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Khunti

  • Jun 26 2019 1:49PM
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पत्थलगड़ी रिटर्न्स.....!

पत्थलगड़ी रिटर्न्स.....!

खूंटी में पत्थलगड़ी की आहट एक बार फिर तेज हो रही है. कई जगहों पर पत्थलगड़ी के एक साल, तो कहीं दो साल पूरे हो रहे हैं. सालगिरह मनाने की तैयारी में कई गांव छोटी- छोटी सभाएं कर रहे हैं. कई गांवों में मतदान करने वाले, सरकारी योजना का लाभ लेने वालों से जुर्माना भरवाया जा रहा है या  उनका सामाजिक बहिष्कार किया जा रहा है. प्रभात खबर डॉट कॉम ने खूंटी के कई गांवों का दौरा किया, हालात समझने की कोशिश की पढ़ें पंकज कुमार पाठक की रिपोर्ट...

खूंटी के हाबुडीह गांव की तस्वीर ( तस्वीर/वीडियो - अरविंद कुमार सिंह) 
 
भ्रम :  जमीन की रसीद दी, तो सरकार जमीन छिन लेगी 
मुख्यमंत्री कृषि आशीर्वाद योजना के तहत खूंटी के कई गांवों में लाभ पहुंचाने की तैयारी की गयी थी लेकिन पत्थलगड़ी इलाके में किसान इस योजना का फार्म तक लेने को तैयार नहीं है. किसानों के मन में भ्रम है कि इस योजना के सहारे सरकार उनकी जमीन छिन लेगी. किसानों ने कर्मचारियों से किसी तरह की सरकारी योजना का लाभ लेने से इनकार कर दिया.
 
इस योजना का लाभ लेने के लिए किसानों को जमीन की रसीद, आधार कार्ड और अकाउंट डिटेल देना है, किसान जमीन की रसीद देने से बच रहे हैं. खूंटी के सीओ विनोद प्रजापति ने हमें बताया कि हम अंचल तक ग्रामीणों को नहीं बुला रहे बल्कि अपने कर्मचारियों को किसानों के घर तक भेज रहे हैं फिर भी किसान इस योजना का लाभ नहीं लेना चाहते.
 
हर कर्मचारी को इस योजना का लाभ देने हेतु टारगेट दिया गया है. खूंटी इलाके में लोगों ने योजना का लाभ लेने से इनकार किया तो दो कर्मचारियों का वेतन बंद कर दिया गया है. कर्मचारी कहते हैं, जब हमें देखकर ही वह दरवाजा बंद कर देते हैं, तो हम उनके घरों तक लाभ कैसे पहुंचाये. सांसद कड़िया मुंडा ने तिलमा गांव को गोद लिया है. इस गांव में भी लोग सरकारी योजना का लाभ नहीं लेना चाहते पूरी पंचायत में 40 से 50 लोगों ने फार्म भरा है और पूरे इलाके में 500 लोग हैं जो इस योजना का लाभ लेने को तैयार हुए हैं.
 

समस्या : सरकारी अधिकारी नहीं समझते स्थानीय भाषा
 
मुंडाओं की परंपरा में साल में एक बार उन्हें पत्थरों को साफ करना होना है, पूर्वजों को याद करना होता है. इस परंपरा की आड़ में पत्थलगड़ी समर्थक रणनीति बना रहे हैं. मारंगहादा थाना प्रभारी कामेश्वर बताते हैं कि इस त्योहार में सभी एकजुट हुए. कई जगहों पर सभाएं हुई हर बृहस्पतिवार को यहां ग्रामसभा होता है.  हमारे साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि हम इनकी भाषा नहीं समझते जब भी ग्रामीण छोटी- छोटी सभाएं करते हैं, तो उन्होंने सभा में क्या कहा हम समझ नहीं पाते. ग्रामीण भी हमसे मुंडारी भाषा में बात करते हैं, ग्रामीणों को हिंदी आती है लेकिन हमसे बात करने के लिए ये लोग स्थानीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं.  ग्रामीण हमें देखकर घर के अंदर चले जाते हैं या बात करने से कतराते हैं.
 

