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  • Aug 14 2019 2:41AM
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श्रम कानूनों का सरलीकरण

 डॉ अश्वनी महाजन

एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू
ashwanimahajan@rediffmail.com
हमारे देश में श्रम कानून अत्यंत जटिल हैं. अभी तक 44 प्रकार के श्रम कानून हैं, जिनके बीच सामंजस्य बिठाना भी कई बार कठिन हो जाता है. ये सभी कानून अलग-अलग विषयों से संबद्ध हैं. कुछ श्रम कानून मजदूरी दर से संबंधित हैं, तो कुछ अन्य सामाजिक सुरक्षा से. इसके साथ कुछ श्रम कानून हैं, जो औद्योगिक सुरक्षा एवं श्रम कल्याण से जुड़े हुए हैं और अन्य कानून औद्योगिक संबंधों से जुड़े हुए हैं. 
 
इन श्रम कानूनों को सरल बनाने की दृष्टि से सरकार द्वारा यह विचार किया गया कि सभी 44 श्रम कानूनों को चार संहिताओं में समाहित करते हुए एक नयी व्यवस्था लागू की जाये. 
 
एक संहिता मजदूरी दर से संबंधित है, दूसरी सामाजिक सुरक्षा से, तीसरी औद्योगिक सुरक्षा और श्रम कल्याण से जुड़ी हुई है और चौथी संहिता औद्योगिक संबंधों को लेकर है. मजदूरी श्रम संहिता तो संसद में पारित हो चुकी है, लेकिन दूसरी, यानी सामाजिक सुरक्षा संहिता, को संसद की स्थायी समिति को भेजा गया है. सरकार इन श्रम संहिताओं को एक बड़े सुधार के रूप प्रस्तुत कर रही है, लेकिन विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं. 
 
‘मजदूरी संहिता’ विधेयक पारित होने के बाद केंद्र सरकार के पास पूरे देश के लिए एक वैधानिक मजदूरी दर तय करने का अधिकार होगा. अब तक राज्य सरकारें अपने-अपने राज्य में मजदूरी दर निर्धारित करती थीं. अब न्यूनतम मजदूरी के प्रावधान पूरे देश में समान रूप से लागू होंगे, जिससे सभी कामगारों को बिना किसी क्षेत्रीय भेदभाव के न्यूनतम मजदूरी पाने का प्रावधान आ जायेगा. 
 
पचास करोड़ कामगारों के लिए एक न्यूनतम रहन-सहन व्यवस्था और स्तरीय जीवन-यापन को सुनिश्चित करना संभव हो पायेगा. इससे पहले यह बिल 2017 में लोकसभा में पेश हुआ था, जिसे तब संसद की स्थायी समिति को संदर्भित किया गया था. सोलहवीं लोकसभा के भंग होने के बाद यह विधेयक कालातीत हो गया था. 
 
सामाजिक सुरक्षा से संबंधित कानून, जिसमें कर्मचारी भविष्य निधि एवं अन्य प्रावधान कानून, कर्मचारी राज्य बीमा निगम कानून, भवन एवं अन्य निर्माण मजदूर कानून एवं कर्मचारी मुआवजा कानून इत्यादि शामिल हैं. इन सभी कानूनों को दूसरी आचार संहिता में शामिल करने का फैसला किया गया है. 
 
तीसरी श्रम संहिता में औद्योगिक सुरक्षा एवं श्रम कल्याण संबंधित कानून शामिल किये गये हैं, जिनमें से प्रमुख हैं, फैक्ट्री एक्ट, माइंस (खान) एक्ट, बंदरगाह मजदूर (सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कल्याण) एक्ट, इन सबको औद्योगिक सुरक्षा एवं कल्याण संहिता में शामिल करने की योजना है.
 
औद्योगिक संबंधों को लेकर कई एक्ट हैं, जैसे औद्योगिक विवाद एक्ट 1947, श्रम संघ कानून 1926 और औद्योगिक रोजगार एक्ट 1946. इन कानूनों को जोड़कर एक संहिता बनायी गयी है, जिसे औद्योगिक संबंध संहिता कहा गया है. 
 
चारों श्रम संहिताओं में से केवल मजदूरी संहिता (वेज कोड) ही मात्र ऐसी संहिता है, जिसको कुछ मजदूर संघों का समर्थन है. इस संहिता के माध्यम से देश में सभी मजदूरों के लिए बिना किसी क्षेत्र के भेदभाव के न्यूनतम मजदूरी मिलना संभव हो सकेगा. 
 
