Advertisement

Novelty

  • Dec 28 2018 5:35PM
Advertisement

पढ़ें, सच के करीब ध्रुव गुप्त की लिखी एक कहानी ‘आस’

पढ़ें, सच के करीब ध्रुव गुप्त की लिखी एक कहानी ‘आस’


ध्रुव गुप्त रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं. अपने संवेदनशील लेखन से वे साहित्य जगत में बहुत पसंद किये जाते हैं और उनके प्रशंसकों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. वे लेखन में काफी सक्रिय हैं. उनकी कविताएं कोमल भावनाओं को समेटे गहरी चोट करती हैं, तो कहानियां झकझोर कर रख देती हैं. उनकी कहानियां सच के काफी करीब तो होती ही हैं, सामयिक भी होती हैं. आज पढ़ें उनकी ऐसी ही एक कहानी:- 

सर्दी की दोपहर थी. तेज हवा के साथ शीतलहर चल रही थी. कस्बे की सड़कें लगभग सुनसान थीं. बस स्टैंड के पास स्थित थाने का परिसर अभी खाली था. बरामदे पर बैठा थाने का मुंशी टेबुल पर रखे कागजात सहेज रहा था. कंबल में सिमटे दो चौकीदार खंभे के पास बैठे-बैठे झपकी ले रहे थे. बरामदे के उत्तरी किनारे हाजत में दो कैदी बंद थे. हाजत के बाहर एक बूढ़ा सिपाही हाथ में छड़ी लिए बैठा था. थाने के सामने बड़ा और खुला सहन था. सहन के उत्तर करीब आधा दर्जन पुरानी और जंग खाई गाड़ियां लगी थीं. गाड़ियों के आसपास ऊंची-ऊंची झाड़ियां उग आई थीं. दक्षिण तरफ आम और कटहल के कुछ बड़े-बड़े पेड़ थे. आम के एक पेड़ के नीचे फटी चादर में लिपटी करीब साठ-पैंसठ साल की एक बुढ़िया बैठी थी. गोद में एक थैला था और एक लाठी. वह सुबह पांच बजे ही थाने पहुंच गई थी. थाने पर मौजूद सिपाही ने बताया कि दिन में ग्यारह बजे थानेदार के आने के बाद उसकी सुनवाई होगी. थानेदार साहब ग्यारह बजे आए भी, लेकिन फोन से कोई जरूरी खबर मिलने के बाद दूसरे अफसरों और फोर्स के साथ बाहर निकल गए. अब दोपहर बीत रहा था. इस वक्त तक बुढ़िया निराश हो चली थी. वह थाने के गेट की ओर टकटकी लगाए थी. बार-बार आंखें पोंछ रही थी. उसे लग रहा था कि जितनी देर होगी, उसकी बेटी की मुसीबत उतनी ही बढ़ती जाएगी. 

बुढ़िया विधवा थी. फुलिया नाम था उसका. एक जवान बेटे और ब्याह के लायक एक बेटी की मां. बेटा पंजाब कमाता था. साल में एक बार ही घर आता था. कहता था कि बहन के ब्याह के लिए पैसे जोड़ रहा है. बेटी राधा सत्रह साल की थी. मां के साथ रहती थी. घर के सारे काम वही करती थी. रोपनी और कटनी के समय मजदूरी कर कुछ कमा भी लाती थी. उसका ब्याह फुलिया ने पास के गांव में तय कर दिया था. अगले चैत महीने में ब्याह का दिन उतरा था. कल रात वह बेटी के साथ घर के भीतर  सोई थी. आधी रात हो चुकी थी. राधा सो गई थी. वह खुद राधा के ब्याह और उसकी तैयारियों के बारे में सोच रही थी. उसी समय घर की टाटी तोड़कर तीन बदमाश घुस आए और हाथ पकड़कर राधा को घसीटने लगे. फुलिया ने विरोध किया तो एक बदमाश ने पिस्तौल को मूंठ से उसके सिर पर वार किया. चोट इतनी जबर्दस्त थी कि वह माथा पकड़कर बैठ गई. बदमाश राधा को घसीटते हुए ले गए. फुलिया ने बाहर निककर बहुत चीख-पुकार मचाया. टोले भर के लोग इकट्ठा तो हुए, मगर डर के मारे किसी ने बदमाशों का पीछा नहीं किया. वह भागकर सरपंच के घर गई. सरपंच ने थाने जाकर केस करने की सलाह दी. डेढ़ कोस पैदल चलकर फुलिया सूरज निकलने के पहले ही थाने पहुंच गई थी. 

