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  • Nov 15 2018 2:57PM

ध्रुव गुप्त की प्रेम कविताएं : पहला प्रेमपत्र

ध्रुव गुप्त की प्रेम कविताएं : पहला प्रेमपत्र



ध्रुव गुप्त पेशे से रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं, लेकिन उनकी कविताएं कोमल मानवीय भावनाओं पर आधारित रहती हैं, जो सीधे पाठकों के हृदय तक जाती हैं. इस बार पढ़ें उनकी पांच कविताएं जो जिसमें कोमल भावनाएं निहित हैं:-

एक / पहला प्रेमपत्र  


आज घर की एक पुरानी पेटी से 

जब मिला डायरी भरकर लिखा हुआ 

मेरे जीवन का पहला प्रेमपत्र 

और उसके भीतर छुपा हुआ फूल 

तो मैं याद भी न कर सका 

कि आज से पैंतालीस साल पहले 

किन परिस्थितियों में लिखा था इसे 

और क्यों नहीं दे पाया उस शख्स को 

जिसका चेहरा तक अब 

ठीक-ठीक याद नहीं मुझे 

पत्र के ऊपर के कोने में लिखा 

उसके नाम का पहला अक्षर 

अब धुंधला हो चुका है 

पन्नों पर जगह-जगह उभर आए हैं 

भूरे , चितकबरे धब्बे 

अक्षर पहचान में नहीं आ रहे 

फूल सड़कर काले पड़ चुके हैं 

और उसमें लगाई हुई इत्र की गंध 

अब सिरे से मिट चुकी है 

आज उस प्रेमपत्र को देखकर 

कुछ भी नहीं हुआ मेरे भीतर

उस तूफ़ान का अवशेष भी नहीं था 

जो पैंतालीस साल पहले इसे लिखते हुए 

मेरे भीतर उठा होगा 

और उसे तो पता भी नहीं होगा 

कि उसकी कोई चिट्ठी 

मेरे पास इस उम्र में भी सुरक्षित पड़ी है 

मुझे अफ़सोस है कि कुछ ही अरसे में 

सड़-गलकर मेरा यह पहला प्रेमपत्र 

मिट्टी में मिल जाएगा 

हवा बिखेर देगी इसे दूर-दूर तक

अगर उस तक इसका कोई टुकड़ा पहुंचा भी 

तो उसे पता भी नहीं चलेगा 

इतिहास में मेरे इस प्रेमपत्र के लिए 

कोई जगह नहीं होगी 

क्योंकि इतिहास में केवल युद्ध दर्ज होते हैं 

भावनाएं नहीं.


दो / प्रार्थना 
मैं जब भी बुलाऊं तुम्हें 

कहो, आओगे 

राह के चट्टानों को तोड़ती 

जैसे आती है नदी

पत्थरों के बीच से जैसे 

निकल आते हैं फूल  

तपती धरती पर गिरती है 

आषाढ़ की पहली बारिश 

थकी-हारी आंखों में जैसे 

आते हैं मुलायम सपने 

जब मैं याद करुं तुम्हें 

कहो, लौटोगे 

महीनों की हाड़ कंपाती 

ठंढ के बाद  जैसे लौटती है 

बसंत की गुनगुनी धूप 

पतझड़ के बाद पेड़ों पर 

हरे-हरे पत्ते 

बरसात के बाद मुंडेर पर पक्षी

लंबे प्रवास के बाद प्रियजन 

लंबी, गहन उदासी के बाद   

जैसे अनायास लौट आती है 

होंठों पर मुस्कान 

अपरिचित शोर में 

किसी दोस्त की आवाज़ की तरह

सन्नाटे में संगीत की तरह 

अँधेरी बंद सुरंग में ताज़ा हवा 

और रोशनी की तरह 

संकट के सबसे काले दिनों में 

सबसे अबोध प्रार्थना की तरह 

कहो, उठोगे मेरे भीतर 

जब मैं भूल जाऊं तुम्हें !

