाई-अगस्त तक हो जाना चाहिए था. दिसंबर में हुआ. पहला घर जो उन्होंने दिखाया, वह छोटा था. इसमें एक-दो  कमरे अधिक है, इसे लेने में थोड़ा विलंब हुआ. बहरहाल, संसद में जाने पर यह एहसास हुआ कि दिल्ली में निवास हो, एक छोटा कार्यालय हो, काम को गंभीरता से लिया जाये, तो एक सीमा के तहत सार्थक हस्तक्षेप संसदीय कार्यों में संभव है. पर देश में एक नयी राजनीति शुरू करने के लिए, नयी राजनीति का वाहक बनने के लिए, देश जिस मोड़ पर खड़ा है, उस मोड़ पर कुछ नया करने के लिए बड़ा मंच चाहिए. बड़ा मंच का आशय बड़े संगठन से नहीं है. विचार बहुत प्रभावी हो, तो मंच बड़े बन जाते हैं. गांधी का विचार प्रभावी था, लोहिया, जयप्रकाश खड़े हुए. उनके साथ समाजवादी विचारधारा थी. उनके शब्द और कर्म में एका होने की ताकत थी, तो मंच बड़े बन गये. आज देश में ऐसे लोगों की जरूरत है, जो एक बड़े सपने दिखा सकें. 

 

आज उम्र 59 वर्ष के आसपास है, पर राजनीति का अनुभव छोटा है. राजनीति को दूर से देखने का लंबा अनुभव रहा. राजनीति, समाज या आज के दौर को हम कैसे देखते हैं.? इसकी थोड़ी पृष्ठभूमि शेयर करना चाहूंगा. पहले आज के दौर पर नजर डालें. आज राजनीति को हम कैसे देखते हैं? मशहूर उपन्यासकार हुए, चार्ल्स डिकिंस. अंग्रेजी सभ्यता जब दुनिया में परवान चढ़ रही थी, उसका प्रभुत्व ...... फैल रहा था. औद्योगिक क्रांति हो रही थी, उस वक्त उन्होंने कई उपन्यास लिखे, जिनके लिए आज भी वह याद किये जाते हैं. उनका एक बहुत चर्चित उपन्यास रहा है, ए टेल आफ टू सिटीज (दो शहरों की कथा). पिछले दिनों सीबीआइ आफिसर्स कन्वेंशन हुआ, दिल्ली में. उसमें इसकी चर्चा हुई. हम किस दौर से गुजर रहे हैं, इस विषय पर बोलते हुए गोपाल कृष्ण गांधी ने चार्ल्स डिकिंस को कोट किया. कोई मुझे कहे कि आप अपने समय को डिफाइन (व्याख्या) करें, तो इससे बेहतर उद्धरण नहीं हो सकता. यह पंक्ति यहां लिख रहा हूं, ताकि जिस युग में हम सब जी रहे हैं, मेरी दृष्टि में, वह मैं आपको कन्वे (बता) कर सकूं. अंग्रेजी में है, इट वाज द वर्स्ट ऑफ टाइम (यह सबसे खराब दौर था), इट वाज द ऐज आफ विज्डम (पर यह सबसे अधिक बुद्धिमत्ता, ज्ञान का भी दौर था), इट वाज द ऐज आफ फुलिशनेश (यह मूर्खता का भी दौर था), इट वाज द एपक आफ विलीव (पर यह आस्था का समय भी था), इट वाज द एपक आफ क्रेडिबिलीटी, इट वाज द सीजन आफ लाइट (यह विश्वास का भी दौर था, यह प्रकाश का भी दौर था), इट वाज द सीजन आफ डार्कनेस (यह अंधकार का भी दौर था), बट इट वाज ए स्प्रिंग ऑफ होप (पर यह उम्मीद का वसंत भी था), इट वाज द विंटर आफ डिस्पेयर (यह निराशा का सर्दकाल था). मुझे लगता है कि हमारे समय को अगर परिभाषित करना हो, तो इससे उम्दा पंक्ति नहीं हो सकती थी. इस दौर में हम सब ने जीवन का दरस-बरस किया. पर जो राजनीति, जिसे हम सब ने विद्यार्थी जीवन में महसूस किया, वह राजनीति कैसी थी? किशोरावस्था या युवावस्था के दौरान दिमाग में जिस राजनीति का असर रहा, वह राजनीति थी, बदलाव की. वह राजनीति थी, विरोध की. वह राजनीति थी, रिवेल (बागी) होने की. चेग्वेरा की राजनीति, लोहिया की राजनीति, जेपी की राजनीति, गांधी की राजनीति. भारतीय आजादी की लड़ाई में जितने बड़े लोग हुए, वाम से दक्षिण तक उन सबके संघर्ष के प्रति आस्था और सम्मान का बोध. एक तरफ नक्सली आंदोलन (शुरू के) के प्रति आकर्षण, दूसरी तरफ बिहार आंदोलन से जुड़ाव. हमारी पीढ़ी की आस्था इस तरह की राजनीति के प्रति रही. यानी वह राजनीति जो त्याग, बदलाव, विरोध, मर्यादा, चरित्र, वसूल, मूल्यों, विचारों, सात्विकता और आध्यात्मिकता से जुड़ी हो. एक शब्द में कहें, तो वह राजनीति जो समाज के अंधेरे में रोशनी का काम करे. राजनीति की यह रोमांटिक छवि, हमारी पीढ़ी के पास रही है. हमें अवसर मिला, कम से कम तीन राजनेताओं को करीब से देखने का. उस जमाने में जेपी को देखना-जानना हुआ, तब बालक या किशोर था. मैं उसी गांव से था, जहां के जेपी रहनेवाले थे, इसलिए कुछ पारिवारिक संबंध की वजह से भी उन्हें करीब से जानने-देखने का मौका मिला. बाद में श्री चंद्रशेखर और फिर हाल के दिनों में नीतीश कुमार. कम से कम इन तीन को मैं थोड़ा करीब से जानता-देखता हूं. इन तीनों का असर मन पर है. विचार पर है.

 

हमारी पीढ़ी के दौर में ही यह तय होना शुरू हुआ कि राजनीति किधर जायेगी? आज जब मैं देखता हूं, तो राजनीति के दो ही रास्ते हैं. पहला गांधी का रास्ता. 2000 वर्षों बाद दुनिया को किसी ने दिखाया कि राजनीति का एक अलग रास्ता भी है. दूसरा रास्ता, जो चार सौ वर्षों पहले मेकियावेली ने दिखाया था. वह द प्रिंस पुस्तक के भी लेखक हैं. दुनिया की चर्चित किताब. उन्होंने बताया था कि राजनीति का अर्थ है, किसी तरह सत्ता पाना. गांधी ने कहा, नहीं राजनीति का अर्थ सिर्फ सत्ता पाना नहीं है. सत्ता किस रास्ते से पाते हैं, वह रास्ता, साधन और साध्य का एका बहुत महत्वपूर्ण है. मैकियावेली ने कहा कि नहीं साधन महत्वपूर्ण नहीं है, साध्य का हर अनीति भरा रास्ता महत्वपूर्ण है. इस तरह इन दो रास्तों के बीच दुनिया की राजनीति चली. 1991 से पहले की भारतीय राजनीति में किसी न किसी प्रकार से गांधी की राजनीति का असर रहा. 1991 के बाद धीरे-धीरे कम होने लगा. और 2005 के बाद तो पूरी तरह से मैकियावेली के दर्शन की ओर भारतीय राजनीति चल पड़ी. खासतौर से बड़ी पार्टियों की राजनीति.  

