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  • May 18 2017 6:09AM

महिलाओं को संपत्ति का अधिकार

महिलाओं को संपत्ति का अधिकार
डॉ सय्यद मुबीन जेहरा
शिक्षाविद् 
drsyedmubinzehra@gmail.com
हमारे समाज में जहां महिलाओं को उनके हक से वंचित रखने के लिए सारे प्रयास किये जाते हैं, वहीं झारखंड से एक अच्छी खबर आयी है. पिछले दिनों झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास ने यह घोषणा की कि झारखंड में महिलाओं को अब अचल संपत्ति खरीदने पर कोई निबंधन व स्टांप शुल्क नहीं देना होगा. इसे अब केवल टोकन स्टांप के नाम से जाना जायेगा. इस पहल को महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण के लिए  जरूरी बताया गया है. 
 
राजस्व एवं भूमि सुधार विभाग की समीक्षा बैठक में यह अत्यंत ही अहम फैसला लिया गया. टोकन मनी का केवल एक रुपया लेगी राज्य सरकार. जिस तरह से आज संपत्ति वितरण में वैश्विक लैंगिक असमानता नजर आती है, महिलाओं के नाम संपत्ति उनके लिए असमानता से भरे समाज में समानता की एक किरण मानी जा सकती है. 
 
घर-परिवार की संपत्ति के वितरण में लैंगिक असमानता के परिणाम समाज और महिलाओं के उत्थान में बाधा बन सकते हैं. इसलिए महिलाओं के पास जमीन, मकान, रियल एस्टेट इत्यादि का होना जरूरी है. संपत्ति में महिलाओं का कम शेयर लैंगिक इक्विटी और व्यक्ति, घर-परिवार व सामुदायिक कल्याण पर पड़नेवाले उसके प्रभाव का एक महत्वपूर्ण विचार-बिंदु है. 
 
अपने देश में महिलाओं के हक में जमीन-जायदाद हमेशा से ही कम आयी है या आयी ही नहीं है. यह भी देखने को मिलता है कि संपत्ति से दूर रखने के लिए महिलाओं पर कई अत्याचार भी किये जाते रहे हैं. उन्हे कोख में मारने से लेकर डायन कह कर मार दिया जाता है. संपत्ति का अधिकार परिवार समाज एवं कुल में हमेशा पुरुषों का ही एकाधिकार माना जाता रहा है. यहां तक की महिला भी उसकी संपत्ति ही कहलाती रही है. 
 
किसी गैरसरकारी संस्था के हवाले से आयी एक खबर यह बताती है कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समाज के समूह  आज भी सार्वजनिक वस्तुओं एवं संसाधनों से वंचित हैं. इन वंचित समूहों में महिलाएं तो प्रमुख हैं ही, इसमें आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यक समूह भी शामिल हैं. सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज की रिपोर्ट-2016 यह कहती है कि आज भी सार्वजनिक साधनों से सबसे अधिक वंचित समूहों में आदिवासी, दलित, अल्पसंख्यक एवं महिलाएं हैं. इनका मुख्यधारा के विकास से वंचित होना हमारे समाज के पक्षपाती नजरिये को दर्शाता है.
 
ये समूह भूमिहीनता के भी सबसे ज्यादा शिकार हैं. भूमिहीनता में सबसे ऊपर दलित समाज (57.3 प्रतिशत) है. अल्पसंख्यक समूह 52.3 प्रतिशत भूमिहीनता से ग्रस्त है, जबकि महिलाएं 56.8 प्रतिशत भूमिहीनता की शिकार हैं. 
 
एक और विशेष बिंदु जो यह रिपोर्ट रेखांकित करती है, वह यह है कि आदिवासी समाज सबसे अधिक अगर भूमिहीनता का शिकार हुआ है, तो उसका कारण है विकास आधारित विस्थापन. इन सबको देखते हुए हमें यह भी ध्यान में रखना है कि विकास को भूमि सुधार प्रयासों का हिस्सा बनाया गया है या नहीं. साफ शब्दों में कहें, तो क्या भूमि सुधार प्रयास इन समूहों को भूमि पर अधिकार दिलवा रहे हैं या फिर जो इनकी अपनी जन्मभूमि है, उससे ही वंचित कर रहे हैं? 
 
