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  • May 26 2019 2:53AM
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चाहिए सशक्त और विवेकी विपक्ष

चाहिए सशक्त और विवेकी विपक्ष

तरुण विजय
(
वरिष्ठ नेता, भाजपा)

अच्छी सरकार के लिए एक सुविचारित और सशक्त विपक्ष अनिवार्य होता है. जिस देश में विपक्ष मरा हुआ, थका हुआ, बुद्धिहीन और धन लिप्सा में लिप्त भ्रष्ट होता है, वहां की सरकारें अच्छे से अच्छे नेता के नेतृत्व में भी जनविमुख और निरंकुश हो जायें, तो किसी को आश्चर्य नहीं होता.

पंडित नेहरू के समय लोकसभा में विपक्ष में सौभाग्य से न केवल विद्वान और सिद्धांतनिष्ठ राजनेता उपस्थित थे, बल्कि उस समय की कांग्रेस में भी अपने नेता और शासन की आलोचना का साहस होता था. तब की कांग्रेस अपनी भीतरी आलोचनाओं को दबाती नहीं थी, हां नेता थोड़ा-बहुत नाराज हो जायें, तो अलग बात है.  

यह बहुत बड़ी विडंबना तथा दुर्भाग्यजनक स्थिति है कि आज विपक्ष में साखहीन और तर्कहीन नेताओं की भीड़ है, जिनका प्रथम लोकतांत्रिक परिचय पारिवारिक सामंतवाद एवं विवेक और ज्ञान से मीलों की दूरी है. भारत में लोकतंत्र की जय-जयकार तो की जाती है, लेकिन आगे बढ़ती भाजपा और खंडहरों में सिमटती कम्युनिस्ट पार्टियों के अलावा देश की सभी पार्टियां एक नेता या एक परिवार की खेती की फसल है. वैसे तो जो पार्टियां पारिवारिक नहीं हैं, वहां भी दिल्ली के आदेश से धुर निचले स्तर तक चुनावहीन सर्वानुमति ही पसंद की जाती है, पर चुनाव नाम की कुछ प्रक्रिया होती तो है. 

सेक्युलर या गैर-सेक्युलर, किसी भी विपक्षी पार्टी में उस नैतिक बल से खड़े होने का कोई साहस नहीं कर पा रहा है, जो कभी माधव प्रसाद त्रिपाठी, चरण सिंह, कर्पूरी ठाकुर, मधु दंडवते, मधु लिमये, इंद्रजीत गुप्त, नानजी देशमुख, अटल जी, लालकृष्ण आडवाणी, भैरो सिंह शेखावत, ज्योति बसु, बीजू पटनायक या मुलायम सिंह कर पाते थे. लोग इनकी बात सुनते थे और इनके इर्द-गिर्द इकट्ठा होने का मन बनाते थे.

मुलायम सिंह यादव जनसंघ और भाजपा के खिलाफ रहे पर हिंदी, देश की सुरक्षा, विदेश मूल के व्यक्ति का प्रधानमंत्री न बनना जैसे मुद्दों पर उन्होंने पार्टी की सीमाएं लांघी. इनमें से किसी भी व्यक्ति पर राजनीतिक बेईमानी, भ्रष्टाचार या घटियापन का कभी आरोप नहीं लगा. उनसे घोरतम असहमति संभव थी, लेकिन जो छोटापन या राष्ट्रीयता की सीमा के परे मोहल्ला छाप राजनीति इस बार दिखी, ऐसा कभी पहले के विपक्षी नेताओं के बारे में सोचा ही नहीं जाता था. 

आखिरकार देश से बड़ा तो कोई दल या नेता हो ही नहीं सकता. लेकिन, उनका देश वहीं तक है, जहां तक उनका वोट बैंक है. क्या ऐसा विपक्ष राष्ट्रीय विपक्ष कहा जा सकता है? जिस देश में ऐसे विपक्षी नेता हों, जिन्हें अपने झूठ के लिए तनिक भी लज्जा न हो और सर्वोच्च न्यायालय के सामने माफी मांगने पर भी वे इसे अपनी हेकड़ी समझते हों, जिस विपक्षी पार्टी में सिवाय दो परिवार जनों के तीसरा कोई भी ऐसा नेता न हो, जो पार्टी उम्मीदवारों के लिए विभिन्न चुनाव क्षेत्रों में जनसभा को संबोधित कर सके, वे देश का नेता पैदा करेंगे या घर की जायदाद का मुखिया? 

विपक्ष धारदार, असरदार और ईमानदार हो तो सरकार उसके डर से कांपती है, देश का भला होता है, सरकारी नेताओं का अहंकार तथा उनकी निरंकुश मनमानी नियंत्रित रहती है. भारत युवाओं का देश है और दुनिया में अपनी बुद्धि और विवेक की धाक जमानेवाला, घटिया बुद्धिहीन और पारिवारिक दुकान चलानेवाले नेताओं के विपक्ष से बेहतर विपक्ष चाहता है, जिनकी आंखों में अपने चुनाव क्षेत्र का मोतियाबिंद न हो, बल्कि जो पूरे वतन को अपना निर्वाचन क्षेत्र मानते हों.

सरकार किसी की भी हो, यह बेहद जरूरी होता है कि उसके नेता दूसरे पक्ष की आवाज सुनें और आलोचना को दुश्मन का षड्यंत्र नहीं, बल्कि मित्र की सलाह के नाते सम्मानित करें. ऐसी सरकार ही जमीनी स्तर तक देश की भलाई कर सकती है और इसके लिए जरूरी है मजबूत और विवेकी विपक्ष. 

ऐसे ही दृढ़ और राष्ट्रहित के लिए इकट्ठा होने का साहस दिखानेवाले विपक्ष ने इंदिरा गांधी की निरंकुशता को तोड़ा था. पर जब विपक्ष के बारे में यह कहा जा सके कि वह फिसल सकता है, बस कीमत लगानेवाला चाहिए, तो पूरे देश को छह-छह महीने साल-साल भर की ऐसी अस्थिर सरकारें मिली थीं, जिनके कारण देश बरसों पिछड़ गया. मोदीजी के नेतृत्व में स्थिरता और दृढ़ता की जो गारंटी मिली है, वह भारत के भविष्य का एक स्वर्णिम आश्वासन तथा वरदान ही कहा जा सकता है.

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