 

पत्रकारिता में रहते हुए हमारी पीढ़ी को पुरानी पीढ़ी से कुछ चीजें, मर्यादा के रूप में, संयम के रूप में, आत्मसंयम-आत्मअनुशासन के रूप में मिली. स्वत: निजी उदाहरण की प्रेरणा से. देश के अच्छे और बड़े पत्रकारों के साथ काम करने का मौका मिला. उनसे ही सीखा कि जिस विधा में हम हैं, उसमें अपनी पब्लिसिटी न करें. काम करने-जीवन जीने की अपनी आचारसंहिता पर चलें. इसलिए हमने अपने लिए एक लक्ष्मण रेखा तय कर ली. खुद की तस्वीर-बयान न छापना. अपने कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति का नाम भर रहे. आत्मप्रचार से दूर. लगभग 36 वर्षों तक यह पालन भी किया. पर जिस दिन राज्यसभा के लिए नामांकन हुआ, उस दिन खुद से जुड़े तथ्य, जिनमें से कुछेक की जरूरत भी नहीं थी, सार्वजनिक की. हर अखबार में भेजा. अपने अखबार में भी. कारण सार्वजनिक जीवन में जब हम जायें, तो उसकी मर्यादा मानें. राजनीति से बाहर रहकर जब हम अपेक्षा करते हैं कि सार्वजनिक जीवन जीनेवाले अपनी सारी बातें उजागर करें, तो हमें भी यह करना चाहिए. इसी भावना के तहत. पहली बार नामांकन भरने के दौरान मुझे खुद भी अपनी संपत्ति का ब्योरा पता चला. अखबार में हमलोग राजनेताओं की संपत्ति के ब्योरा छापते हैं. पर वह किस आधार पर गणना (कैलकुलेट) होता है, यह जब मैं खुद देखा, तो अनुभव हुआ.  

 

लगभग 38 वर्ष हुए मुझे नौकरी करते. अच्छी जगहों पर नौकरियां की. पहले टाइम्स आफ इंडिया ग्रुप, फिर बैंक आफ इंडिया में अधिकारी के तौर पर, फिर आनंद बाजार पत्रिका में, फिर प्रधानमंत्री कार्यालय में, फिर प्रभात खबर में. इस बीच कई बड़े घरानों से बड़े आफर मिले. इससे भी पहले भारतीय रिजर्व बैंक में अफसर के रूप में चयन हुआ था. किसान पृष्ठभूमि से हूं. शुरू से मन में बात रही कि अपने अनुसार काम करना है. हालांकि व्यावहारिक ज्ञान था और तब भी समझता था, आज भी समझता हूं कि नौकरी कहीं भी सौ फीसदी अपनी शर्तों पर नहीं होती. पर चुनना होता है कि कहां न्यूनतम समझौता करना होगा और कहां सौ फीसदी दूसरे के अधीन रहना होगा. शुरू से ही पहले रास्ते पर चला. दूसरे रास्ते पर आकर्षक और बड़े ऑफरों को छोड़ कर. यह व्यावहारिक तथ्य पता है कि सबको मुकम्मल जहां नहीं मिलता. यानी सबकुछ एक साथ, एक जगह, अपनी शर्तों पर नहीं मिलता. यही जीवन है. समूह में हम रहते हैं, तो समूह की शर्तें भी स्वीकार करनी पड़ती है. इसलिए जब-जब आफर मिले, तब-तब यह भी चुना कि कहां अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्तता और कुछ करने का अवसर है. 

 

हमारी पीढ़ी तक यह भी नहीं था कि नौकरी, घर, गाड़ी, बैंक बैलेंस...आदि एक साथ हो जाये, नौकरी में आते ही. किसान मानस में कर्ज लेना बुरा मानते थे, आज भी बुरा मानते हैं. जो मिले, उसमें संतोष के साथ रहना. यह उस दौर का आम मानस था. अपने दायरे से बाहर जाकर चादर न फैलाना या ऋण लेकर घी न पीना, यही संस्कार या मूल्य परिवार से मिले, जो आज तक है. 

 

