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  • Jun 26 2019 3:08AM
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हिंदी-उर्दू की अजब-गजब कथा

मृणाल पांडे
ग्रुप सीनियर एडिटोरियल
एडवाइजर, नेशनल हेराल्ड
mrinal.pande@gmail.com
 
हमारे राज, समाज और सोशल मीडिया पर इन दिनों उर्दू को जबरन सिर्फ मुसलमानों की भाषा मनवाने और हिंदी से सभी फारसी-अरबी मूल के शब्द हटा कर उसका ‘शुद्धीकरण’ करने की एक नादान मुहिम चलायी जा रही है. उसे देख कर एक कहानी याद आ गयी. पुराणों में दो सिर वाले पक्षी की कथा है. 
 
इस दुर्लभ पक्षी का एक सिर दूसरे से अकारण बैर पाल बैठा और अपने दुश्मन सर को मार डालने के लिए उसने खाना-पीना बंद कर दिया, लेकिन जल्द ही वह खुद भी चल बसा. दुश्मनी निभाते हुए वह भूल बैठा था कि सरों के बीच मतभेद भले ही हो, दोनों का शरीर तो विधाता ने एक ही बनाया था और इसलिए अगर एक सिर को उसने मार दिया, तो खुद उसका मरना भी अवश्यंभावी हो जायेगा.
 
भाषाओं को राजनेता या व्याकरणाचार्य नहीं, आम जनता बनाती है. कबीलाई समाज एक राष्ट्र-राज्य बनते हुए जैसे-जैसे बहुरंगी बहुधर्मी होता जाता है, उसकी भाषाई संपदा भी लगातार समृद्ध होती है. उत्तर भारत में अरबी, फारसी बोलनेवालों की फौजों के लिए जब आगरा, दिल्ली का इलाका छावनी बना, तो स्थानीय खड़ी बोली, ब्रज, पंजाबी, अवधी या भोजपुरी सरीखी भाखाएं उससे सहज मिलने-जुलने लगीं.
 
 ये स्थानीय बोलियां वे थीं, जिनको अमीर खुसरो ने अपने (संभवत: पहले लोकभाषा कोष) खालिकबारी में हिंदवी और 17वीं सदी के पुर्तगाली व्यापारियों ने इंडोस्तानी (जो बाद में बिगड़ कर हिंदुस्तानी बन गया) कहा.
 
 बोलियों को भारतीय लेखक भाखा ही कहते रहे. भाखाओं के विपरीत क्लासिकी भाषाएं संस्कृत और फारसी आज की अंग्रेजी की ही तरह राज दरबार और राजकाज की, पर सीमित तबकों की भाषाएं बनी रहीं. उनकी अपनी सुघड़ (फारसी तथा देवनागरी) लिपियां और व्याकरण थे. उर्दू और हिंदी दोनों ही व्यावहारिक वाचिक परंपरा के बीच बनीं, पली और बढ़ी हैं. भारत का लिखित साहित्य अक्सर हस्तलिखित होता था और बहुत कम लोग साक्षर थे. लिहाजा नयी प्रिंटिंग मशीनों के आने के सदी बाद भी छपाई तथा लिपि के सवालों की जकड़बंदी से देश फिरंट बना रहा. 
 
संगीत के बड़े घरानों के प्राय: अनपढ़ वाग्गेयकार-उस्ताद भी गा कर ही सिखाते थे. बहुत हुआ तो कभी-कभार बोल कर अपने साक्षर या अर्ध साक्षर छात्रों से संगीत की वे बंदिशें उर्दू लिपि में लिखवा देते थे, जिनको 20वीं सदी में जाकर मराठी पंडित भातखंडे ने पहली बार नागरी लिपि में दर्ज किया. मध्यकाल और रीतिकाल के कई कवियों की कविताओं की ज्यादातर हस्तलिखित प्रतियां नागरी नहीं, उर्दू लिपि में हैं. 
 
जब 1854 में इस्ट इंडिया कंपनी के साहिबों ने उत्तर भारत की शिक्षा पद्धति को अपने लिए साक्षर कारकुन बनाने के लिए कसना शुरू किया, तब वुड्स नाम के साहिब ने जो रपट दी, उसके अनुसार उत्तर भारत में कंपनी ने अपनी जड़ें मजबूत कर लीं थीं, किंतु राजधानी कलकत्ता होने के कारण यह भ्रांति थी कि बांग्लाभाषी बहुसंख्य हैं. सलाह हुई कि बहुसंख्य उत्तर भारतीय, हिंदू मुसलमान एक ही बोली, (जिसे पुर्तगाली हिंदुस्तानी कहते हैं) बोलते हैं, वही भाषा स्कूली शिक्षा का माध्यम बने. 
 
