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  • Aug 25 2019 2:09AM
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बहुआयामी व्यक्तित्व व अनोखी उपलब्धियों के धनी थे जेटली

आर राजागोपालन

वरिष्ठ पत्रकार
अरुण जेटली धारा के विरुद्ध तैरनेवालों में शुमार रहे हैं. वर्ष 2013 में जब एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में लालकृष्ण आडवाणी के नाम की चर्चा हो रही थी और नरेंद्र मोदी विचार-विमर्श के लिए भी गांधी नगर से दिल्ली आने को इनकार कर चुके थे, तो वह जेटली ही थे, जो उन्हें वहां से दिल्ली लाने में सफल रहे. 
 
वह एक श्रेष्ठ रणनीतिकार थे. उन्होंने एक भरी-पूरी जिंदगी पायी. राजनीति, कॉरपोरेट जगत, कानूनी पेशे, राजनय एवं पत्रकारिता में उनके मित्रों की खासी तादाद रही, जिसका उपयोग उन्होंने अपने राजनीतिक करियर के अलावा भारत की समकालीन सियासत को संवारने में किया.
 
 जेटली उन शुरुआती सियासतदानों में शुमार थे, जिन्होंने दिल्ली के बदलते राजनीतिक मिजाज को सटीकता से भांपा था. आडवाणी युग में उन्होंने भाजपा के बढ़ते प्रभाव तथा कांग्रेस के अस्त होते सितारों को बड़ी नजदीक से देखा. उन्होंने यह समझ लिया था कि भारतीय राजनीति में आडवाणी-बाजपेयी युग का अंत निकट आ रहा है और राष्ट्र एक परिवर्तन की इच्छा रखता है. 
 
कांग्रेस भ्रष्टाचार तथा कुप्रबंधन के संगीन मामलों में उलझ चुकी थी और राष्ट्रीय राजनीति पर उसकी पकड़ भी ढीली हो चुकी थी. इन परिस्थितियों में जेटली ने अपनी सियासी संबद्धता आडवाणी से हटा कर गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर स्थानांतरित कर दी और वेंकैया नायडू, सुषमा स्वराज, गोपीनाथ मुंडे एवं अनंत कुमार जैसे नेताओं को भी ऐसा ही करने को राजी कर लिया.
 
 वर्ष 2012-13 के दौरान उन्होंने पूरी लगन से मोदी के छवि-निर्माण की प्रक्रिया प्रारंभ की. एक वकील के रूप में अपनी विशेषज्ञता का प्रयोग करते हुए उन्होंने मोदी के विरुद्ध इकट्ठे कानूनी मामलों में बहस कर उन्हें निबटाना प्रारंभ किया और इस कथ्य को आगे किया कि मोदी की छवि बिगाड़ने को कांग्रेस ने उनके विरुद्ध ये राजनीति-प्रेरित मुकदमे दायर कराये. इस दृष्टिकोण को सामने रखने हेतु जेटली ने संसद में तर्क रखे, ब्लॉग लिखे, प्रेस सम्मेलनों को संबोधित किया और विपक्षी नेताओं के साथ नेटवर्क कायम किया. 
 
जेटली ने पार्टी के विभिन्न मंचों पर मोदी की उम्मीदवारी आगे करने की कोशिशें भी शुरू कीं, जिसने रंग लायी और वर्ष 2013 में पार्टी के गोवा सम्मेलन में नरेंद्र मोदी को पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. इसी बीच, जेटली अमित शाह को अदालती मामलों से उबारने हेतु उन्हें भी अपनी कानूनी सलाह मुहैया कराते रहे.
 
 वर्ष 2014 के आम चुनावों के निकट आने पर जेटली ने पार्टी प्रवक्ताओं की एक नयी पीढ़ी खड़ी कर उसे संवारा, जो एक स्वर में बोलते हुए पार्टी की नीतियां प्रभावी ढंग से पेश किया करते थे. उन्होंने निर्मला सीतारमण, जेपी नड्डा, धर्मेंद्र प्रधान, मीनाक्षी लेखी तथा किरण खेर जैसे नेताओं को प्रोत्साहित किया और उन्हें मजबूती से आगे बढ़ाया. 
 
 जेटली को दोस्त बनाने तथा लोगों को प्रभावित करने की कला बखूबी आती थी. इसके साथ ही वह अपनी खूबी-खामियों से भी भलीभांति परिचित रहे और यह तय किया कि वह हमेशा पर्दे के पीछे की सत्ता संचालित करेंगे. 
 
वर्ष 2014 में  मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वह उन्हें दो वर्षों तक दिल्ली की राजनीतिक बारीकियों से परिचित कराते हुए अपने नेटवर्क का इस्तेमाल कर श्रेष्ठ नौकरशाहों एवं विभिन्न पेशों में संलग्न अन्य पेशेवरों की सेवाएं उन्हें उपलब्ध कराते रहे. 
 
जेटली ने क्षेत्रीय नेताओं से भी घनिष्ठ संपर्क कायम किये. उन्होंने नीतीश कुमार से लेकर लालू यादव और शरद पवार जैसे सभी नेताओं से मित्रवत संबंध रखे. उन्होंने मोदी को जयललिता के निकट लाने में मदद पहुंचायी. जेटली जब भी चेन्नई जाते, तो जयललिता उनसे स्नेहपूर्वक मिला करतीं. 
 
 मोदी ने जेटली को वित्त मंत्रालय के अलावा रक्षा तथा सूचना और प्रसारण मंत्रालय जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां भी सौंपीं. मोदी कैबिनेट निर्माण जैसे अहम कार्यों में प्रायः उनकी सलाह लिया करते थे. इसके बावजूद, जब प्रवर्तन निदेशालय एवं अन्वेषण प्रभाग जैसे अहम हिस्से वित्त मंत्रालय से लेकर पीएम सचिवालय को स्थानांतरित कर दिये गये, तो जेटली ने उस पर एतराज भी नहीं किया. 
 
उन्हें नोटबंदी की रूपरेखा की जानकारी तो थी, पर उसे लागू किये जाने के वक्त से वह भी अनजान ही थे. दरअसल, वह  हमेशा मोदी के नेतृत्व और उन्हें प्राप्त विशाल जनादेश का सम्मान करते रहे.  सेना के लिए ‘एक रैंक एक पेंशन’ तथा देश में जीएसटी को लागू करना उनकी दो अहम उपलब्धियां रहीं.
 
 वर्ष 2017 से जेटली अस्वस्थ रहने लगे और उन्हें बजट भी बैठ कर ही पेश करना पड़ा था. बाइपास सर्जरी और किडनी प्रत्यारोपण से गुजरने के बाद उन्हें कैंसर से भी जूझना पड़ा. 
 
उन्होंने मोदी के दूसरे कार्यकाल में कोई पद भी ग्रहण नहीं किया, मगर लेखन तथा ब्लॉग के माध्यम से अपने विचार व्यक्त करते रहे. धारा 370 को निष्प्रभावी किये जाने पर हाल ही उनका अंतिम ब्लॉग आया, जिसमें उन्होंने इस कार्य को ‘एक असंभव की उपलब्धि’ बताया. जेटली भाजपा के अंदर कट्टरता के समर्थक नहीं रहे और उदारवादी विचारों के समर्थन के लिए याद किये जाते रहेंगे.
(अनुवाद : विजय नंदन)
 
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