नामांकन भरते वक्त गणना (संपत्ति गणना के लिए तय फार्मेट) से पता चला कि  हमारी कुल संपत्ति 4.75 करोड़ है. मुझे खुद यकीन नहीं हुआ. पर कैसे? गांव में पुश्तैनी साढ़े सोलह एकड़ जमीन है. दो राज्यों, बिहार और उत्तर प्रदेश में. इसमें से कुछ हिस्सा गंगा की पेट में है. यानी वहां नदी का प्रवाह है. संभव है कि 30-40 वर्षों बाद यह जमीन दियारा के रूप में उभरे. तब तक पता नहीं, उस पर किसका आधिपत्य होगा? पर आज वह हमारे नाम से है, तो बाजार के आधार पर उसकी कीमत का मैं मालिक हूं. लगभग 1.9 करोड़ यानी दो करोड़. यह गांव की जमीन है. अब बचा 2.75 करोड़. इसमें रांची में बहुत पहले लगभग 14 लाख में एक फ्लैट लिया था, जिसकी बाजार की कीमत आज बहुत अधिक है. इसी तरह गाजियाबाद में 1998-99 के आसपास जनसत्ता कोऑपरेटिव सोसाइटी में कर्ज लेकर, जिसे लगभग 10 वर्षों में भुगतान किया, तकरीबन 9-10 लाख रुपये में यह एक फ्लैट मिला. इसकी भी बाजार कीमत आज बहुत अधिक है. ये दोनों फ्लैट, जो बहुत कम कीमतों पर लिये गये थे, आज सरकारी दर पर इनकी तय कीमतें अधिक है. इन दो फ्लैटों की सरकारी कीमत ही लगभग सवा करोड़ से अधिक है. तब बमुश्किल  ये दोनों 23-24 लाख रुपये के बीच होंगे. वह भी लोन लेकर खरीदे गये, जो वर्षों तक चुकाने के बाद खत्म हुए.  इसी तरह परिवार में घर से मिले पत्नी के जेवर वगैरह की कीमत है. रांची में 25 डिसमिल जमीन बहुत पहले खरीदी गयी थी, आज उसकी कीमत भी काफी अधिक है. सरकारी मूल्य पर. स्टेट बैंक से लगभग पांच लाख कर्ज लेकर दशकों पहले एक छोटी पुस्तक की दुकान खोलने की इच्छा हुई, तो जगह ली. उसकी सरकारी दर पर तय कीमत भी आज अधिक है. इसी तरह जो चीजें कर्ज लेकर बहुत कम कीमत पर खरीदी गयी, उनकी सरकारी कीमत आज बढ़कर अधिक हो गयी. इस तरह की गणना से पता चला कि मैं भी कुछेक करोड़ का मालिक हूं. इस बीच लगभग 26-27 लाख का कर्ज भी है. हां, यह कह सकते हैं कि अब ठीकठाक पटरी पर जीवन है. लगभग तीन-चार साल पहले प्रभात खबर में भी हमसब का वेतन सुधारा गया. जब जीवन की शुरुआत की, तब अक्खड़पन ज्यादा था. हमेशा रहा कि अपनी टेक पर ही रहे. इसलिए तय किया कि जो आमद है, उसमें ही जीवन जीयेंगे. फिर भी धर्मयुग और रविवार में काम करते हुए दो बार कर्ज लेना पड़ा. एक बार दो हजार रुपये, मुंबई में किराये के घर की पगड़ी देने के लिए. दूसरी बार तीन हजार रुपये, सेकेंड हैंड टीवी खरीदने के लिए. वर्ना कूकर से लेकर फ्रीज तक सबकुछ शुरू में किस्त पर ही लिया. फिर भी यह विश्वास रहा कि कोई संकट होगा, तो गांव है. घर है. तब गांवों में सामूहिक प्रवृति थी. संयुक्त परिवार थे. किसी को मदद करने की प्रवृति थी. आज वह सब खत्म है. अब वह सामाजिक सुरक्षा का बोध नहीं है. उत्तर प्रदेश के गांवों में लाखों लोग भटक रहे हैं कि उनके स्वजनों ने उनकी जमीन अपने नाम से कर ली, उनको मृतक बता कर. यह लोग बाहर रह कर नौकरी करते थे. अब वे जीवित होते हुए भी, अपने जीवित होने का सबूत लेकर अदालतों में खड़े हैं, पर अदालती कागजों में, विक्रय के कागजातों में वे मृत घोषित हैं. क्योंकि उनके स्वजनों ने उन्हें बिना बताये, उन्हें मृत बताकर उनकी जमीन की सौदेबाजी कर ली. यह आज के गांव हैं. जब हम सब ने गांव छोड़ा (70 के दशक में) तब गांव ऐसे थे, जहां अनेक दूसरे राज्यों से आयी विधवाओं, बेसहारा लोगों को सुरक्षा और मदद देते हमने देखा. इसलिए अब वो सुरक्षा बोध नहीं है. इसलिए अब चौकस रहता हूं कि फिजूलखर्ची न हो, क्लब, होटल न जाये, पीने-पिलाने की आदत शुरू से ही नहीं थी. तत्पर रहता हूं कि अब उपभोक्तावादी मानस न हो. फिर भी आंशिक रूप से यह चीज मन में रही, कि आर्थिक रूप से ठीक रहे, किसी के सामने हाथ न फैलाना पड़े. बुनियादी चीजें मिल जाये. अब रिटायर होने के दौर में आकर एक बात खटकती है, अब खुद जीना है. खुद की देखभाल करनी है. ओल्ड एज होम में भी आप जाते हैं, तो वहां न्यूनतम डेढ़-दो करोड़ के छोटे-छोटे घर मिलते हैं. फिर मेडिकल खर्च वगैरह सबसे बड़ी चुनौती है. मामूली बीमारी में भी आज दवाओं, अस्पतालों या चेकअप कराने में काफी खर्च होते हैं. इसलिए 58 वर्ष की उम्र, जो पत्रकारिता में सेवानिवृत्त होने की उम्र है, में आकर यह एहसास बढ़ा कि शेष दौर में भी कहीं हाथ फैलाने का अवसर ईश्वर न दे, ऐसा ही जीवन हो. अपने पैरों पर, अपनी क्षमता के अनुसार चीजें चलें, यही कोशिश है. सक्रियता के वर्षों में, आज के दौर के युवाओं की तरह हमारी पीढ़ी में आर्थिक सवाल मुख्य मकसद नहीं रहे. आर्थिक अनिश्चितता के इस दौर में अब लगता है कि न ढंग से एलआइसी कराया, न अन्य कोई सुरक्षा व्यवस्था. न आर्थिक प्लानिंग. संयुक्त परिवार की पृष्ठभूमि में सामूहिक सुरक्षा अपरोक्ष मानस में रहता था. अब यह नया युग है. इस युग की मान्यताएं अलग हैं, पर इसके अनुरूप अपनी तैयारी नहीं है. रिटायरमेंट के बाद पीएफ ही एकमात्र नियमित आय का स्रोत रहेगा. पर इस तरह जीने का एक अलग आनंद रहा.  

 

जिस परिवेश-माहौल में पढ़ा, दुनिया देखी-समझी, संस्कार-सोच पनपे-मिले, वह दुनिया अर्थप्रधान नहीं थी. अन्यथा रिजर्व बैंक की नौकरी की होती या मीडिया में जो बड़े ऑफर (समयबद्ध शेयर भुगतान के साथ) मिले, वहां होता. पर हर बार लगता था, नहीं जहां तुलनात्मक स्वतंत्रता है, वही अपना ठौर है. इसके पीछे अप्रत्यक्ष रूप से शायद गांव का मानस था कि गांव है, पुश्तैनी घर है, कुछ खेत है, गांव की पुरानी साझी संस्कृति है, तो एक अपरोक्ष भरोसेमंद सुरक्षा है. परिवार में अनेक बड़े भाइयों को देखा था, नौकरी पर गये, मन नहीं लगा या स्वाभिमान पर चोट पहुंची, वापस गांव आ गये. खेती की. तब खेतिहर किसानों के पुराने संस्कार में था कि खेती श्रेष्ठ है, नौकरी या चाकरी तो गुलामी है. पर गांव की वह पुरानी साझी संस्कृति, वह अपनापन, वह पारंपरिक सपोर्ट सिस्टम सब धीरे-धीरे खत्म हो चुका है. गांव में भी एक नयी आत्मकेंद्रित दुनिया बन चुकी है. इसलिए गांव में ही रहीम को जाना. रहीम का कथन भी गांवों में ही सुना, जो स्वभाव में बस सा गया है. 