अब सवाल आया कि लिपि कौन-सी अपनायी जाए? इस पर साहिब लोगों ने कुलीन घरानों, राजे-रजवाड़ों और जमींदारों से पूछताछ की, तो अधिकतर ने कहा कि फारसी चूंकि कई सदियों से राजभाषा रही है, अधिकतर साक्षर वही लिपि जानते हैं, इसलिए उसी का इस्तेमाल हो. एक सुधारवादी हिंदू राजा राममोहन राय ने तो अंग्रेजी, उर्दू तथा हिंदी, इन तीन भाषाओं में अखबार निकाले, यानी साक्षर हिंदू मुसलमानों की दो अलग भाषाएं हैं. 
 
जो देसी स्कूलों में पढ़ रहे हैं, उनमें हिंदू बच्चों की तादाद मदरसों में फारसी पढ़नेवालों से अधिक है. सच तो यह था कि सारे भारतीय तब बहुभाषा-भाषी थे. एक हिंदू हरिहरदत्त ने जाम-ए-जहांनुमा अखबार निकाला हुआ था, जिसके संपादक लाला सदासुख थे. एक अन्य उर्दू अखबार (शम्सुल अखबार) भी दो हिंदू मित्रमोहन दत्त और मुनीराम ठाकुर निकाल रहे थे. 
 
साहिब लोग 1857 के बाद हिंदू-मुसलमानों की करीबी से खुश न थे और अलगाव का पेच फंसाने की कोशिश कर रहे थे. इस मुहिम में उनको लिपि की मार्फत नयी पीढ़ी के साक्षरों के बीच सांप्रदायिक दीवारें बनाने की सूझी. खुद वे मूलत: भारत के अंग्रेजी के प्रकाशनों पर कड़ी नजर रखते थे, जिनमें छपी उनकी लालची लूट की खबरें ब्रिटेन महारानी के कान तक पहुंचने से उनका बोरिया बिस्तर गोल हो सकता था. 
 
सो, उन्होंने उर्दू में लिखी हिंदुस्तानी को मुसलमानों की भाषा, और नागरी में लिखी उसी भाषा को हिंदुओं की भाषा मान कर दोनों भाषाओं के मानकीकरण का ठेका फोर्ट विलियम काॅलेज में नियुक्त अपने चार ‘भाखा मुंशियों’ को सौंप दिया. इस तरह उत्तर भारत में एक ही जन भाषा का उर्दू और हिंदी के दो नायाब सिरों वाला संस्करण बनने लगा.
 
यहां से इस पटकथा में धार्मिक चोगाधारी राजनीति और प्रकाशन व्यवसाय का समवेत प्रवेश होता है, जिसने जाने-अंजाने दोनों सिरों के बीच अंग्रेजाें के मंसूबों को धार दे दी, पर हिंदी-उर्दू प्रकाशन व्यवसाय की दो भुजाएं बनी रहीं.
 
 छपी किताबों में इन्हीं दो भाषाओं की सबसे अधिक बिक्री होती थी. सो, दो (मराठीभाषी) हिंदू ब्राह्मणों ने हिंदी में बनारस अखबार निकाला, तो उर्दू में बनारस गजट. इसको बनारस नरेश ने भी माली मदद दी. उसके बाद अन्य देसी रजवाड़े भी नींद से जागे. इंदौर के राजा होलकर के प्रेस से मालवा अखबार निकला और जयपुर से राजपूताना अखबार हिंदी और उर्दू में खबरें देते थे. 
 
बनारस में सुधाकर अखबार भी 1853 में नागरी और उर्दू दोनों में छपता रहा. यह भारी गलतफहमी है कि हिंदी-उर्दू में कोई पैदाइशी बैर था. बात तब हद से ज्यादा बिगड़ी, जब उर्दू पाकिस्तान के बनने की एक वजह उन नेताओं द्वारा बना दी गयी, जो अपनी निजी जिंदगी में कतई अंग्रेजीदां और भाखा विमुख थे. हिंदी भी भारत में वोटबैंक राजनीति का मोहरा बनने लगी. उसे उत्तर भारतीय राजनेताओं द्वारा बढ़ाने के विरोध में दक्षिण भारत भड़क उठा. 
 
हिंदी उर्दू का यह नायाब गरुड़, जिसने हमको प्रेमचंद, रतननाथ सरशार, मंटो और राजिंदर सिंह बेदी दिये, जिसने मीर, गालिब, फराज और इकबाल, घनानंद, बाबा नागार्जुन, बिहारी की सतसई और सदारंग अदारंग के नायाब खयाल दिये, आज अपनी जड़ें बेवजह मध्यकालीन धर्म और धार्मिक साहित्य में खोजता हुआ उन बोलियों- ब्रज, अवधी, पंजाबी, हरियाणवी, मैथिली, भोजपुरी, से मुंह फेर चुका है, जिन्होंने कभी गंगा-जमुना की तरह उनको सींचा था. 
 

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