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  • Oct 7 2019 1:51AM
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मातृ शक्ति का सम्मान करें

आशुतोष चतुर्वेदी
प्रधान संपादक, प्रभात खबर
ashutosh.chaturvedi@prabhatkhabar.in

 
भारतीय परंपरा में महिलाओं को उच्च स्थान दिया गया है. हम लोगों ने नौ दिनों तक नारी स्वरूपा देवी की उपासना की और उन्हें पूजा है. कई राज्यों में कन्या जिमाने और उनके पैर पूजने की भी परंपरा है. एक तरह से यह त्योहार नारी के समाज में महत्व और सम्मान को भी रेखांकित करता है, लेकिन वास्तविकता में आदर का यह भाव समाज में केवल कुछ समय तक ही रहता है. महिला उत्पीड़न की घटनाएं बताती हैं कि हम जल्द ही इसे भुला देते हैं. भारत का संविधान सभी महिलाओं को बिना किसी भेदभाव के सामान अधिकार की गारंटी देता है.
 
 इसके अलावा संविधान में राज्यों को महिलाओं और बच्चों के हित में विशेष प्रावधान बनाये जाने का अधिकार भी दिया है, ताकि महिलाओं की गरिमा  बरकरार रहे, लेकिन इन सब बातों के बावजूद देश में महिलाओं की स्थिति अब भी मजबूत नहीं है. उनकी सुरक्षा को लेकर अक्सर चिंता जाहिर की जाती है. उन्हें निशाना बनाया जाता है. कानून के बावजूद कार्यस्थलों पर उनके साथ भेदभाव किया जाता है.
 
दरअसल, हमारी सामाजिक संरचना ऐसी है, जिसमें बचपन से ही यह बात बच्चों के मन में स्थापित कर दी जाती है कि लड़का लड़की से बेहतर है. इन बातों के मूल में यह धारणा है कि परिवार और समाज का मुखिया पुरुष है और महिलाओं को उसकी व्यवस्थाओं को पालन करना है. यह सही है कि परिस्थितियों में भारी बदलाव आया है, लेकिन अब भी ऐसे परिवारों की संख्या कम है, जिनमें बेटे और बेटी के बीच भेदभाव किया जाता है. यह भेदभाव सार्वजनिक जीवन में प्रकट होने लगता है, जबकि पिछले कुछ वर्षों के दौरान महिला सशक्तीकरण की दिशा में भी उल्लेखनीय कार्य हुआ है. 
 
महिलाएं जिंदगी के सभी क्षेत्रों में सक्रिय हैं. चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो या फिर शिक्षा, कला-संस्कृति अथवा आइटी या फिर मीडिया का, लेकिन अब भी  महिलाओं के काम का सही मूल्यांकन नहीं होता. घर को सुचारु रूप से संचालित करने में उनके दक्षता की अक्सर अनदेखी कर दी जाती है. अर्थव्यवस्था के संदर्भ में जीडीपी की अक्सर चर्चा होती है, उसमें भी नारी शक्ति का बड़ा योगदान है. यह सही है कि आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी के मामले में भारत दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले बहुत पीछे है. 
 
महिलाओं की अर्थव्यवस्था में भागीदारी बढ़ाने से न केवल सामाजिक व्यवस्था, बल्कि अर्थव्यवस्था में भी बदलाव लाया जा सकता है. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का मानना है कि अगर भारत में आर्थिक विकास में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के बराबर हो जाए, तो भारत की जीडीपी में भारी वृद्धि हो सकती है. भारत सरकार के आंकड़ों के मुकाबिक  देश के कुल श्रम बल में महिलाओं की हिस्सेदारी 25.5 फीसदी और पुरुषों का हिस्सेदारी 53.26 फीसदी है. 
 
कुल कामकाजी महिलाओं में से लगभग 63 फीसदी खेती-बाड़ी के काम में लगी हैं. 2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार जब कैरियर बनाने का समय आता है, उस समय अधिकांश लड़कियों की शादी हो जाती है. विश्व बैंक के आकलन के अनुसार भारत में महिलाओं की नौकरियां छोड़ने की दर बहुत अधिक है. यह पाया गया है कि एक बार किसी महिला ने नौकरी छोड़ी, तो ज्यादातर दोबारा नौकरी पर वापस नहीं लौटती है.
 