 

रहिमन वे नर मर चुके, तो कहुं मांगन जांही

उनसे पहिले वे मुए, जिन मुख निकसत नाहि,

 

इसलिए किसी से भी कुछ मांगने, कोई अपनी निजी बात कहने, कोई निजी फेवर लेने में आत्म प्रतिबंध जैसा है. कुछ कहने में हिचक होती है. आत्म बंधन जैसा. संकोच. अब तक जीवन में इसका निर्वाह हुआ. आगे भी यह बना रहे. परमात्मा से यही प्रार्थना है. 

  

पर पिछले बीस वर्षों में जैसे संसार चक्र घूम गया है. हम बिल्कुल अर्थप्रधान युग में हैं. अपने बल रहना, जीना, गुजर करना है. उम्र के इस पड़ाव पर (पत्रकारिता पेशे में रिटायर होने की उम्र) कभी-कभार ख्याल आता है कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा योजना कैसी हो? अब भी यह विचार जब उभरता है, तो पहली चीज मस्तिष्क में कौंधती है, इस नश्वर संसार में सुरक्षा कैसी? यह तो सृष्टि-प्रकृति या प्रभु के हाथ है. अब तक जीवन अनप्लांड रहा, तो अब प्लान क्या है? समय या काल ने जैसे यहां तक पहुंचाया, वही आगे की सुध लेगा. पर हम पत्रकारों को न निश्चित पेंशन है, न तय प्रतिमाह कोई आय. आपका पीएफ और आपकी बचत ही आपका भविष्य है. इस तरह पीएफ और शेष बचत मिलाकर प्रतिमाह निश्चित घरेलू खर्च का बजट, बीमार-दवा का बंदोबस्त और जरूरी सामाजिक खर्चों (शादी, विवाह, रस्म-रिवाज या जरूरी यात्राएं) का प्रबंध हो जाये, एक सामान्य जिंदगी में यही चाहिए. न किसी के सामने ईश्वर ने हाथ फैलाने का अब तक मौका दिया, न आगे दे, यही कामना है. 

 

एक बार चंद्रशेखरजी ने अपने जीवन का एक प्रसंग सुनाया था. कांग्रेस कार्यसमिति की एक बैठक में कांग्रेस के चाणक्य मानेजानेवाले द्वारिका प्रसाद मिश्र (कांग्रेस कार्यसमिति की उस बैठक के बाद फिर श्री मिश्र किसी बैठक में नहीं आये, तब बिहार आंदोलन शुरू हो गया था और श्री चंद्रशेखर अपनी साफगोई के कारण इंदिराजी और कांग्रेसी नेतृत्व को खटकने लगे थे) ने उल्लेखनीय बात कही. चंद्रशेखर के तेवर और साफगोई के संबंध में. चंद्रशेखर को कहा - 

 

खुल खेलो संसार में, बांध सके न कोय.. 

घाट जकाती क्या करे, जो सिर बोझ न होय. 

 

कहना चाहूंगा, इन पंक्तियों ने प्रेरित किया है. शायद जीवन तो ऐसा नहीं जिया, पर इससे प्रेरणा मिलती है. 

 

एक अंर्तद्वंद्व भी उभरता है. आज जो आर्थिक सुरक्षा-असुरक्षा का सवाल है, वह समाज के सामने सर्वोपरि है. नब्बे के दशक में, जब एक अनिश्चित मुकाम पर आया. अखबार की दुनिया के दो बड़े घरानों को छोड़ कर एक ऐसी नौकरी चुनी, जहां बंद गली का दरवाजा दिखायी देता था. पैसा भी लगभग वही, ऊपर से भारी अनिश्चितता. तब आज जैसा माहौल होता, तो क्या यह जोखिम प्रभात खबर आ कर लेता? जो भी साथ काम करने आये, उन्हें जब-जब बड़े घरानों से आफर मिले, अधिक पैसे के प्रस्ताव मिले, तो उन्हें जाने के लिए प्रेरित किया. सार्वजनिक रूप से प्रभात खबर के पत्रकार साथियों की सार्वजनिक मीटिंग में कहता, जिन्हें भी अधिक पैसे के प्रस्ताव हैं, प्रभात खबर की अपेक्षा अधिक सुरक्षित जगहों पर जाने या बड़े घराने में जाने का मौका है, वह जायें. उन्हें प्रोत्साहित करता (इनमें अनेक ऐसे लोग थे, जिनके संग, साथ और श्रम ने प्रभात खबर को इस मुकाम तक पहुुंचाया). उन्हें दूसरी जगहों पर जाने के पीछे प्रेरित करने के पीछे एक नैतिक द्वंद्व था. अगर प्रभात खबर में कोई गहरा संकट आ गया, ऐसे साथी भी मुसीबत में आ गये, तो नैतिक और मानसिक रूप से अपराधबोध होगा. इसलिए ऐसा करता. फिर भी इस यात्रा में दो-चार साथी (संपादकीय में) ऐसे हैं, जिन्होंने बाहर के प्रस्तावों को छोड़ कर यहीं रहना चुना. प्रभात खबर को इस मुकाम तक पहुंचाया. प्रभात खबर की शुरुआत के हम तीन वरिष्ठ लोग, इन गुजरे 26 वर्षों में दो एक बार छोड़कर शायद ही अपने वेतन और सुविधाओं के लिए प्रबंधन के पास गये. 

 