सूरज डूबने के बाद थाने की गाड़ी लौटी, लेकिन गाड़ी से उतरकर सभी लोग अपने-अपने क़्वार्टर में चले गए. फुलिया की रुलाई छूट गई. अबतक बदमाशों ने बेटी की जाने क्या दुर्दशा कर दी हो. हिम्मत करके वह उठी और थाने के बरामदे पर चढ़ गई. मुंशी के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गई. मुंशी ने उसे देखा तो उसने बेटी के साथ हुई वारदात कह सुनाई. मुंशी ने उसे समझाया कि आज भोर में विधायक जी के बेटे का अपहरण हो गया है. थाने के सारे अधिकारी उसी में लगे हैं. थोड़ी देर में एस.पी साहब आने वाले हैं. आज रात भर छापामारी चलेगी. उसने फुलिया को कल किसी समय आने की सलाह दी. फुलिया का रोना जारी रहा तो उसने कहा कि उसकी बेटी के साथ जो घटना हुई है, उसके बारे में वह लिखकर दे दे. उसका केस दर्ज कर लिया जाएगा. फुलिया पढ़ना-लिखना नहीं जानती थी. उसने पास खड़े चौकीदार को लिखने को कहा तो उसने बताया कि सौ-दो सौ रुपए देने पर मुंशी जी बढ़िया से केस तैयार कर देंगे. फुलिया के पास मात्र पचास रुपए थे. पचास का नोट टेबुल पर रखकर उसने मुंशी के पांव पकड़ लिए. मुंशी को उसपर दया आ गई. नोट उठाकर उसने जेब में डाला और पूछ-पूछकर घटना का ब्यौरा लिखने लगा. आधे घंटे में केस तैयार हुआ. मुंशी के कहने पर उसने अंगूठा लगा दिया. उसे यह कहकर विदा किया गया कि कल सबेरे केस की जांच करने दारोगा जी उसके घर जाएंगे. कल की बात सुनकर उसे अच्छा तो नहीं लगा, लेकिन उसे थोड़ा संतोष था कि उसका केस लिख लिया गया है. 

घर पहुंचते-पहुंचते रात हो गई. उसने दिन भर कुछ नहीं खाया था, फिर भी कुछ पकाने की इच्छा नहीं हुई. लेटी तो डरावने ख्याल आने लगे. उसकी फूल सी बेटी का जाने क्या हाल किया हो बदमाशों ने. उसका कलेजा फटा जा रहा था. भोर में कुछ पल के लिए आंख लगी तो सपना देखा कि राधा नंगी पड़ी थी और तीनों बदमाश बेरहमी से उसे नोच-खसोट रहे थे. सबेरे नहा-धोकर वह पूजा पर बैठी. सभी देवी-देवताओं का स्मरण किया. टोले के हनुमान मंदिर में जाकर मन्नत मांगी. पूजा के बाद दारोगा जी के इन्तजार में बैठ गई. थाने पर देख चुकी थी कि लोग ग्यारह बजे के पहले घर से नहीं निकलते. वह हलवाई की दुकान पर जाकर कुछ मिठाई ले आई. दारोगा जी को बगैर कुछ खिलाए वह कैसे जाने देगी. टोले के कई लोगों ने उसके घर आकर हमदर्दी प्रकट की. वे राधा की बात करते तो उसे रोना आ जाता. उसने लोगों को बताया कि उसका केस लिख लिया गया है और अभी जांच के लिए दारोगा जी आने वाले हैं. टोले के नेता धरीछन पासवान ने बताया कि जबतक विधायक जी के भतीजे की बरामदी नहीं हो जाती, तब तक पुलिस शायद ही यहां आए. पुलिस पर ऊपर का बहुत दबाव है. फुलिया ने धरीछन से मदद की गुहार की तो उसने एक-दो दिनों में बदमाशों का पता लगाने का भरोसा दिया. बुढ़िया के कान में यह भी कहा कि इलाके के सारे चोर बदमाश मुखिया जी के आदमी हैं. मुखिया जी चाहेंगे तो उसकी लड़की घंटे भर में वापस आ जाएगी. 