चौकीदार कहते हैं,  जान का खतरा है सब बतायें, तो कैसे
खूंटी के गांवों में सरकार सूचना के लिए चौकीदारों को रखती है. पत्थलगड़ी हुए कई गांवों में चौकीदार हैं जिन्हें सरकारी मानदेय मिलता है. चौकीदारों के पास पूरी सूचना होती है लेकिन सरकारी अधिकारियों तक नहीं पहुंच पाती. कई जगहों पर वंशानुगत चौकीदार काम कर रहे हैं. नये चौकीदार का मानदेय 15 हजार रुपये से ज्यादा होता है, जैसे – जैसे चौकीदार पुराने होते जाते हैं इनका भुगतान बढ़ता जाता है लेकिन चौकीदार बताते हैं कि गांव की सूचनाएं सरकार तक पहुंचाने में जान का खतरा है. गांव में भी लोग हमसे बात करने से कतराने लगे हैं जबकि हम स्थानीय हैं हमारी कई पीढ़ियां गांव में रह रही है, लोग हमें देखकर चर्चा बंद कर देते हैं कि यह सरकार का आदमी है. हमें तो गांव में ही रहना है उनके बीच रहना है हम काम करें तो कैसे ?.
 
शांति से काम कर रहे हैं पत्थलगड़ी समर्थक 
खूंटी के बारास्ता, मारंगहादा, लोबोदा, हाबुडीह, हाटींगचैली, संगसॉन सहित कई गांवों का दौरा करते हुए लोगों ने बातचीत में बताया कि पत्थगड़ी समर्थक अपनी पुरानी गलतियों से सीख रहे हैं. बगैर मीडिया हाइप और भीड़ इकट्ठा किये काम हो रहा है. इन इलाकों में कई जगहों पर नयी पत्थलगड़ी की गयी है. पत्थलगड़ी समर्थक चाहते हैं  इस तरह सरकार का ध्यान कम जाए ताकि वह आसानी से ग्रामीणों को भड़का कर, भ्रम में रखकर अपनी तरफ कर सकें. साभाओं के लिए अब पहले की तरह भीड़ जमा नहीं की जाती, छोटी – छोटी सभाएं की जाती है और ग्रामीणों से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने को कहा जाता है. ग्रामीण कहते हैं हम बाहरियों की बात क्यों सुनें, हमारे लोग हैं हमारा अच्छा बुरा समझते हैं वह हमें जो राय देंगे हमारे लिए देंगे हम उनकी सुनेंगे.  
 
 ग्रामीण कहते हैं,  हमें कुछ नहीं पता 
ग्रामीण बाहरी लोगों से बात करने से कतराते हैं, कुछ लोगों ने बात की तो कुछ लोग सवाल का जवाब देने के बजाय चुप रहे. अगर किसी ने बोला भी तो सिर्फ इतना कि हमें नहीं पता. सीओ विनोद प्रजापति जब पुलिस टीम के साथ हाबुडीह पहुंचे तो गांव वालों ने बात करने से इनकार कर दिया, पुलिस क्यों हमारे गांव आयी है.क्या हम अपने त्योहार भी नहीं मना सकते ? इस पर भी सरकार रोक लगा रही है कहकर विरोध करने लगे. 
 
इस गांव में सुनीता देवी से हमने बातचीत की कोशिश की तो उन्होंने कहा, हमारे गांव में ऐसी कोई समस्या नहीं है, सरकारी योजना हमारे गांव तक पहुंचती ही नहीं है. ना लोगों को वृद्धा पेंशन मिलता है, ना दूसरा कोई सरकारी लाभ मिलता है. लोग अंचल तक जाते हैं लेकिन सीधे लोग हैं इनके कागजी प्रक्रिया समझ नहीं आती. सुनीता गांव के ही स्कूल में पढ़ाती हैं जहां 45 विद्यार्थी हैं.  जाटो मुंडा कहते हैं सरकारी लोग पूछ रहे हैं मुझे वृद्धा पेंशन मिलता है.  उन्होंने दिया ही नहीं, तो कहां से मिलेगा बताइये, हम लेने सरकार के पास नहीं जायेंगे उन्हें देने के लिए हमारे गांव आना पड़ेगा.
 
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