आचार्य कृपलानी पर प्रकाशित एक नयी पुस्तक पढ़ रहा था. मैं उन मित्रों से खास आग्रह करना चाहूंगा, जिन्होंने आचार्य कृपलानी को बहुत गंभीरता से नहीं लिया है. आचार्य कृपलानी, एक अद्भुत इंसान थे. शाश्वत विद्रोही. आजादी मिलने तक, कांग्रेस के सबसे बड़े सिपाही रहे. आजादी के समय. फिर आजादी के बाद विपक्ष में रहकर देश बनाने की राजनीति की. उनका चरित्र भी कुछ उसी तरह का था. गांधी के विचारों के सबसे बेहतर, सटीक और सर्वश्रेष्ठ व्याख्याकार अगर कोई देश में हुआ, तो वह जे.बी कृपलानी थे. गांधी पर लिखी उनकी पुस्तकें दुनिया में पढ़ी जाती हैं. उतना बढ़िया गांधी का सम्यक विवेचन शायद ही किसी ने किया है. वही आचार्य कृपलानी, 15.04.1964 को, जब भारत सरकार के खिलाफ पहला अविश्वास प्रस्ताव लाये. उसमें कहा कि धर्मशास्त्रों में कहा गया कि हमारा शत्रु हमारे भीतर ही है. इसी तरह भ्रष्टाचार की जड़ें भी हमारे अंदर ही हैं. इसके लिए हमें अपने निजी सचिवों के मामले को देखना चाहिए. याद कीजिए, 1964 में जब गांधी का, नेहरू का प्रभाव जीवंत था. असर था. तब कृपलानी, ऐसे नेता हुए, जिन्होंने कहा कि नेता अपने क्लर्क और टाइपिस्ट को निजी सचिव बना रखे हैं. इस वजह से जहां वो कुछ सौ रुपये कमाते थे, वहां वो 1500 से 1800 रुपये कमा रहे हैं. इनमें से कुछेक को कांग्रेस ने विधानसभा चुनाव और कुछ को संसदीय चुनाव के टिकट भी दिये हैं. जो भी लोग ऐसा करते हैं, उन्हें यह एहसास तक नहीं होगा कि वे भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रहे हैं. यह आरोप लगता है कि भ्रष्टाचार का पैसा मंत्रियों के  इन्हीं निजी सचिवों के रास्ते गुजरता है. भारत में यह रिश्तेदारों, पत्नी, बेटे-बेटियों आदि के जरिये होता है. हमें यह समझना ही होगा कि अगर नेता भ्रष्ट होंगे, तो अधिकारियों को भ्रष्ट होने से रोका नहीं जा सकता. याद रखिए, 1964 तक हमारे ब्यूरोक्रेसी पर बहुत कम आरोप लगते थे. आज ब्यूरोक्रेसी पर गंभीर आरोप लगते हैं. अब यह सूचना मिलती है कि ब्यूरोक्रेसी में आनेवाले लोग ट्रेनिंग में आते हैं, तबसे उन पर सवाल उठने लगते हैं, तो इस प्रसंग को कृपलानी ने 64 में कहा, हमें यह समझना ही होगा कि अगर नेता भ्रष्ट होंगे, तो अधिकारियों को भ्रष्ट होने से रोका नहीं जा सकता.  कोई भी मंत्री इस मुगालते में नहीं रहे कि वह जो कर रहा है, उससे उसके मातहत वाकिफ नहीं हैं. यह पुरानी स्थिति चलती आ रही है. इसलिए विधायकों-सांसदों का जो नया फंड आया, उनसे भी कई संदेह के घेरे-बिंदु उभरे. कई लोग मुझसे पूछते-कहते हैं कि मैं क्या रहा हूं? चूंकि मैं पत्रकार हूं, तो कई पत्रकार साथी बहुत नजर रखते हैं. मुझे लगा कि जिस राज्य, बिहार से मैं राज्यसभा गया हूं, उस राज्य में नदियों का सबसे अधिक जाल है. अनेक नदियां हैं, पर नदियों पर अध्ययन का कोई संस्थान नहीं है. बिहार की नदियां, बिहार के जीवन को शताब्दियों से प्रभावित कर रही हैं. बाढ़, कटाव, दियारा वगैरह-वगैरह. पर नदियों पर अध्ययन का कोई केंद्र नहीं है. युवा पत्रकार मित्र निराला ने मुझे सुझाव दिया. मैंने बिहार के आर्यभट्ट विश्वविद्यालय को यह सुझाव दिया कि आप ऐसा संस्थान खड़ा करें. जिस तरह अरुण शौरी ने अपना पूरा सांसद फंड, आइआइटी कानपुर को एक भवन बनाने के लिए दिया था, उसी तरह मैंने अपना इस वित्तीय वर्ष का पूरा सांसद फंड आर्यभट्ट नॉलेज विश्वविद्यालय में इस संस्थान को दे दिया.  

 

आदर्श ग्राम चयन का प्रकरण भी रोचक है. पहले मुझे लगा, सांसद विकास फंड से ही आदर्श ग्राम का चयन होना है. तो सांसद विकास फंड तो आर्यभट्ट नालेज विश्वविद्यालय को दे चुका था. पर जब सरकार से आग्रह आया, तो सोचा कौन सा गांव चुना जाये? अनेक राजनीतिक मित्रों ने सुझाव दिया कि आगे जिस संसदीय क्षेत्र से राजनीति करनी है, वहीं का गांव चुने. पर हमने अलग रास्ता चुना. मित्र निराला के सुझाव पर. जो संसदीय क्षेत्र सुरक्षित है (सासाराम), उस इलाके का एक गांव चुना. गांव चुनने के पीछे क्या कारण हैं, वह सरकारी पत्र जो, सरकार को लिखा है, वह यह है -

 

 

 

दिनांक ...

 

सेवा में,

जिलाधिकारी पटना

विषय - सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत ग्राम पंचायत के चयन-निर्धारण के संबंध में. 

 

प्रिय महोदय,

 

कृपया अपने पत्रांक (क्रम संख्या..., पटना, दिनांक 08.01.2015) को देखें.

 

गांव के चयन में विलंब हुआ क्यों कि मेरी इच्छा उस गांव के चयन की थी जिसका हमारे राष्ट्रीय, सामाजिक  जीवन में महत्व रहा हो, परंतु आज वह अति उपेक्षित हो.

 

ऐसा ही एक गांव तेंदुनी बहुआरा है. यह करीब 150 घरों की बस्ती है, जिसमें लगभग 80 घर दलित, 40 घर राजपूत शेष तांती, बढ़ई, लुहार आदि हैं. ग्राम पंचायत-बकसना, प्रखण्ड-करहगर, वि.स. क्षेत्र - करहगर, लोक सभा क्षेत्र - सासाराम, जिला- रोहतास. हमारी सूचना के अनुसार, भारत सरकार द्वारा आदर्श ग्राम के लिए तय कसौटियों पर इस गांव का चयन हो सकता है.

 

इस गांव का महत्व यह है कि इस गांव के एक जयराम सिंह थे, जो दक्षिण अफ्रीका चले गये. उनके एक पुत्र हुए बाबू भवानी दयाल संन्यासी. संन्यासी, तीन भाई थे. तीनों भाइयों का जन्म दक्षिण अफ्रीका में हुआ. बाबू भवानी दयाल संन्यासी, गांधी जी के अत्यन्त निकट थे. उनके बारे में कुछ और प्रेरक तथ्य हैं.

 

-दक्षिण अफ्रीका में गांधी जी से पहले ही, संन्यासी जी ने सत्याग्रह का इतिहास लिखा.  

 

-वहीं रहते हुए इन्होंने अपनी पत्नी जगरानी देवी के साथ जगरानी प्रेस की शुरुआत की, जिसके जरिये अफ्रीका में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए हिंदी पत्रिका निकलने की शुरुआत हुई थी. 

 

-राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान देश के चर्चित नेताओं के साथ हजारीबाग जेल में वह बंद रहे और यहां उन्होंने करीब 1000 पन्ने का सत्याग्रह का अंक तैयार किया. 

 

-आज भी अफ्रीका में इनके नाम पर कई संस्थाएं चलती हैं. 

 

कालांतर में वे अपने गांव (बिहार) रहने आये. उनके एक भाई को अश्वेत आंदोलन में दक्षिण अफ्रीका में मार डाला गया. तीसरे भाई दक्षिण अफ्रीका में प्रोफेसर थे. कुछ वर्षों पहले तक उनका गांव से संपर्क था, परंतु अब वह टूट गया है.

