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  • Apr 20 2017 6:32AM

समाज रोके शादी में फिजूलखर्ची

समाज रोके शादी में फिजूलखर्ची
डॉ सय्यद मुबीन जेहरा
शिक्षाविद् 
हमारे समाज में बहुत सी बुराइयां इतनी खामोशी से दाखिल हुई हैं कि इनसे जूझने के बावजूद हम इन्हें बुराइयां मानने को राजी नहीं हैं. इनमें से एक बुराई शादी में किया जानेवाला बेतहाशा खर्च है. हालांकि, हम यह जानते हुए भी कि समाज की बहुत सी बीमारियों की जड़ में यह वबा भी है, पर इसे बुराई मानने को तैयार नहीं हैं. चाहे हमें कर्ज तक ही क्यों न लेना पड़े, मगर हम अपनी झूठी शान को बनाये रखने के लिए शादी में खूब खर्च करते हैं. अक्सर यह खर्च दूल्हे वालों की तरफ से मांग के तौर पर भी होते हैं. यह खर्च उस समाजी बुराई दहेज से अलग ही होता है, जिसके नाम पर न जाने कितनी जिंदगियां बरबाद हो जाती हैं. कम दहेज लाने की वजह से दुल्हनें अपनी सुसराल में ताने सुनने को मजबूर होती हैं. 
 
यहां हम जो बात कर रहे हैं, उसमें दहेज के खर्चे नहीं, बल्कि अपनी शान दिखानेवाले वे खर्चे हैं, जिनसे अगर बचा जाये, तो उम्र हो जाने के बाद भी शादी-ब्याह में होनेवाली देरी को दूर किया जा सकता है. हैरत की बात तो यह है कि जब आप अपनी बेटी की शादी करनेवाले होते हैं, तब तो आपको ये खर्च बहुत चुभते हैं. मगर, जब आप अपने लड़के की शादी करने निकलते हैं, तब आप की मांग यह होती है कि आपकी इज्जत का ख्याल रखते हुए बारातियों का शानदार स्वागत हो और आप बारातियों की संख्या पर भी काबू नहीं रखना चाहते हैं. 
 
अति तो तब होती है, जब बारात किसी एक शहर से दूसरे शहर रेल से जानी हो. तब आप किराया भी लड़की वालों पर डाल देते हैं. सिर्फ आपके हाथ में भीख का कटोरा नहीं होता है, मगर आप की मांग वैसी ही लगती है. अब तो लड़की वाले मजबूर होकर लड़के के शहर ही चले जाते हैं, जहां कोई मैरिज हाल आदि किराये पर लेकर वहीं से शादी कर देते हैं. ऐसा करते हुए लड़की वालों पर यह दबाव रहता है कि किस रिश्तेदार को शामिल करें और किसको नहीं. अगर इन तमाम हालात को देखें, तो हम समझ सकते हैं कि एक जोड़े की नयी जिंदगी शुरू करने के लिए इन सब खर्चों की जरूरत नहीं होती है, बल्कि दो परिवारों के करीब आने के साथ-साथ दो दिलों के भी समीप आने का मामला है. उसमें खर्च से कुछ खास अंतर नहीं पड़नेवाला है, क्योंकि हम आये दिन देखते हैं कि अक्सर शान से की गयी शादियों में भी कड़वाहट घुल जाती है और अगर चलना हो, तो बिना दिखावे की शादियां मिसाल बन जाती हैं.
 
शादी-ब्याह में खर्चों में कमी की बात हमेशा की जाती रही है, मगर समाज में यह बुराई इतने अंदर तक दाखिल हो चुकी है कि इसको रोक पाना मुश्किल दिखाई देने लगा है. ऐसे में जम्मू-कश्मीर से एक बहुत अच्छी खबर आयी है, जिसके मुताबिक जम्मू-कश्मीर सरकार शादी में फिजूलखर्ची रोकने के लिए कानून ला रही है. राज्य सरकार ने शादी को लेकर एक बड़ा फैसला सुनाते हुए खर्चों पर लगाम लगा दी है. राज्य सरकार ने यह फैसला लिया है कि किसी भी सरकारी और निजी प्रोग्राम में लाउडस्पीकर, पटाखों का इस्तेमाल नहीं किया जायेगा. इसके अलावा शादी के कार्ड के साथ मिठाई और ड्राइ फ्रूट्स देने पर भी रोक लगा दी गयी है.
 
