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  • Jun 18 2018 7:35AM

Ranchi : गोलपोस्ट में सपनों का किक दाग रही झारखंड की बेटियां

Ranchi : गोलपोस्ट में सपनों का किक दाग रही झारखंड की बेटियां

दिवाकर सिंह ‍@ रांची

यह झारखंड का फुटबॉल टैलेंट है. यह टैलेंट शहर में नहीं बल्कि ग्रामीण इलाकों में तैयार हो रहा है. यहां कोई खेल अकादमी की सुविधा नहीं है. फिर भी खिलाड़ी अपने जोश और जुनून के बदौलत सफलता की कहानी लिख रहे हैं. यह कहानी रांची के आसपास के कुछ गांवों की है. रांची से करीब 14 किमी दूर पर स्थित है चारीहुजीर मैदान (कांके ब्लॉक). यहां प्रतिदिन सुबह छह बजे से 200 खिलाड़ी फुटबॉल की ट्रेनिंग लेते हैं.

खास बात यह है कि इसमें अधिकतर लड़कियां हैं. ये खिलाड़ी अपने सपनों को गोलपोस्ट तक पहुंचाने में कड़ी मेहनत कर रहे हैं. और इन खिलाड़ियों को प्रशिक्षण दे रहे हैं आनंद प्रसाद गोप और हेलेना टेटे. दोनों के प्रयास से सिर्फ चारीहुजीर ही नहीं बल्कि आसपास के आठ गांवों में लगभग 400 लड़कियां फुटबॉल का प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं. सबसे खास बात यह है कि इसमें चार लड़कियां अक्तूबर में इंग्लैंड जानेवाली हैं, जहां फुटबॉल के मैदान पर अपना दम दिखायेंगी.

शुरुआत में गांव के लड़के मैदान पर फेंक देते थे कांच

चारीहुजीर गांव में 2013 में आनंद, हेलेना और हीरालाल महतो ने मिलकर फुटबॉल के टैलेंट को सामने लाने का मुहिम शुरू किया था. इसमें ऑस्कर फाउंडेशन ने भी सहयोग दिया. शुरुआत में 15 लड़कियों की ट्रेनिंग से यह सफर शुरू हुआ. शुरुआत में गांववाले मजाक उड़ाते.  स्थानीय लड़कों ने कई तरीकों से परेशान भी किया. कभी मैदान में कांच फेंक देते, तो कभी खुद ही फुटबॉल खेलने लगते. फिर भी इनका हौसला नहीं टूटा. गांव की पंचायत से बात की और लड़कियों के परिजन से भी. धीरे-धीरे और भी लड़कियां फुटबॉल की ट्रेनिंग के लिए सामने आने लगी. चारीहुजीर के बाद जीराबार, होचई, सदमा, रुदिया, ओयना, पाहनटोली और इसके बाद चुटू गांव इस मुहिम से जुड़ गये. खिलाड़ियों की संख्या बढ़ती चली गयी और पांच साल में इन आठ गांवों में लगभग 600 खिलाड़ियों ने प्रशिक्षण लेना शुरू किया.

राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता खेल चुकी हैं लड़कियां

चारीहुजीर में कुछ ऐसी गर्ल्स प्लेयर हैं, जो राष्ट्रीय स्तर तक अपना हुनर दिखा चुकी हैं. इसमें शीतल टोप्पो इरबा के बरटोली की रहने वाली हैं. वह अब तक 10 राष्ट्रीय स्तर प्रतियोगिता में झारखंड का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं. बेस्ट स्कोरर का अवार्ड भी जीत चुकी हैं. अंशु कच्छप भी पांच राष्ट्रीय स्तर की फुटबॉल प्रतियोगिता में अपना दम दिखा चुकी हैं. इनके अलावा नेहा, फूल कुमारी, टिंकी कुमारी, आरती मुंडा और प्रियंका कच्छप भी ऐसे खिलाड़ियों में शुमार हैं, जिन्होंने
राष्ट्रीय पटल पर अपना पहचान बनायी है. यही नहीं दो खिलाड़ी फीफा वर्ल्ड कप देखने और वहां स्थानीय मैच खेलने के लिए रूस जा रही हैं.

रंग ला रही है आनंद और हेलेना की मेहनत

आनंद प्रसाद गोप मैदान में फुटबॉल का प्रशिक्षण देने का काम करते हैं, तो हेलेना लड़कियों के परिजन से मिलकर उन्हें पढ़ाई और फुटबॉल खेलने का महत्व बताती हैं. सभी गांवों में अलग-अलग प्रशिक्षक लड़कियों और लड़कों को प्रशिक्षण देने का काम करते हैं. आनंद बताते हैं कि शुरू में काफी परेशानी हुई. परिजन अपने बच्चों को यहां आने से मना करते थे. अब जब लड़कियां इस मुकाम तक पहुंच गयी हैं, तो बाकी परिजन भी अपने बच्चों को प्रशिक्षण के लिए यहां भेजते हैं. हेलेना बताती है कि इन्हें फुटबॉल के साथ बेहतर शिक्षा भी दी जाती है. इन्हें बताया जाता है कि किसी से बात कैसे की जाती है. इंग्लिश भी सिखायी जाती है.

सिर्फ 11 साल की उम्र में प्रियंका की हो रही थी शादी, विरोध कर बन गयी फुटबॉलर

इनके बीच खिलाड़ी प्रियंका की कहानी कुछ अलग है. वर्ष 2013 से फुटबॉल की ट्रेनिंग ले रही हैं और इंग्लैंड जा रही हैं. हालांकि यहां तक का सफर इतना आसान नहीं था. प्रियंका बताती हैं कि 11 साल की उम्र में मां ने राजस्थान में मेरी शादी तय कर दी थी. इसके बाद मैं ग्राउंड आयी और सर और मैडम को अपनी बात बतायी. दोनों ने मेरे परिजन को समझाने की कोशिश की, लेकिन वे अपनी जिद पर अड़े रहे. इसके बाद घरवालों का विरोध कर ओड़िशा में राष्ट्रीय प्रतियाेगिता खेलने चली गयी. उसी दौरान मेरी मां घर छोड़कर दिल्ली चली गयी. ओड़िशा से वापसी के बाद मुझे घर का सारा काम करना पड़ता था और उसके बाद मैं फुटबॉल खेलने आती थी. मां आज भी हमारे साथ नहीं रहती है, लेकिन मेरे इंग्लैंड जाने की बात सुनकर उसको यह समझ में आ गया है कि मैंने कुछ गलत नहीं किया है.

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