 

भवानी दयाल संन्यासी देश में आये, फिर अपने गांव लौटे. देश की आजादी की लड़ाई में बड़ा काम किया. बिहार की पावन मिट्टी के वह अचर्चित और अनजाने नायक हैं. उन्होंने अपने प्रयास से अपने गांव में बाबू राजेंद्र प्रसाद, सरोजनी नायडू एवं एंडरसन को आमंत्रित किया था. यह सभी लोग कुदरा से बैलगाड़ी से आये थे. उस समय संन्यासी जी ने यहां खरदूषण पाठशाला की नींव रखी, जिसका शिलान्यास राजेंद्र बाबू एवं सरोजनी नायडू ने किया. संन्यासी जी द्वारा स्थापित इस पाठशाला का मकसद स्कूल चलाने के साथ ही लाइब्रेरी चलाना एवं गांव के किसानों को खेती की उन्नत तकनीक की जानकारी देना और इलाके में संगीत की शिक्षा देना भी था.

 

संन्यासी जी इसे चलाते रहे और बाद में इसका नामकरण उन्होंने प्रवासी भवन किया. परंतु  संन्यासी जी के राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होने और गांव में न रहने के कारण पाठशाला बंद हो गयी. गांधी जी के करीबी सहयोगी होने के अतिरिक्त आजादी की लड़ाई में उनका बहुत बड़ा योगदान है. परंतु, उनके गांव में प्राथमिक विद्यालय और स्वास्थ्य केंद्र नहीं हैं. और भी अनेक समस्याएं हैं.

 

इस गांव को ही सांसद आदर्श गांव बनाने की मेरी योजना है. भारत सरकार ने आदर्श ग्राम के लिए जो कसौटियां तय की हैं, उसके अनुरूप यह गांव सही है या नहीं, इसकी सूचना आप सरकारी जांचोपरांत प्रदान करें. यदि यह गांव केंद्र सरकार की तय कसौटी पर आदर्श गांव के चयन के लिए उपयुक्त है तो मैं इसी गांव को सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत चयन करने की अनुशंसा करता हूं. 

 

भवदीय

हरिवंश

सांसद (राज्यसभा)

 

प्रति - जिलाधिकारी, रोहतास (सासाराम)

 

हमारी व्यवस्था में कमियों के बावजूद काम करने का अवसर है. जब संसद में प्रवेश किया तो एक मेरे वामपंथी मित्र ने मजाक में एक जुमला कहा, जो आज की राजनीति पर उनकी टिप्पणी थी. मेनटेन द प्रेस्टिज ऑफ लेफ्ट. इंजॉय द प्रिविलेज आफ राइट. यानी वामपंथी जिस तरह सादा रहते हैं, जैसा उनका विचार होता है, उस तरह रहिए. लेकिन व्यवस्था जो सांसद को सुविधाएं देती है, उसका उपयोग करने के लिए दक्षिणपंथी की तरह जीवन जीयें. माना जाता है कि राइट यानी दक्षिण पंथ के लोगों को इसमें बहुत संकोच नहीं होता. वे पूंजीवाद-बाजारवाद के समर्थक होते हैं. सेंट्रल हाल में, जहां हम सब बैठते हैं, वहां देश में हुए बड़े नेताओं की तस्वीरें हैं. उसी हाल में कई ऐसे लोग बैठते रहे हैं, जो हमारी युवा दिनों की स्मृति में हैं. भूपेश गुप्त, ज्योर्तिमय बसु, प्रो. हीरेन मुखर्जी, ऐरा सेझियन, प्रकाशवीर शास्त्री, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु दंडवते, इंद्रजीत गुप्त, समर गुहा, चंद्रशेखर वगैरह. यह मैं एक्रास द पार्टी लाइन कह रहा हूं. उनके डिबेट्स आप पढ़िए. संसद में बेहतरीन लाइब्रेरी है. वहां उनके डिबेट्स हैं. उन भाषणों से लगता है कि वह मुल्क जो तब आर्थिक प्रगति की दृष्टि से शायद दुनिया में सबसे पीछे रहा हो, लेकिन वैचारिक समृद्धि और चरित्र की दृष्टि से यह मुल्क बहुत आगे रहा है. आज संसद की बहस में वह झलक दिखायी नहीं देती है. राजनेताओं का वह वर्ग दिखायी नहीं देता. सुप्रीम कोर्ट से कोल ब्लॉक पर बड़ा फैसला आया, उसमें एक टिप्पणी है कि 33 स्क्रीनिंग कमिटियां थी और सबने गलत फैसले लिये. जहां इस तरह की स्थिति हो जाये कि जो शासन करते हैं, वे गलत फैसले लेने लगे, तो सचमुच व्यवस्था को चलाना मुश्किल है. जहां हम सब बैठते हैं, उसके बारे में स्पष्ट है कि यह टेंपल ऑफ डेमोक्रेसी (लोकतंत्र का मंदिर) है. हम शुरू से यही पढ़ते भी रहे हैं. लगातार अखबार में हम सब छापते रहे हैं कि संसद का सत्र इंट्रप्शन-डिस्ट्रप्सन (कामकाज न होना) से प्रभावित होता है. बहुत खराब स्थिति में है. हरेक मिनट पर लाखों रुपये खर्च हों और वह संसद अच्छी तरह काम न कर पाये, यह संदेश देश में था. उसके प्रोडक्टिवीटी यानी कामकाज कम. लेकिन 16वीं लोकसभा या इस संसद में 27 दिनों तक पूरी कार्यवाही चली. कुल 167 घंटे काम हुए. 13 घंटे 51 मिनट ही यह बाधित रही. इसके ठीक विपरीत 2013 के बजट सत्र में 19 घंटे 36 मिनट काम हुए थे. 167 घंटे काम हुए ही नहीं. महत्वपूर्ण अखबार द हिंदू की टिप्पणी थी, मोस्ट प्रोडक्टिव सेशन आफ ए डिकेड. एक दशक में सबसे प्रोडक्टिव सत्र. 2005 के मानसून सत्र के बाद सबसे अधिक कामकाज का सत्र. पर इस संसद में भी जब बाधाएं आती हैं, तो क्या होता है? मैं एक प्रसंग आपको बताता हूं. जब बैठता हूं, तो हर दिन का कुछ प्वाइंट नोट करता हूं. फर्ज कर लीजिए कि हमसब राज्यसभा में बैठे हैं. प्रश्नकाल चल रहा है, जिसमें यह कल्पना की जाती है कि हमसब महत्वपूर्ण सवाल उठायें, तो सरकार उसका जवाब दे. सरकार इस सच से बचना चाहती है. क्योंकि मंत्री प्रश्नकाल के लिए तैयार होकर नहीं आते हैं. इधर विपक्ष में कुछेक लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें लगता है कि वह सत्र को बाधित कर अपना फर्ज पूरा कर लेंगे. जीरो आवर, अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा. उसमें सवाल आप उठा सकते हैं. पर जब सत्र बाधित होता है, तो चेयरमैन खड़े होकर सबसे बैठने को कहते हैं. परंपरा है कि उनके खड़े होने पर सब बैठ जाये, पर अब इसका भी पालन नहीं होता. आज से 10-15 वर्ष पहले यह परंपरा थी कि चेयरमैन अगर खड़े हो जायें, तो सारे लोग स्वत: बैठ जाते थे. समाज का चरित्र और उसका रिफलेक्शन वहां भी दिखायी देता है. अगर आंध्र ने कोई मामला उठाया, तो आंध्र और तेलांगना के बीच ऐसे बात होती है, जैसे भारत और पाकिस्तान के बीच हो रही है. अगर तमिलनाडु का कोई प्रसंग उठ गया, तो एआइडीएमके और डीएमके के बीच ऐसे संवाद होते हैं, जैसे दो शत्रु देशों के बीच बात हो रही है.  