बिना उम्मीद के फुलिया ने शाम तक दारोगा जी का इंतजार किया. अंधेरा होते ही बगल के टोले में मुखिया जी के घर पहुंची. वे लोगों के साथ कोई जरुरी बात कर रहे थे.  डेढ़ घंटे बाद खाली हुए तो फुलिया ने अपना दुखड़ा कह सुनाया. पैर पकड़कर कहा - 'हमारा कोई नहीं है ,बेटी को बचा लिया जाय, मालिक. अगले चैत में उसका ब्याह होना है. 'मुखिया जी को उस पर रहम आ गया. बोले - 'चाची, तुम बेकारे न थाना गई थी. उसी रात हमको बोली होती तो अब तक तुम्हारी बेटी मिल गई होती. जाओ, हम कल कुछ करते हैं. तुम कल सांझ को आ जाना.'उदास मन स्व वह घर लौटी. एक दिन और अकारथ बीत गया. राधा का मिलना तो दूर, अभी उसकी खोज भी शुरू नहीं हुई. अगले दिन ठीक दस बजे वह थाना गई. संयोग से थानेदार वहां मौजूद थे. फुलिया की बात सुनकर थानेदार ने मुंशी को देखा. मुंशी ने कागजों के ढेर से निकालकर एक कागज़ उन्हें दिया. बयान पढ़ने के बाद थानेदार ने पूछा - 'लड़की की उम्र कितनी थी ?'

फुलिया ने कहा - 'अभी सतरह बरस की हुई थी, सरकार.'

'उसका कोई चक्कर-वक्कर था किसी से ?'

'नहीं, सरकार! एकदम गऊ थी. लाज-शरम के मारे घर के बाहर भी कम ही निकलती थी. चाहें तो गांव-टोला से पूछ लीजिए !'

थानेदार हंसकर बोले - 'अपनी संतान सबको गऊ लगती है. हो सकता है कि उसने अपने किसी यार के साथ भागने के लिए यह नाटक रचा हो. गांव की लडकियां भी कुछ कम चालू नहीं होतीं. मां-बाप को चूना लगाना खूब जानती हैं.'

उनकी बात सुनकर मुंशी हंसा. पूछा - 'तुम्हारी बेटी सुंदर थी ?'

'सुंदर थी, सरकार !'

थानेदार ने मुस्कुराते हुए मुंशी से कहा - 'गरीब घर में सुंदर लड़की होगी तो गांव में बवाले न होगा.' फिर फुलिया से पूछा - 'केस में किसी का नाम काहे नहीं दिया ?तुम्हें तो जरूर अंदाजा होगा कि यह काम किसका हो सकता है.'

'नहीं सरकार, हम किसी को नहीं पहचानते. रात में हमको कम सुझाई देता है. लेकिन टोले का कौनो आदमी नहीं था. होता तो हम आवाज से पहचान लेते.'

'किसी पर शक-सुबहा तो होगा ? कोई ऐसा आदमी जो तुम्हारी बेटी पर बुरी नजर रखता हो. या कभी उसके साथ छेड़खानी किया हो.' 

'नहीं सरकार, हमारी जानकारी में कोई नहीं था. बिना जाने हम किस पर सुबहा करें ?'

थानेदार झुंझला गए.  कहा - 'किसी का नाम नहीं बताएगी तो हम कहां तुम्हारी बेटी की तलाश करेंगे ? पुलिस कोई जादू जानती है ? पहले जाकर पता लगाओ कि गांव-जवार में कौन लोग ऐसा काम कर सकते हैं. कुछ पता चले तो बताना. हम खुद आएंगे तुम्हारे घर.'

फुलिया ने उनके पैर पकड़ लिए. रोती हुई बोली - 'हम कहां से पता लगाएंगे ? हमको कौन बताएगा, मालिक ? आप एक बार चलेंगे तो बदमाश डर से राधा को छोड़ देंगे.'

थानेदार ने उसे अगले दिन आने का भरोसा दिया. फुलिया को भरोसा नहीं हुआ. वह हाथ जोड़े बैठी रही. 

थानेदार ने डपट कर कहा - 'तू भागती है कि नहीं यहां से !'


शाम को फुलिया मुखिया जी के घर गई. घुटने के दर्द के मारे चल भी नहीं पा रही थी. राधा के मिलने की आस भी कम होती जा रही थी. मशीन की तरह ही भाग-दौड़ कर रही थी. बेटा होता तो कुछ मदद मिलती. धरीछन से कहकर उसको संदेश भेज दिया है. उसके आने में चार-पांच दिन समय तो लगेगा ही. मुखिया के घर पहुंचकर उसे निराशा हाथ लगी. कहीं बाहर गए थे. धम्म से दालान की बाहरी दीवार से लगकर बैठ गई. बैठ नहीं पाई तो लेट गई. लेटे-लेटे कब आंख लग गई, कुछ पता ही न चला. 

