gumla

  • Jul 11 2019 12:48AM
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टीबी से मां का निधन, पिता भी पीड़ित, बहनों ने छोड़ी पढ़ाई

गुमला : गरीबी के कारण इलाज नहीं करा पाने से टीबी बीमारी से तीन साल पहले मां का निधन हो गया. अभी पिता भी टीबी बीमारी से ग्रसित हैं और घर में रहते हैं. मां के निधन व पिता के बीमार होने और गरीबी के कारण तीन बहनों ने पढ़ाई छोड़ दी. क्योंकि स्कूल की जरूरत की चीजें खरीदने के लिए इन बहनों के पास पैसे नहीं थे. पेट भी भरना है, इसलिए बेटियों ने पढ़ाई छोड़ कर गांव स्तर पर मजदूरी कर रही हैं. यह मार्मिक कहानी सिसई प्रखंड के बोंडो पंचायत स्थित मादा गांव की है.

 
इस गांव में फुलदेव उरांव रहते हैं, जो तीन वर्षों से टीबी बीमारी से लड़ रहे हैं. फुलदेव की पत्नी शांति देवी का तीन साल पहले टीबी व अन्य बीमारी से मृत्यु हो चुकी है. बच्चियों की जब तक मां जीवित थी और पिता स्वस्थ थे, तब तक बेटियां स्कूल गयी. गरीबी में भी फुलदेव अपनी बेटियों को पढ़ा रहे थे, लेकिन टीबी बीमारी के कारण इस परिवार के ऊपर संकट के बादल मंडराने लगे. जिसका नतीजा है फुलदेव की बड़ी बेटी प्रियंका कुमारी (15 वर्ष), सोनी कुमारी (13 वर्ष) व अनुप्रिया कुमारी (9 वर्ष) ने स्कूल जाना छोड़ दिया है.
 
घर की आर्थिक स्थिति खराब होने पर बड़ी बेटी प्रियंका मजदूरी करने लगी. एक छोटा भाई अक्षय उरांव (10 वर्ष) है, जो अभी स्कूल जा रहा है. प्रियंका ने कहा : हमारा परिवार गरीबी में जी रहा है. पिता बीमार हैं. उनका इलाज अस्पताल की दवा से चल रहा है, लेकिन बीमारी ठीक नहीं हुई है. इसलिए परिवार चलाने के लिए वह खुद मजदूरी करती है. प्रियंका ने कहा कि पढ़ने की इच्छा है, लेकिन पैसा नहीं है. अगर प्रशासन मदद करे और हम तीनों बहनों का नामांकन हॉस्टल में करा दे, तो हम पढ़ लिख कर कुछ कर सकते हैं.
 
तीनों बहनों के हॉस्टल में नामांकन की गुहार :प्रियंका आठवीं कक्षा, सोनी छठी कक्षा व अनुप्रिया चौथी कक्षा में पढ़ती थी. इस दौरान उन्होंने स्कूल जाना छोड़ दिया. तीनों बहनों के स्कूल छोड़ने की सूचना पर रिश्तेदारों ने उन्हें पढ़ाने की पहल की है. हालांकि रिश्तेदार भी गरीबी में जी रहे हैं. इसलिए प्रियंका के मामा ने तीनों बहनों का किसी हॉस्टल में नामांकन कराने की पहल की है. इसके लिए उन्होंने सीडब्ल्यूसी से तीनों बहनों का हॉस्टल में नामांकन करने की गुहार लगायी है.
 
मामा ने कहा है कि सोनी व अनुप्रिया को रांची के हॉस्टल व प्रियंका का नामांकन सिसई प्रखंड के कस्तूरबा स्कूल में हो जाये, तो ये लोग पढ़ सकते हैं. बेटियों को पढ़ने के लिए सहारा मिल जाये, तो घर में पड़े बीमार फुलदेव की चिंता दूर जायेगी. उनका इलाज चल रहा है. भाई अक्षय अभी स्कूल में पढ़ रहा है. रिश्तेदार उसके खाना-पीने की व्यवस्था कर लेंगे, लेकिन बेटियों की पढ़ाई की चिंता है. क्योंकि अब ये बड़ी हो रही है. अगर इन्हें हॉस्टल में नहीं रखा गया, तो बहकावे में आकर मानव तस्करी का शिकार हो सकती हैं.
 
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