 

संसद के एक सत्र के अनुभव से ऐसे लगा कि सरकार पर अंकुश रखने या सरकार के कामकाज पर पकड़ रखने के लिए संसद की समितियां बनीं. परंपरा थी, जो आचरण था या आदर्श कि जब एक व्यक्ति बोलने के लिए खड़ा होता था, तो दूसरा बैठ जाता था. सदन के अंदर जो व्यक्ति उपस्थित नहीं है, उसकी या अधिकारियों के तो नाम लेकर कभी चर्चा नहीं होती थी. पहले के डिबेट्स उठा कर आप देखें. आप ऐसा पायेंगे. पर आज यह आम चीज हो गयी है. इस कारण संसद की जो फंक्शनिंग है, उससे बेहतर कमिटियों की फंक्शनिंग है. आप जिस भी मंत्रालय की समिति में हैं, बढ़ियां से काम करें, तो समिति के माध्यम से सरकार पर आप अंकुश रख सकते हैं या सरकार को आप बाध्य कर सकते हैं कि वह बेहतर तरीके से काम करे. हमारे सांसद यह कोशिश करें कि जिन-जिन समितियों में वे हैं, अगर मंत्रालयों पर कारगर तरीके से वे दृष्टि रख सकें, तो यह संभव है. मैं भी दो-तीन समितियों में हूं. पहली समिति की अभी कुछ दिनों पहले मीटिंग थी, उसका मुझे अनुभव हुआ. जब समिति से निकलते हैं, हमारे साथी, तो उन्हें मीडिया के लोग घेर लेते हैं. समितियों की कई बातें ऐसी होती हैं, जो किसी शर्त पर सार्वजनिक नहीं होनी चाहिए. मैं मीडिया में रहते हुए यह मानता हूं. लेकिन अनुभव न होने की वजह से कई चीजें, जिन्हें सार्वजनिक नहीं होना चाहिए, हो जाती हैं. इन समितियों के माध्यम से लगा कि देश की स्थिति जिन चीजों में खराब है, उसकी सार्वजनिक जानकारी लोगों को बहुत कम है. कई सेक्टर्स में, कई क्षेत्रों में हमारे सिस्टम के अंडर परफारमेंस, हमारी इनइफीशिऐंसी से साफ दिखायी देता है कि हम कहां पीछे हो गये हैं. मैं कुछ कारणों से उन चीजों में बहुत अंदर तक नहीं जाना चाहूंगा. लेकिन बहुत संक्षेप में दो-तीन बातें. अभी हाल में एक बड़े विदेशी पत्रकार की किताब आयी. लोकसभा चुनावों के दौरान. पुस्तक का नाम था, इंप्लोजन. इसके लेखक थे, जान इलियट. हममें से हरेक सजग भारतीयों को यह किताब देखनी चाहिए. इंप्लोजन का आशय हुआ, अंतर्विस्फोट. जहां हम बैठते हैं, उस पार्लियामेंट के सेंट्रल हाल में वो मशहूर जुमला याद आता है, मुहावरा याद आता है. जो पूरी दुनिया में कोट होता है. ट्रिस्ट विथ डेस्टिनी (नियति से मुठभेड़). आजादी की आधी रात, पंडित नेहरू का कहा. जान इलियट इस किताब में कहते हैं कि भारत, अब इस दौर में नियति से मुठभेड़ करने की स्थिति में नहीं है. यह ट्रिस्ट विथ रियलिटी (असलियत से मुठभेड़) के दौर में है. और असलियत क्या है. उनके अनुसार भारत अन-गवर्नेबुल इंडिया (अशासित मुल्क) है. यह जुगाड़ से चलता है. एक मुहावरा उन्होंने और इस्तेमाल किया है. किसी को कोट करते हुए, पे्रटिस्टटिक एंड ट्रेडिशनली गोइंग हिंदू कल्चर यानी यही भाग्य है, यह हिंदू मानस रहा है. फिर वह आगे कहते हैं, पावरफुल वेस्टेड इंट्रेस्ट डू नाट वांट इंडियाज प्राब्लम टू बी टेकेल्ड एंड देयरफोर ... इफेक्टिव गवर्नेंस. एन इफेक्टिव गवर्नेंस यानी भारत का स्वार्थी वर्ग देश में प्रभावी शासन नहीं चाहता. गवर्नेंस के मामले में जिले से लेकर दिल्ली तक की स्थिति पटरी से उतर चुकी है. शायद हमारे भारतीय मानस-अवचेतन में यह बात है कि कोई कृष्ण पैदा हो जाये या कोई महान दिग्विजयी सम्राट आ जाये या कोई तारणहार आ जाये, जो इन सब चीजों से, कुव्यवस्था-अराजकता से हमें निकाल दे. पर असल में  ऐसा होता नहीं है. दुनिया का इतिहास यही बताता है. साल भर पहले एक किताब आयी, व्हाइ नेशंस फेल (देश क्यों फेल हो जाते हैं) देश क्यों खत्म हो जाते हैं? टूट जाते हैं? बिखर जाते हैं? इसको लिखा है, हार्वर्ड के एक प्रख्यात अर्थशास्त्री ने और एमआइटी के एक मशहूर पालिटिकल साइंटिस्ट ने. उनका निष्कर्ष है कि अगर संस्थाएं सर्वश्रेष्ठ नहीं रहीं, प्रभावी नहीं रहीं, मर्यादित नहीं रहीं, बेहतर नहीं रहीं, तो देश कारगर नहीं हुआ करते. देश लंबी उम्र के नहीं होते. देश विफल हो जाते हैं. भारत के संदर्भ में, यहां की संस्थाओं के पराभव देखकर लगता है कि अगर हमने बहुत बेहतर तरीके से बहुत जल्द कोशिश नहीं की, तो भविष्य में बहुत गंभीर चुनौतियां का हम सामना करेंगे. 

