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  • Aug 14 2019 2:39AM
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दक्षिण में भाजपा की बढ़त

आर राजागोपालन
वरिष्ठ पत्रकार
rajagopalan1951@gmail.com

पिछले दिनों देश के गृह मंत्री अमित शाह द्वारा तमिलनाडु एवं कर्नाटक के एक दिवसीय दौरे से दक्षिण भारत की राजनीति अचानक ही गरमा गयी. उन्होंने कर्नाटक के बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण किया. चूंकि लगभग पूरा दक्षिण भारत ही बाढ़ की चपेट में है, यह स्वाभाविक ही था कि शाह द्वारा केवल कर्नाटक का हवाई सर्वेक्षण केरल के सत्तारूढ़ गठबंधन को नागवार गुजरा और माकपा ने ही गृह मंत्री पर केरल के साथ भेदभाव के आरोप चस्पा कर दिये. 
 
इसी बीच, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी ने अमित शाह से मुलाकात कर अपने राज्य में बाढ़ राहत के लिए केंद्र की सहायता मांगी. तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ने भी भाजपा से नजदीकियां बढ़ानी शुरू की हैं. लोकसभा चुनावों के पूर्व चंद्रशेखर राव द्वारा ममता बनर्जी तथा डीएमके नेता एमके स्टालिन के साथ तीसरे मोर्चा के गठन की कोशिशें विफल रही थीं. 
 
इधर कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) की सरकार के पतन तथा येदियुरप्पा के सत्तारोहण के पश्चात यों भी दक्षिण में भाजपा का हाथ ऊपर है. कांग्रेस अब सिर्फ केंद्रशासित पुदुचेरी में ही बची है और प्रधानमंत्री मोदी ने कांग्रेस-मुक्त दक्षिण भारत का सपना कमोबेश साकार कर लिया है.
 
अब तमिलनाडु की राजनीतिक गतिविधियों की ओर रुख करें. वहां तीन ऐसी प्रमुख घटनाएं हुईं, जो गौर के काबिल हैं. पहली, जम्मू और कश्मीर को लेकर संविधान के अनुच्छेद 370 को शक्तिहीन करने के कदम की तारीफ करते हुए रजनीकांत ने अमित शाह की मौजूदगी में प्रधानमंत्री मोदी की तुलना कृष्ण से करते हुए शाह को उनका अर्जुन बताया. 
 
तमिलनाडु के जन मानस में रजनीकांत के प्रभाव को देखते हुए उनके द्वारा की गयी यह तारीफ काफी मायने रखती है, जिसका असर भाजपा के पक्ष में जायेगा और उसकी झोली में हिंदू मतों की संख्या में खासी बढ़ोतरी होगी. हिंदू भावनाओं को मजबूती देनेवाले एक अन्य घटनाक्रम में कांचीपुरम में लगभग एक करोड़ हिंदुओं द्वारा ‘अथि वरादर’ की पूजा की जानी भी शामिल है. 
 
ज्ञातव्य है कि यहां का देव विग्रह चालीस वर्षों में एक बार एक कूप से बाहर निकाला जाता है. इस उत्सव को लेकर हिंदू भक्तों में व्याप्त भक्ति एवं उत्साह की वजह से तमिलनाडु के परंपरागत द्रविड़ नेताओं में घबराहट है, क्योंकि इस एकजुटता के चलते भी हिंदुत्व एवं भाजपा के समर्थकों का उत्साह बढ़ा है.
 
तीसरी घटना वेल्लौर संसदीय निर्वाचन क्षेत्र में संपन्न हुआ उप चुनाव है, जिसमें मतों की छह बार हुई पुनर्गणना के पश्चात डीएमके का प्रत्याशी महज आठ हजार मतों के छोटे अंतर से विजयी हो सका.
 
 इस उप चुनाव को लेकर तमिलनाडु समेत पूरे देश में उत्सुकता थी और राज्य की दोनों परंपरागता प्रतिद्वंद्वी पार्टियों- डीएमके तथा एडीएमके ने इसे अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा था. इस जोरदार चुनावी अभियान में अनुच्छेद 370 के शिथिलीकरण और तीन तलाक को लेकर लिये गये विधायी कदम तीव्र विवाद के मुद्दे बने हुए थे. 
 
इस संसदीय निर्वाचन क्षेत्र के लिए ये मुद्दे इसलिए भी अहम थे, क्योंकि इसके तीन विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों में मुसलिम आबादी की बहुतायत है. इस अभियान का एक दिलचस्प पहलू यह था कि एडीएमके ने भाजपा को इससे दूर ही रखा. 
 
एक ओर जहां एडीएमके के चुनावी अभियान का नेतृत्व उसके नेता और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री इके पलानीस्वामी ने स्वयं ही किया, वहीं दूसरी ओर डीएमके नेता एमके स्टालिन के साथ उनके पुत्र तथा पार्टी के युवा मोर्चे के नेता उदयनिधि स्टालिन ने अपनी पार्टी के उम्मीदवार के प्रचार में पूरा जोर लगाया.
 
इस उप चुनाव में डीएमके उम्मीदवार की एक छोटे अंतर से जीत का एक निहितार्थ तो यह हुआ है कि डीएमके द्वारा उदयनिधि स्टालिन को पार्टी के भावी नेता के रूप में उभारने की कोशिशों को धक्का लगा. 
वेलोर से पार्टी का उम्मीदवार भी एक डीएमके नेता का पुत्र ही था. उधर, हालांकि एडीएमके उम्मीदवार की पराजय हुई, पर यह पार्टी इसलिए खुश है कि उसे डीएमके के लिए जीत का अंतर अत्यंत कम कर देने में उल्लेखनीय सफलता मिली.
 
कर्नाटक में नवनिर्वाचित मुख्यमंत्री येदियुरप्पा के लिए सियासी समस्याएं बढ़ती जा रही हैं, जिन्हें अपने मंत्रिमंडल का गठन भी करना है. हालांकि, कांग्रेस की फूट और उसमें वरीय कांग्रेस नेताओं की प्रभावहीनता को लेकर वह येदियुरप्पा को कोई गंभीर चुनौती दे पाने की स्थिति में नहीं है. 
 
इस पूरे परिदृश्य में यह निश्चित है कि दक्षिण भारत में भाजपा को अपनी जड़ें गहरी करने का मौका मिल गया है, जहां उसका लक्ष्य है कि वह वर्ष 2024 में तमिलनाडु एवं केरल से अपने 20 सांसद जिता कर दिल्ली ला सके. 
 
हाल ही में अनुच्छेद 370, तीन तलाक तथा सूचना के अधिकार संबंधी मुद्दों पर संसद में दक्षिण के क्षेत्रीय दलों ने भाजपा के लिए संकटमोचन का काम किया है. दर असल, इन क्षेत्रीय दलों को भी अपने राज्य की नाव खेने में केंद्र के सक्रिय सहयोग की जरूरत है. कुल मिलाकर दक्षिण भारत में भाजपा की सियासत सफल होती नजर आती है.
(अनुवाद: विजय नंदन)     
 
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