यह एक बड़ा प्रश्न है, जो इन सभी भूमि सुधारों पर ही प्रश्न चिह्न लगा देता है. आज जरूरी है कि हम अधिकारों के साथ-साथ समाज के हाशिये पर रहनेवाले समूहों के मौलिक अधिकार और उनकी सांस्कृतिक एवं पारंपरिक जरूरतों का भी ध्यान रखें. सरकार की योजनाओं में यह बहुत महत्वपूर्ण बिंदु होना चाहिए, जो पारंपरिक समूहों की जमीनी सच्चाई से भी जुड़ा हो. हम उनके विकास की परिभाषा को उनके पारंपरिक सूक्ष्म दर्शन से न अलग करें. इन्हें मुख्यधारा से जोड़ने के लिए जरूरी है कि इनकी पारंपरिक दुविधाओं को समझा जाये और उनका अध्ययन करके उन्हें विकास की डोर से जोड़ा जाये. महिलाओं के नाम से संपत्ति अगर होगी, तो महिलाओं की भूमिका प्रमुख दायरे में आयेगी और परिवार एवं समाज में उनका आत्मसम्मान बढ़ जायेगा. साथ ही उनका आर्थिक सशक्तिकरण भी होगा. बेटियां होंगी, तो उनके होने की खुशी होगी और संपत्ति उनके नाम होगी, तो उनके आर्थिक पंखों में भी उड़ान होगी. 
 
महिलाओं को भूमि एवं संपत्ति के हक से जोड़ना समाज में प्राकृतिक  न्याय का एक अहम कदम है. इसके लिए केवल सरकार के फैसले या योजनाएं ही नहीं काम करेंगी. इन समूहों के अंदर से भी आवाज उठनी चाहिए. अल्पसंख्यक समाज में धर्म के अंदर महिलाओं को और बेटियों को संपत्ति में हक है, लेकिन सवाल यह है कि क्या उनका परिवार और उनका समाज उनको ईमानदारी से वह हक देता है. 
 
ऐसे में, हमारे समाज के लिए जरूरी है कि वह महिलाओं के प्रति सौतेला व्यवहार बंद करे और उन्हें भूमिहीनता जैसे भेदभाव से मुक्त करे. इसी के साथ समाज में एक प्राकृतिक न्याय होगा और हाशिये पर रहनेवाले समूह मुख्यधारा का हिस्सा बन पायेंगे.
 
जब महिलाओं के हक का सवाल समाज का सवाल होगा, तभी उनका सशक्तिकरण भी होगा. भारत के दो प्रमुख प्रांत कर्नाटक और महाराष्ट्र में यह पहल 1994 में हुई और फिर इसे पूरे देश में अपनाया गया. महिलाओं को संपत्ति पर पुरुषों के बराबर अधिकार दिया गया है.
 
इसके परिणाम भी दूसरी पीढ़ी में देखे गये, जहां महिलाओं ने अपनी आर्थिक योग्यता को अपनी अगली पीढ़ी की महिलाओं के उत्थान के लिए उपयोग किया. अगर संपत्ति में महिला का नाम होगा, तो उसे बैंकों से ऋण लेने में सहायता होती है, जिससे वह रोजगार शुरू कर सकती है. यह एक ऐसी कठिनाई है, जिसका सामना अक्सर वे घरेलू महिलाएं करती आयी हैं, जिनके नाम पर कोई संपत्ति नहीं होती. 
 
सरकार को अपनी सभी विकास योजनाओ में महिलाओं के सकारात्मक परिणामों काे रखना होगा. अगर ये सभी योजनाएं समाज के पिछड़े समूहों तक पहुंचेंगी, तभी समाज में सकारात्मक बदलाव आयेगा और प्राकृतिक न्याय का रास्ता खुल पायेगा. तब हम समाज में सामाजिक भेदभाव की जंग को भी समाप्त होता जरूर देख पायेंगे. 
 

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