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देश में समृद्धि का विरोधाभास

राजेंद्र तिवारी कॉरपोरेट एडिटर प्रभात खबर अस्सी के दशक में जब आर्थिक ‘ट्रिकल डाउन’ थ्योरी आयी थी और नब्बे के दशक में जब हमारी अर्थव्यवस्था इस सिद्धांत पर चलने लगी, तब तमाम लोगों, संस्थाओं, विचारकों, अर्थशास्त्रियों व समाज के लिए काम करनेवालों ने इसका विरोध किया. उस समय इस विरोध को दरकिनार कर दिया गया. […]

राजेंद्र तिवारी
कॉरपोरेट एडिटर
प्रभात खबर
अस्सी के दशक में जब आर्थिक ‘ट्रिकल डाउन’ थ्योरी आयी थी और नब्बे के दशक में जब हमारी अर्थव्यवस्था इस सिद्धांत पर चलने लगी, तब तमाम लोगों, संस्थाओं, विचारकों, अर्थशास्त्रियों व समाज के लिए काम करनेवालों ने इसका विरोध किया. उस समय इस विरोध को दरकिनार कर दिया गया.
यहां तक कि विरोध करनेवाले राजनीतिक दल जब सरकार में आये, तो वे भी अपने विरोध को बक्से में बंद कर उसी राह पर चलने लगे. हालांकि, 2004 के आसपास इस सिद्धांत के नकारात्मक नतीजों को लेकर कुछ जागरूकता आयी और रास्ता बदलने की कुछ कोशिशें भी शुरू हुईं, लेकिन ये कोशिशें भी भ्रष्टाचार की भेंट ही चढ़ती गयीं. भ्रष्टाचार का हल्ला मचा और इस हल्ले में फिर से हमारी नीतियां पुराने ढर्रे पर आ गयीं.
लेकिन, अब आइएमएफ ने ही सवाल खड़े कर दिये हैं, जो इस थ्योरी को आगे बढ़ाने में न सिर्फ अहम भूमिका निभाता रहा, बल्कि आर्थिक ऋणों के लिए अनिवार्य शर्त के तौर पर इस थ्योरी को जोड़ दिया. एक ताजा अध्ययन में आइएमएफ के अर्थशास्त्रियों ने कहा है कि यदि समृद्धतम 20 फीसदी लोग अपनी आय एक फीसदी अंक बढ़ाते हैं, तो पांच साल में विकास दर 0.1 फीसदी कम हो जाती है और यदि निचले पायदान के 20 फीसदी लोगों की आय एक फीसदी अंक बढ़ती है, तो विकास दर में प्रति वर्ष 0.4 फीसदी का इजाफा होता है. इस अध्ययन में 150 देशों के आर्थिक आकड़ों का विश्लेषण किया गया है.
हम इस अध्ययन के बिना ही अपने आसपास बढ़ती आर्थिक विषमता को देख सकते हैं. देश की दो तिहाई से ज्यादा आबादी आज भी ग्रामीण इलाकों में रहती है. इस थ्योरी के हिसाब से नीतियां बनने के बाद गांव में विकास पर नजर डालिए.
लेकिन, नजर डालने से पहले यह भी समझना जरूरी है कि सड़क, कार, बाइक, टीवी, मोबाइल, एसी, ब्रांडेड सामान की उपलब्धता भर विकास नहीं है. सबके लिए अच्छी शिक्षा व चिकित्सा सुविधाओं और आर्थिक, उत्पादक गतिविधियों को फायदेमंद बनाने के लिए आधारभूत संरचना की उपलब्धता के बिना जो विकास के मानक बताये जा रहे हैं या जिन्हें उपलब्धता के तौर पर गिनाया जा रहा है, उनका फायदा सिर्फ वे ही उठा रहे हैं, जिनकी पहुंच में अच्छी शिक्षा व्यवस्था व अन्य सुविधाएं हैं.
यहां यह जानना जरूरी है कि ताजा सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, हमारे देश में आज भी गांवों के 58 फीसदी से ज्यादा परिवार खेती की आय पर निर्भर हैं और इसमें 46 फीसदी परिवार पिछड़े वर्ग के, 16 फीसदी अनुसूचित जाति के और 13 फीसदी आदिवासी हैं. खेती की विकास दर डेढ़ फीसदी के आसपास है और महंगाई की दर इससे कहीं ज्यादा. यानी, खेती की आय पर आधारित लोगों की मुश्किलें बढ़ती हुई ही नजर आती हैं, भले ही हमारे देश की विकास दर सात फीसदी से ऊपर रहे या नौ फीसदी से ऊपर.
आइए, अब जरा नजर इस पर भी डालें कि इनके पास खेती योग्य जमीन कितनी है. 35 फीसदी परिवारों के पास एक एकड़ से कम जमीन है. एक से ढाई एकड़ की जोतवाले परिवार 35 फीसदी हैं.