 

पहले बाहर रह कर मीडिया की निगाहों से इन चीजों को देखा करता था. अब अंदर रह कर इन चीजों को देखता हूं, तो लगता है कि देश की स्थिति सचमुच कितनी खराब और कितनी चुनौतीपूर्ण है. पर जिन लोगों को यह सब करना होता है, वे कैसे करते हैं? चीन का उदाहरण. जिस व्यक्ति ने चीन की नियति पलट दी. पूरी दुनिया के लिए वह देश मिथक बन गया. कोई मुल्क आज तक, ज्ञात इतिहास में, इतने कम समय में महाशक्ति नहीं बना, जिस तरह चीन बना. बना कैसे? अगर इसका श्रेय किसी एक व्यक्ति को देते हैं, तो वह देंग शियाओ पेंग हैं. उन्होंने कैसे अपने देश का मानस बदला. सबसे पहले उन्होंने वैचारिक आधार पर अपने देश की जनता को देश के सपनों के साथ जोड़ा. कहा कि अब हमारे लिए  काम (परफार्म) करने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं है. बहुत सारे फ्रेज (मुहावरे) उन्होंने कहे हैं. मैं दोहराना नहीं चाहता. पर उस व्यक्ति के काम या मानस के बारे में कहना चाहता हूं. 1978 में जब देंग ने चीन के लिए सपना देखा, तब चीन के पास पूंजी नहीं थी. चीन के पास सुविधाएं नहीं थी. अगर आप एक चीनी से पूछें कि वो दुनिया में किस देश से सबसे अधिक नफरत करता है, तो उसका जवाब होगा, जापान. एक-दूसरे के प्रति गहरी नफरत और घृणा. पहला नाम जापान का होगा. द्वितीय विश्वयुद्ध में जो कुछ हुआ, उन सब को लेकर चीनियों के मन में जापान को लेकर, गहरा नफरत बोध है. लेकिन देंग शियाओ पेंगे ने पूंजीविहीन चीन, जिसके पास संसाधन नहीं थे, उस चीन के लिए, वह व्यक्ति सबसे पहले जापान गया. आज भी हम देखते हैं कि कुछ द्वीपों को लेकर चीन-जापान के बीच युद्ध की स्थिति चलती रहती है. देंग, जापान के सम्राट से मिले. कहा कि मुझे चीन को बनाना है और आपकी मदद के बिना, सहयोग के बिना यह संभव नहीं. यानी अपने आत्मस्वाभिमान को अपने मुल्क के भविष्य के सपने के साथ जोड़ कर देखा. उस मुल्क से सहयोग की अपील की, जिसके प्रति आज भी चीन में गहरी नफरत है. जापान ने तब चीन में सौ बिलियन डालर निवेश किया. वहां से चीन की शुरुआत हुई, नयी महाशक्ति बनने की. सिर्फ उस निवेश से ही नहीं, उस व्यक्ति ने अपने मुल्क के लोगों के दिमाग में एक नया माइंडसेट डाला कि अगर हम दुनिया में विकसित नहीं होंगे, तो इतिहास नहीं बना सकते. देंग ने एक राजनेता (नेता, अपनी गद्दी या आज तक सोचता है. राजनेता दूर दृष्टि का होता है. वह मुल्क के लिए सोचता है) की तरह आचरण किया. व्यक्तिगत नफरत-द्वेष को पीछे रखकर अपने मुल्क के सार्वजनिक हित के लिए दुश्मन देश जापान से मदद ली. मुझे लगता है कि हम भारतीयों को भी, अपनी संस्थाओं के पराभव को देखते हुए कोई इस तरह के चमत्कार का एक माहौल तो बनाना ही चाहिए कि देश पुन: छोटी-छोटी चीजों से उठकर बड़े सपने देखे और इतिहास बनाये. आनार्ल्ड टायनवी ने भारत की आजादी के वक्त जो कहा था कि दुनिया की सभ्यता को नयी रोशनी पूरब से मिलनेवाली है. जो पारंपरिक सभ्यताएं हैं, वहां से एक नयी सभ्यता का उदय हो रहा है. तो हम उस सपने को यथार्थ में बदल सकते हैं. जब हम कमजोर थे, जब हमारे पास कुछ भी नहीं था, तब दुनिया के जाने-माने लोग हमारी तरफ  निगाह लगा कर देखते थे कि नयी रोशनी का उदय इधर से होनेवाला है. आज सबकुछ है. पर अंतरराष्ट्रीय जगत में अभी भी हमारी छवि मजबूत होने में लंबा समय लगनेवाला है. यह किसी एक नेता के उदय होने से नहीं, हरेक के मन से उदय होने से होगा. 2006 में जब मैं चीन गया था, तो शंघाई शहर के जिस होटल में हम ठहरे थे, वहां के एक बैरा से पूछा कि तुम अंग्रेजी जानते हो? बताया नहीं? इंडिया के बारे में उससे जानना चाहा, तो उसने कहा, वही इंडिया, जो साफ्टवेयर के क्षेत्र में आगे है. टूटी-फूटी भाषा में उसके दोस्त ने बताया. हम चार-पांच पत्रकार थे, वहां. उस लड़के ने जो कहा, उसका अर्थ था कि आप साफ्टवेयर में आगे हैं. पर वो समय दूर नहीं, जब हम आपसे आगे निकल जायेंगे. यह बात मुझे चीन के एक होटल के एक बैरे ने शंघाई में कही थी. आज से 13 साल पहले. ये शब्द आज भी मेरे जेहन में कौंधते हैं. आप जोड़िए, चीन का सपना और चीन के उस होटल के बच्चे का सपना. हमारे देश में अगर ऐसा कोई सामूहिक सपना नहीं रहा, तो हम शायद बहुत बड़ा मुल्क बनने का जो ख्वाब पालते हैं, पूरा नहीं होनेवाला. 

 

लंबे अरसे बाद दिल्ली आना. बल्कि बदली हुई दिल्ली आना, एक अलग अनुभव है. 1991 में दिल्ली छोड़ी थी. आना-जाना लगातार लगा रहा, पर उदारीकरण के बाद की दिल्ली बिल्कुल अलग है. यहां सत्ता ही सबकुछ है या फिर पैसा. इस परिवेश में संसदीय कामकाज सीखना, अपना रास्ता तलाशना, बिना मदद अपने बूते खड़ा होना, चुनौतीपूर्ण है. संसद में भी सवाल पूछना, बहस में हिस्सा लेने या संसदीय प्रक्रिया को जानने में समय लगता है. वहां भी राह आसान नहीं है. इन सबके बीच जब आपकी इच्छा भीड़ का इच्छा न बनने की हो, अलग राह चलने की हो, तब काम और जीवन कठिन और चुनौतीपूर्ण होते है, यह एहसास होता है. 

 

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