जम्मू-कश्मीर सरकार के इस नये आदेश के अनुसार, अब जम्मू-कश्मीर में लड़के की शादी में ज्यादा से ज्यादा 400 और लड़की की शादी में ज्यादा से ज्यादा 500 मेहमानों को ही दावत दी जा सकती है. मंगनी जैसे समारोह में अधिक से अधिक 100 लोगों को ही बुलाया जा सकता है. कश्मीर में तो जो खास खाना वाजवान है, उसमें 32 तरह के पकवान होते हैं.
 
अगर खाने की बरबादी हो, तो आप सोच सकते हैं कि यह खर्च कितना और बढ़ जाता होगा. इसलिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने यह भी निर्णय किया है कि शादियों में चाहे सब्जी हो या मांस, सात से अधिक डिश नहीं होंगी. मिठाई की भी भरमार पर रोक लगाते हुए कहा गया है कि दो से ज्यादा किस्म की मिठाई नहीं दी जा सकती. एक और अच्छा फैसला पर्यावरण संरक्षण के तौर पर यह भी किया गया है कि प्लास्टिक का सामान इस्तेमाल करने पर इसे ढंग से कूड़े के हवाले करना होगा. साथ ही, डीजे बजाने और आतिशबाजी को लेकर भी अच्छा फैसला किया गया है, जिस पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गयी है.
 
इससे पहले यह खबर भी आयी थी कि विवाह के खर्च पर काबू पाने के लिए मुल्क में भी नया कानून बन सकता है. उस खबर के अनुसार, अगर शादी में पांच लाख से अधिक खर्च हुए, तो जुर्माना भरना पड़ सकता है. अतिथियों की संख्या की सीमा भी तय की जा सकती है. लोकसभा में कांग्रेस सांसद रंजीत रंजन भी यह मांग कर चुकी हैं कि शादी-ब्याह में फिजूलखर्ची रोकने के लिए कानून बनना चाहिए. उनके अनुसार, अगर कोई परिवार शादी के दौरान पांच लाख रुपये से अधिक राशि खर्च करता है, तब उसे गरीब परिवार की लड़कियों के विवाह में इसका कुछ प्रतिशत देना चाहिए.
 
रंजीत रंजन ने कहा है कि विवाह दो लोगों का पवित्र बंधन होता है और ऐसे में सादगी को महत्व दिया जाना चाहिए. लेकिन, दुर्भाग्य से इन दिनों शादी-ब्याह में दिखावा और फिजूलखर्ची बहुत बढ़ गयी है.
 
समस्या सामाजिक है, जिस पर विधेयक लाने से अधिक लोगों का स्वयं यह सोचना जरूरी है कि इस प्रकार के अनावश्यक खर्चों से वे कैसे बचें. जिस समाज की असंवेदनशीलता ऐसी बढ़ गयी हो कि रात के डेढ़ बजे अगर बारात पहुंचती हो, तो यह सोचे बिना कि बुजुर्ग बीमार और वे बच्चे जिनको सवेरे स्कूल जाना है, उनकी परीक्षाएं हो रही हैं, इस समय सो रहे होंगे, बैंड-बाजे में कमी नहीं करता हो, रात गये कान फाड़नेवाले पटाखों से भी परहेज न करता हो, रात-रात भर मुहल्ले में डीजे बजवाता हो, तो ऐसे समाज को कानून नहीं, बल्कि अपने अंदर की जागरूकता ही सही डगर पर ले जा सकती है.
 

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