यह मजदूरी संहिता संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों में लागू होगी. कुछ मजदूर संगठन इसको समर्थन दे रहे हैं. लेकिन शेष तीनों संहिताओं का वे भरपूर विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि विभिन्न श्रम कानूनों को श्रम संहिताओं में बदलने के नाम पर सरकार पूंजीपतियों के समर्थन और मजदूर के विरोध में काम कर रही है. 
 
कुछ मजदूर संगठन मजदूरी संहिता का भी विरोध कर रहे हैं, क्योंकि अप्रेंटिस को कामगार की श्रेणी से रद्द कर दिया गया है और न्यूनतम मजदूरी दर का निर्धारण कमेटियों के दम पर छोड़ दिया गया है. नयी संहिता में श्रम इंस्पेक्टर के स्थान पर श्रम इंस्पेक्टर एवं फैसिलिटेटर (सुविधा देनेवाला) का प्रावधान रखा गया है. मजदूर संगठनों का कहना है कि इससे लेबर इंस्पेक्टर की शक्तियां समाप्त हो जायेंगी और इस कारण से मजदूर का शोषण हो सकता है. 
 
सरकार का कहना है कि श्रम कानूनों के सरलीकरण का मकसद कानूनों के अनुपालन में सुविधा और ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ को बेहतर करना है, ताकि रोजगार में वृद्धि हो, लेकिन श्रम संगठन इसको सही नहीं मानते. 
 
औद्योगिक संबंधों को लेकर बनी श्रम संहिता को मजदूर विरोधी माना गया है. इसमें मजदूरों के हड़ताल के अधिकारों को समाप्त करने और बाहरी लोगों के मजदूर संगठनों में शामिल होने पर रोक लगायी जा रही है. गौरतलब है कि मजदूर संगठनों में भारी मात्रा में कुछ क्षेत्र में काम नहीं करनेवाले लोगों की बड़ी संख्या होती है, जो मजदूर संगठनों को समय-समय पर मदद करते हैं.
 
सामाजिक सुरक्षा संबंधी श्रम संहिता में बड़े फेर-बदल हो रहे हैं, जो वास्तव में मजदूर विरोधी दिखते हैं. मजदूर संगठनों का कहना है कि ईएसआई और ईपीएफ (कर्मचारी भविष्य निधि) जिसमें लगभग चार करोड़ मजदूर शामिल हैं, में व्यापक फेर-बदल हो रहे हैं और भविष्य निधि की इस संचित राशि को राज्यों को सौंपा जा रहा है.
 
 सरकार का मकसद चाहे कुछ भी हो, लेकिन श्रम संगठनों को ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार के पास जमा संचित राशि सुरक्षित है, लेकिन राज्यों के पास यह राशि स्थानांतरित होने के बाद उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं रहेगी. ईपीएफ की राशि को प्राइवेट फंड मैनेजरों जैसे मध्यस्थों के माध्यम से संचालित करने का प्रावधान रखा गया है, जिससे ईपीएफ बाजारी परिस्थितियों पर निर्भर हो जायेगी. इसका असर यह हो सकता है कि कर्मचारियों की मेहनत की कमाई बाजार के हवाले हो जायेगी. 
 
कार्यस्थल पर श्रमिकों की सुरक्षा के बारे में श्रम संहिता संवेदनहीन बतायी जा रही है. यह श्रम संहिता सर्वव्यापी नहीं है. कई मामलों में यह दस और कई अन्य मामलों में बीस से कम मजदूरों वाले संस्थानों में यह संहिता लागू नहीं होगी. सीवेज जैसे खतरनाक काम करनेवाले मजदूर इसमें शामिल नहीं हैं. गैर-कानूनी खनन में भी मजदूरों की सुरक्षा इस संहिता में नहीं होती. 
 
श्रम कानूनों का सरलीकरण करना और उसके अनुपालन को बेहतर बनाना सही दिशा में कदम हो सकता है, लेकिन श्रम कानूनों के सरलीकरण के नाम पर मजदूरों की भविष्य निधि में छेड़छाड़ और मजूदरों के मौलिक अधिकारों का हनन या उनके शोषण संबंधी कानूनों में ढील लाने को सही नहीं माना जा सकता. इसलिए मजदूरी संहिता के बाद संसद में पारित होनेवाली अन्य संहिताओं के संबंध में सरकार और अधिक संसद संवेदनशील होगी, तो बेहतर नतीजे मिल सकते हैं. 
 
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