तीन / बारिश के बाद 

उस शाम 

नदी में जब बारिश हुई 

बहुत तेज हवा में 

तिनके से कांपी थी नाव  

किसी भी डर की जगह  

मासूम शरारत से चमकती  

तुम्हारी आंखें देखना 

अच्छा लगा था मुझे  

उस शाम 

बारिश में पोर-पोर भींगी 

तुम्हारी सिकुड़ी देह को 

आहिस्ता से चूम लेने की  

एक मासूम-सी इच्छा 

रगों में तेज-तेज दौड़ी  

और जाने कैसे संकोच से 

पथरा गई देखते-देखते 

उस शाम 

बारिश के बाद तुम्हें 

घर लौटते देखा था मैंने 

बहुत दूर तक    

बारिश में भीतर तक भींगी 

गीली मिट्टी की तरह 

मुलायम और बेचैन 

उस शाम   

घर तक छोड़ने आई थी मुझे 

नदी 

बारिश के बाद !

चार / सिलसिला 

जब मैंने प्यार किया 

मैंने चांद में उसके अक़्स देखे 

हवा में सुनी उसकी आहट 

गीत लिखे उसके होंठों 

कंधों और आंखों के 

और एक दिन मैंने महसूस किया 

मैं बेचैन हो रहा हूं   

जब मैंने प्यार किया 

मैंने उसे बहुत सारे ख़त लिखे 

और उसने मुझे 

मैं उसके ख़त सिरहाने डालकर 

गहरी नींद सोता रहा 

फिर एक सुबह उठकर मुझे लगा 

ख़त के लफ्ज़ 

अपना असर खो चुके हैं 

जब मैंने प्यार किया 

मैंने उससे एक बोसा मांगा   

उसने दिया 

वह बोसा कितनी-कितनी रात 

सुलगता रहा मेरे भीतर 

और एक दिन आग बन गया  

जब मैंने प्यार किया 

मैंने उससे एक पूरी रात मांगी  

और उसने दी 

फिर एक समूची रात 

उसके बदन की आंच में तपने 

पिघलने और बह जाने के बाद 

सुबह-सुबह मैंने पाया 

मैं इस सिलसिले से ऊब गया हूं 

जब मैंने प्यार किया 

मैंने उससे जुदाई मांगी  

उसने जुदाई दी 

और जुदाई के साथ एक बेचैन समंदर 

उतार दिया मेरे भीतर 

अरसे से इस बेचैन समंदर में 

तलाश रहा हूं मैं 

कोई एक पुरसकून जज़ीरा 

जिसका भूगोल धीरे-धीरे 

उसके चेहरे 

और बदन में तब्दील हो चुका है 

मैं फिर उसे प्यार करुंगा   

फिर सुनूंगा हवा में उसकी आहट 

चांद में देखूंगा उसके अक़्स 

लिखूंगा उसे एक ख़त 

उससे एक बोसा मांगूंगा  

और एक पूरी रात 

फिर से जुदाई मांगने के पहले 

ऐसे ही, बिल्कुल ऐसे ही 

मैं उसे प्यार करता रहूंगा  

तमाम उम्र 

और कभी नहीं जान पाऊंगा   

कि मैं उससे क्या चाहता हूं !

पांच / असीम 

तुम मुझे मिली 

मैं सरेराह ठिठक गया

तुमने मुझे देखा 

मेरी आंखों में उग आया 

कोई इंद्रधनुष 

तुम मुस्कुराई 

मेरे भीतर हरसिंगार झरे 

तुम मेरे पास आई 

मेरे लहू में उड़ने लगीं 

अनगिनत तितलियां 

तुमने मुझे छुआ 

मैं चंदन की तरह महका 

तुम मुझसे लिपटी 

मैं फैलता चला गया 

एक साथ 

चारों दिशाओं में 

तुमने मुझे चूमा 

और आकाश की तरह 

असीम कर दिया !

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