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  • May 16 2017 6:14AM

भारत-पाक के बीच बढ़ती दूरी

सुमित झा
यूजीसी सेंटर फॉर साउथर्न एशिया स्टडीज
पांडिचेरी सेंट्रल यूनिवर्सिटी
sumitjha83@gmail.com
 
बीते एक मई को तड़के पाकिस्तानी विशेष बलों के एक समूह द्वारा भारतीय सीमा में 250 मीटर से ज्यादा भीतर घुस कर बीएसएफ की 200वीं बटालियन के हेड कांस्टेबल प्रेम सागर और सेना के 22वें सिख रेजिमेंट के नायब सूबेदार परमजीत सिंह की हत्या कर उनके शवों को क्षत-विक्षत कर दिया गया. इस घटना ने पाकिस्तान के अमानवीय पक्ष को अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने फिर से उजागर किया है. 
 
इसी बीच भारतीय जांच एजेंसी द्वारा घटनास्थल से प्राप्त खून के नमूनों से इस बात की पुष्टि हो गयी है कि पाकिस्तानी सैनिकों द्वारा ही भारतीय जवानों की निर्मम हत्या की गयी. यह कोई पहली बार नहीं है, जब पाकिस्तानी सेना ने संघर्ष-विराम का उल्लंघन करते हुए इस तरह के क्रूरतापूर्ण कार्य को अंजाम दिया. 
 
बल्कि, पिछले तीन साल में मोदी सरकार के तमाम प्रयासों के बावजूद, पाकिस्तानी सरकार तथा सेना का भारत के प्रति व्यवहार सकारात्मक नहीं रहा है. इस घटना का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ऐसे समय में जब कश्मीर में तनाव की स्थिति है, यहां तक कि वहां पर होनेवाले उप चुनाव को रद्द करना पड़ा है, पाकिस्तान ने इस जघन्य अपराध के माध्यम से वहां की स्थिति को और बिगाड़ने का प्रयास किया है, ताकि अलगाववादी वहां की आम जनता को आसानी से सरकार के विरोध में अपने साथ खड़ा कर सकें. 
 
पिछले काफी समय से कश्मीर के सवाल पर अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में पाकिस्तान पूर्णतः असफल रहा है. हाल ही में भारत की यात्रा पर आये तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तईप एर्दोगन का यह कहना कि हमेशा के लिए इस समस्या को सुलझाने हेतु कई पक्षीय बातचीत होनी चाहिए. 
इससे पाकिस्तान को एक अवसर मिला कि वह अपनी अापराधिक हरकतों से कश्मीर के मामले पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित कर सके. वहीं डान लीक्स मुद्दे पर पाकिस्तानी सरकार तथा सेना के बीच टकराव की स्थिति गंभीर हो गयी है, इसका पता उस समय चला जब पाकिस्तानी सेना ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के द्वारा विदेश मामलों के अपने मुख्य सलाहकार तारीक फातमी के हटाये जाने के आदेश को रद्द कर दिया. 
 
पाकिस्तान की विदेश नीति में, खासकर भारत के संदर्भ में अपनी पकड़ को और मजबूत करने के उद्देश्य से भी पाकिस्तानी सेना ने ऐसा किया है. इसकी पुष्टि इस बात से होती है, जब कुछ दिनों पहले ही पाकिस्तानी सेना प्रमुख ने भारत से सटे सीमावर्ती इलाके में जाकर अपने जवानों के सामने भारत विरोधी भड़काऊ भाषण दिया था. 
 
पाकिस्तानी मामलों के जानकार और विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस घटना को भारतीय उद्योगपति सज्जन जिंदल तथा प्रधानमंत्री शरीफ की मुलाकात की खबर से भी जोड़ कर देखा जा सकता है. 
 
चूंकि सज्जन जिंदल प्रधानमंत्री मोदी और नवाज शरीफ दोनों के करीबी बताये जाते हैं, ऐसे में कयास यह भी लगाया जा रहा है कि सज्जन जिंदल तथा प्रधानमंत्री शरीफ की मुलाकात के पीछे का राज यह था कि बैक चैनल से भारत एवं पाकिस्तान के बीच एक बार फिर बातचीत शुरू की जाये. हालांकि, इससे पहले कि दोनों देशों की तरफ से इस दिशा में गंभीर प्रयास किये जाते, पाकिस्तानी सेना ने बर्बरतापूर्ण कार्य करके ऐसी किसी भी संभावना को ध्वस्त कर दिया. 
 
भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को आइएसआइ ने ईरान से बंधक बनाया. पाकिस्तान ले जाकर रखा तथा पिछले महीने उन पर पाकिस्तानी सेना की विशेष अदालत ने  पाकिस्तान के विरुद्ध जासूसी करने का आरोप लगा कर, उसे मृत्युदंड की सजा सुनायी. इससे जुड़ी महत्वपूर्ण बात यह भी है कि न केवल भारतीय मीडिया, बल्कि पाकिस्तानी मीडिया ने भी वहां के सैनिक न्यायालय के इस फैसले पर प्रश्न चिह्न लगाया है. इसी संदर्भ में अपनी कंगारू कार्यशैली के कारण आंतरिक तथा बाहरी दबावों को झेल रही पाकिस्तानी सेना ने दो भारतीय जवानों की निर्मम हत्या की, ताकि पाकिस्तानी लोगों के बीच वह अपनी साख बढ़ा सके. 
 
इन हाल की घटनाओं से एक बार फिर यह बात साफ हो गयी है कि इस्लामाबाद नयी दिल्ली के साथ रिश्तों को सुधारने के पक्ष में बिल्कुल भी गंभीर नहीं है. बल्कि, आतंकवादी हमलों और चीन के सहयोग से भारत को अस्थिर करने की पुरजोर कोशिश करने में लगा है.
 
ऐसे में, मोदी सरकार के लिए यह जरूरी हो जाता है कि वह एक ऐसी समग्र नीति बनाये, जिससे पाकिस्तान को उसके निरंकुश आचरण के लिए सटीक जवाब दिया जा सके. साथ ही, इसके लिए भी प्रयास किये जाने चाहिए, जिससे कश्मीर में शांति और सुरक्षा का वातावरण बहाल हो और आम जन-जीवन सुचारू रूप से चल सके. मोदी सरकार को उन पहलुओं पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है, जिनकी बदौलत पाकिस्तान को भारत से आर्थिक एवं अन्य लाभ प्राप्त हो रहे हैं.
 

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