ढाई एकड़ से ज्यादा की जोत 30 फीसदी के पास है और इस 30 फीसदी में से पांच फीसदी परिवार ही ऐसे हैं, जिनके पास 10 एकड़ या इससे बड़ी जोत है. अनुमान लगाना मुश्किल नहीं है कि खेती पर आश्रित परिवार किस तरह की मुश्किलों का सामना करते हैं. एक जानकारी और, 52 फीसदी परिवार कर्ज में डूबे हैं और बिहार, आंध्र व तेलंगाना जैसे राज्यों में खेतिहर कर्जदार परिवारों में से 50 फीसदी से ज्यादा ने महाजनों से कर्ज ले रखा है. इस कर्ज पर ब्याज का अनुमान लगाना कठिन नहीं है और यह भी समझना कठिन नहीं है कि कर्ज क्यों ले रखा होगा.
अब एक और रिपोर्ट पर नजर डालते हैं. देश में शिक्षा की स्थिति पर प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन द्वारा जारी ताजा रिपोर्ट ‘एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट’ के मुताबिक, कक्षा पांच में पढ़नेवाले बच्चों में से आधे से ज्यादा उतना भी नहीं पढ़ पाते, जितना कक्षा दो में ही आ जाना चाहिए. प्रथम ने यह रिपोर्ट देश के 577 ग्रामीण जिलों के स्कूलों का सर्वे के आधार पर तैयार की है.
गणित की बात करें, तो कक्षा आठ के 56 फीसदी और कक्षा पांच के करीब 75 फीसदी बच्चे भाग देना नहीं जानते. कक्षा आठ के 53 फीसदी बच्चे अंगरेजी का एक सामान्य वाक्य तक नहीं पढ़ पाते हैं. 2009 में कक्षा आठ के 60 फीसदी बच्चे अंगरेजी का सामान्य वाक्य पढ़ लेते थे. यानी, दिन-ब-दिन स्तर खराब ही होता जा रहा है. सरकारी स्कूलों का यह स्तर थोड़ा भी सक्षम परिवारों को निजी स्कूलों की ओर ले जा रहा है. 2005 में जहां निजी स्कूलों में पढ़नेवाले बच्चों की संख्या सिर्फ 16 फीसदी थी, 2014 में बढ़ कर 31 फीसदी हो गयी.
स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें, तो अपने देश में औसतन प्रति 1000 मरीज एक बेड ही उपलब्ध है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक, अपने देश में 1.40 लाख डाॅक्टरों की कमी है और करीब पौने तीन लाख नर्सों की. लेकिन, सरकार स्वास्थ्य सेवाओं के बजट को लगातार कम करती जा रही है. यहां भी यह समझना कठिन नहीं है कि यह कमी कहां हैं और इसकी वजह से भुगत कौन रहा है.
हम नौ फीसदी विकास दर हासिल करें या दहाई अंक में, स्किल इंडिया चलाएं या डिजिटल इंडिया या स्टार्ट अप इंडिया, देश की आधी से ज्यादा आबादी इनके दायरे से बाहर है. जब देश की आधी से ज्यादा आबादी विकास कार्यक्रमों से बाहर हो, तो आंकड़ों में जो भी समृद्धि दिखाई देती है, वह किसकी समृद्धि है? नोबेल अर्थशास्त्री स्टिगलिट्ज के मुताबिक, बिल गेट्स के पास इतनी संपत्ति है कि यदि वे कोई काम न करें और रोजाना 10 लाख डाॅलर खर्च करें, तो उन्हें अपनी पूरी संपत्ति खर्च करने में 217 साल लग जायेंगे. अपने देश में भी ऐसे तमाम लोग हैं, जो रोजाना 10 लाख रुपये खर्च करें, तो उनको भी अपनी पूरी संपत्ति खर्च करने में 200 से ज्यादा साल लग जायेंगे.
दूसरी तरफ 30 करोड़ से ज्यादा लोग ऐसे भी हैं, जिनके पास अपनी रोटी पर रोज खर्च करने को 40 रुपये भी नहीं होते! सोचिए, सोचना बहुत जरूरी है हम सबके लिए.
और अंत में…
यह लेख लिखते हुए मुझे अदम गोंडवी की लाइनें याद आ रही थीं. आप भी पढ़िए-
सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नाशाद है,
दिल पे रख कर हाथ कहिये देश क्या आजाद है! …
कोठियों से मुल्क के मेयार को मत आंकिये,
असली हिंदुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है!
सत्ताधारी लड़ पड़े है आज कुत्तों की तरह,
सूखी रोटी देख कर हम मुफलिसों के हाथ में!
जिस शहर के मुंतजिम अंधे हों जलवामाह के,
उस शहर में रोशनी की बात बेबुनियाद है.

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