शोर की आवाज पर फुलिया की नींद खुली. पहले तो उसकी समझ में ही नहीं आया कि वह कहां थी. बाद में याद आया कि वह मुखिया जी को खोजती हुई उनके दालान में आई थी. सांझ को आई थी और अभी आधी रात हो चली. अभी सामने एक गाड़ी आकर लगी थी. गाड़ी नहीं आती तो सबेरे तक सोई रह जाती वह. गाड़ी से थानेदार उतर रहे थे. मुखिया जी उन्हें लेने के लिए बाहर आए. बाहर कुर्सी लगी. एक आदमी अंदर जाकर पीने के लिए कुछ ले आया. उसे गंध से पता चला कि दारु थी. 

मुखिया ने पूछा - सुबह तक रुकने का इरादा हो तो कुछ कोशिश करें ? प्रोग्राम देकर आते तो पहले से कुछ इंतजाम करके रखता.'

'नहीं, छोड़िए !उस रात के हादसे के बाद अभी इच्छा नहीं हो रही है. मामला ठंढा हो जाय, फिर देखा जाएगा. आज थाने पर बुढ़िया आई थी. मैंने कह दिया कि कल उसके घर आऊंगा. कल ही साहेब का क्राइम मीटिंग है. मैं नहीं आ पाऊंगा. आप देखिएगा !'

मुखिया जी ने कहा - 'आप चिंता मत कीजिए. मैं सब संभाल लूंगा.'

उनकी बातें तो फुलिया नहीं समझ पाई, लेकिन जब लगा कि बातें उसी के बारे में हो रही है तो वह उठकर सामने आ गई. दोनों के पांव छूकर कहा - 'सरकार, हम बहुत थक गए हैं. अब चला-फिरा भी नहीं जाता. बेटी का अब तक कुछ पता नहीं चला.' 

'उसे अचानक इतनी रात दालान में देखकर दोनों भौंचक रह गए. कुछ देर एक-दूसरे का मुंह देखते रहे. फिर मुखिया ने कहा - 'तुम देख नहीं रही हो कि साहब इतनी-इतनी रात तक तुम्हारी बेटी को खोजते फिर रहे हैं. अभी तुम्हारे बारे में ही पूछ रहे थे. तुम्हारा ख्याल रखने के लिए भी बोले हमसे.'

फुलिया ने थानेदार के पांव पकड़कर कहा - 'इस मुसमात के सहारा आप लोग ही हैं, हुजूर.' 

मुखिया ने कहा - ' दो दिनों से हम भी अपने आदमी दौड़ाए हुए हैं. जैसे ही पता चलेगा, कार्रवाई करवाएंगे. तुम निश्चिन्त होकर घर जाओ.'

फुलिया चलने लगी तो थानेदार ने कहा - 'बिचारी इतनी रात गए अकेली कहां जाएगी. हम इसकी बेटी की खोज में निकल ही रहे हैं. रास्ते में इसे घर छोड़ देंगे.'

थानेदार ने फुलिया को जीप से घर तक छोड़ा. वह घर के आगे उतरी तो उसकी आंखों में आंसू थे. ये लोग राधा को खोजने  रात-रात भर दौड़-धूप कर रहे हैं. वह इन लोगों के बारे में कितना गलत सोच रही थी. आखिर ये लोग भी आदमी हैं, ओझा-गुनी तो नहीं. पता लगाने में बखत तो लगता है. ऊपर से विधायक जी के भतीजा को भी बदमाश उठा ले गए हैं. बड़े लोग हैं. उसकी तकदीर ही खराब है तो कोई क्या कर सकता है. 

उस रात उसे तेज बुखार हो गया. बिना खाए-पिए बुढ़ापे में इतनी भाग-दौड़ का यह नतीजा तो होना ही था. दो दिनों तक बुखार में पड़ी बड़बड़ाती रही. कोई देखने वाला न था. बगल की कोई औरत कभी देख जाती या खाने को कुछ दे जाती. बुखार में उसे राधा बहुत याद आई. जाने वह जिन्दा होगी भी या नहीं. आंख लगती तो राधा के ही सपने आते. एक बार देखा कि नदी में उसकी नंगी लाश बहे जा रही है. उसे पकड़ने के लिए वह किनारे-किनारे भाग रही है, लेकिन उसकी मदद  कोई आगे नहीं आ रहा. उसे भरोसा हो चला था कि थानेदार राधा को जरूर खोज निकालेगा. जिंदा चाहे मुर्दा. दरवाजे पर जब भी कोई आहट होती, उसके मन में आस जगती कि थाने से राधा की कोई खबर आई है. अब तो इतने दिन बीत चले. राधा की लाश भी मिल जाती तो वह रो-धोकर संतोष कर लेती. 

