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garhwa

  • Nov 12 2019 5:19AM
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भवनाथपुर सीट : पहले कंधे पर लाउडस्पीकर लेकर होता था प्रचार, 16 हजार रुपये में चुनाव लड़ कर कांग्रेस को हराये थे देहाती

भवनाथपुर सीट : पहले कंधे पर लाउडस्पीकर लेकर होता था प्रचार, 16 हजार रुपये में चुनाव लड़ कर कांग्रेस को हराये थे देहाती

विनोद पाठक

गढ़वा : भवनाथपुर सीट को 51 साल पहले सोशलिस्ट पार्टी की टिकट पर हेंमेंद्र प्रताप देहाती ने पहली बार कांग्रेस पार्टी से छीनी थी. इसके पूर्व मात्र 1962 को छोड़ कर वर्ष 1951, 1957 व 1967 में लगातार कांग्रेस पार्टी इस सीट पर काबिज थी. 

वर्ष 1962 में स्वतंत्र पार्टी की टिकट पर नगरऊंटारी स्टेट के स्वर्गीय शंकर प्रताप देव चुनाव जीते थे. लेकिन अगले 1967 के चुनाव में स्वयं शंकर प्रताप देव कांग्रेस में शामिल हुए और चुनाव जीते भी. लेकिन वर्ष 1969 में हुए मध्यावधि चुनाव में हेमेंद्र प्रताप देहाती ने सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव लड़ कर कांग्रेस के गढ़ से पहली बार यह सीट छीनने में सफल रहे. यद्यपि तीन साल बाद ही 1972 में हुए चुनाव में शंकर प्रताप देव ने कांग्रेस पार्टी से ही चुनाव लड़ कर अपनी खोयी हुई प्रतिष्ठा को पुन: प्राप्त कर ली. 

लेकिन उस समय नगरऊंटारी गढ़ परिवार की राजनीति पर जिस प्रकार पकड़ थी, उसके हिसाब से शंकर प्रताप देव उर्फ भइया साहेब के खिलाफ चुनाव लड़ कर जीतना बहुत बड़ी बात थी. सोशलिस्ट पार्टी को साधनहीन पार्टी के रूप में जाना जाता था. इसलिए हेमेंद्र प्रताप देहाती पूरे बिहार प्रांत में चर्चा में आ गये थे.

16 हजार रुपये खर्च हुए चुनाव में : अपने 1969 के चुनाव को याद करते हुए हेमेंद्र प्रताप देहाती कहते हैं कि उस चुनाव में उनके पास 8000 रुपये खुद के पास थे. करीब 8000 रुपये चंदा करके जमा किया और उसी पैसे से चुनाव लड़ कर जीत भी गये. उन्होंने कहा कि तब पैसे के अभाव में चुनाव प्रचार के लिए उनके पास चारपहिया गाड़ी नहीं थी. 

इसके कारण वे मोटरसाइकिल से ही लोगों से जनसंपर्क अभियान करते थे. प्रचार के लिए कंधा पर माइक और बैट्री लेकर लोग चलते थे. उन्होंने कहा कि उस चुनाव में उन्हें 20076 मत मिले थे. जबकि कांग्रेस प्रत्याशी शंकर प्रताप देव को 14563 मत ही मिले. इस प्रकार देहातीजी करीब 6000 मतों से विजयी हुए थे. देहातीजी कहते हैं कि उन्होंने पहला चुनाव वर्ष 1962 में लड़ा था. उस चुनाव में मात्र 2000 रुपये खर्च हुए थे. 

तब उनको मात्र 1300 ही वोट मिले थे. तब उनको बहुत हीन भावना महसूस हुई थी. लेकिन जब दूसरी बार 1967 के चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने चंदा से करीब 6000 रुपये जुटाये और चुनाव लड़ा, तो करीब 18 हजार वोट मिले. इसके बाद उनका मनोबल बढ़ा. उसी मनोबल से उन्होंने वर्ष 1969 के मध्यावधि चुनाव में पूरी शक्ति लगायी और चुनाव जीत कर विधायक भी बने.

 
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