एक ओर हम दस दिन तक नारी शक्ति को पूजते हैं, तो दूसरी ओर बच्‍चों और महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न और छेड़छाड़ की घटनाएं कोई नयी बात नहीं हैं. अक्सर इस तरह के अनेक मामले सामने आते रहते हैं. इन मामलों को बेहतर ढंग से सुलझाने के लिए भारत में प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेस यानी पॉक्सो एक्‍ट बनाया गया है. 
 
इस कानून के तहत आरोपी को सात साल या फिर उम्र कैद की सजा का प्रावधान है. हमारे पास एक मजबूत कानून उपलब्ध है, लेकिन बावजूद इसके ऐसी घटनाएं रुक नहीं रहीं हैं. कुछ समय पहले महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने प्लान इंडिया की ओर से तैयार की गयी रिपोर्ट की रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में महिलाओं के लिए सबसे सुरक्षित राज्य गोवा है. 
 
इसके बाद केरल, मिजोरम, सिक्किम और मणिपुर आते हैं. चिंता की बात यह कि बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और देश की राजधानी दिल्ली महिला सुरक्षा के मामले में फिसड्डी हैं. झारखंड को कुछ अलग तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है. पिछले कुछ वर्षों में झारखंड से बच्चियों की तस्करी के कई मामले सामने आये हैं, जिसमें बच्चियों के मां-बाप को बहला फुसला कर उन्हें दिल्ली से सटे गुरुग्राम ले जाया गया है. 
 
दरअसल, तमाम प्लेसमेंट एजेंसियां के एजेंट देशभर में सक्रिय हैं, जो गरीब माता-पिता को फुसला कर लड़कियों को उन तक पहुंचाते हैं. कानूनन 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों से घरेलू कामकाज नहीं कराया जा सकता है, पर देश में ऐसे कानूनों की कौन परवाह करता है. कुछ समय पहले तक पश्चिम बंगाल में परिवार की बुजुर्ग और विधवा महिलाओं को वृंदावन और वाराणसी छोड़ आने की अमानवीय प्रथा का प्रचलन था. अब भी इन दोनों स्थानों पर विधवाएं संघर्षमय जीवन व्यतीत करती नजर आ जायेंगी.
 
लेकिन परिदृश्य ऐसा भी नहीं है, जिसमें उम्मीद की कोई किरण नजर न आती हों. पिछले कुछ वर्षों में सरकारी कोशिशों और सामाजिक जागरूकता अभियानों के कारण महिलाओं की स्थिति में सुधार आया है. यह बदलाव शिक्षा से लेकर स्वास्थ्य तक के आंकड़ों में दिखायी देता है. 
 
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है. सरकारी प्रयासों के कारण शिक्षण संस्थानों तक लड़कियों की पहुंच लगातार बढ़ रही है. मिड डे मील योजना बड़ी कारगर साबित हुई है. एक दशक पहले हुए सर्वेक्षण में शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 55.1 प्रतिशत थी, जो अब बढ़ कर 68.4 तक पहुंच गयी है यानी शिक्षा के क्षेत्र में 13 फीसदी से अधिक की वृद्धि दर्ज की गयी है. 
 
बाल विवाह की दर में गिरावट को भी महिला स्वास्थ्य और शिक्षा के लिहाज से अहम माना जा रहा है. कानूनन अपराध घोषित किये जाने और लगातार जागरूकता अभियान के कारण बाल विवाह में कमी तो आयी है, लेकिन इसका प्रचलन खास कर गांवों में अब भी बरकरार है. शिक्षा और जागरूकता का सीधा संबंध घरेलू हिंसा से भी है. 
 
हालांकि अब इन मामलों में भी कमी आयी है. रिपोर्ट के मुताबिक वैवाहिक जीवन में हिंसा का सामना करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 37.2 से घट कर 28.8 रह गया है, पर जान लीजिए, जब तक महिलाओं के प्रति समाज में सम्मान की चेतना पैदा नहीं होगी, तब तक ये सारे प्रयास नाकाफी हैं. यह परिवार के बड़े बुजुर्गों की जिम्मेदारी है कि वे नवयुवकों को बचपन से ही नारी शक्ति का आदर करना सिखाएं.
 
 
 
 
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