तीसरे दिन बुखार उतरा तो वह थाना जाने के लिए घर से निकली. अभी टोले से बाहर ही पहुंची थी कि चक्कर खाकर गिर पड़ी. एक बैलगाड़ी कस्बे की ओर जाती दिखी तो गाड़ीवान से चिरौरी कर वह थाने पहुंची. वहां जो कुछ देखा उससे उसकी चिंता बढ़ गई. थाने पर सैकड़ों लोगों की भीड़ जमा थी. ढेर सारी गाड़ियां लगी थीं. कहीं राधा की लाश तो नहीं मिली है ? पूछने पर लोगों ने बताया कि कल पुलिस ने विधायक जी के भतीजे को गंडक दियारा से बरामद किया है. चार बदमाश भी पकडे गए हैं. विधायक जी थाने पर बैठे हैं. जिले के एस.पी साहब भी आए हैं. फुलिया दो-तीन घंटे एक पेड़ के नीचे बैठी रही. सांझ को जब भीड़ छंटी तो सारे अफसर भी आराम करने चले गए. रास्ते भर रूकती और आराम करती फुलिया जब घर पहुंची तो आधी रात हो चली थी. 

अगले दिन वह कहीं आने-जाने के लायक नहीं रही. उसने खाट दरवाजे के पास ही लगा लिया. दिन भर आने-जानेवालों को ताकती रहती. राधा के अपहरण के सातवें दिन किसी ने बताया कि मुखिया जी के तालाब में आज सबेरे एक लड़की की लाश उतराई है. टोले के कुछ लोग बता रहे हैं कि लाश राधा की है. कई दिनों तक पानी में रहने के कारण लाश फूल गई है. वह रोते-पीटते तालाब की ओर भागी. अपनी कमजोरी और घुटनों का दर्द उसे भूल गया जैसे. गिरते-पड़ते तालाब के पास पहुंची तो वहां लोगों की भीड़ जमा थी. मुखिया और थानेदार वहां मौजूद थे. तालाब की सीढ़ी पर राधा की नंगी लाश पड़ी थी. राधा की लाश देखकर वह पुक्का फाड़कर रोई. फिर अचेत हो गई. कुछ लोग पानी का छींटा देकर उसे होश में ले आए. 

मुखिया ने उसे ढांढस बंधाते हुए कहा - 'लगता है कि बदमाशों ने कुकर्म करने के बाद लड़की की हत्या की है. ऐसे हैवानों को तो फांसी पर लटका देना चाहिए.'

थानेदार ने कहा - 'इन शैतानों को मैं पाताल से भी खोज निकालूंगा. जब तक उन्हें सजा नहीं मिलती, मैं चैन से नहीं बैठूंगा.'

होश में आने के बाद फुलिया चुप थी. सूनी-सूनी आंखों से कभी राधा को और कभी लोगों की भीड़ को देख रही थी. कुछ देर बाद उसने अपनी साडी का एक हिस्सा फाड़ा और राधा की देह को स्तनों से लेकर जांघ तक ढंक दिया. उसके ऐसा करते ही तमाशाइयों की भीड़ धीरे-धीरे छंटने लगी. 

कुछ देर बाद पुलिस राधा की लाश लेकर चली गई  

लोग कहते हैं कि उसी दिन से बुढ़िया बौरा गई. बोलना-चालना बंद हो गया उसका. बैठे-बैठे कभी हंसती, कभी छाती पीटकर रोती. उस हादसे के बाद दो महीनों में ही उसके बचे-खुचे बाल सफेद हो गए. कमर झुक गई. आंखों से दिखाई देना कम हो गया. उसे अब लोगों को पहचानने में भी मुश्किल होने लगी. इस हाल में भी वह हफ्ते में दो-तीन दिन हाथ में लाठी लिए थाने पर जरूर चली जाती है. सुबह जाती है और आम के पेड़ के नीचे दिन भर चुपचाप बैठी रहती है. सांझ होने के बाद घर लौटती है. 

पहले थाने के लोग उसे पगली कहकर कुछ टोका-टोकी करते थे. खाने के लिए भी कुछ दे देते थे. धीरे-धीरे लोगों ने उसकी ओर ध्यान देना भी बंद कर दिया...

Advertisement

Comments

Advertisement

Other Story

Advertisement