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  • May 24 2019 4:38AM
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यह जीत है विपक्ष के लिए सबक

योगेंद्र यादव
अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
yyopinion@gmail.com  
 
ए क असाधारण चुनाव का असाधारण नतीजा हमारे सामने है. यह परिणाम असाधारण सिर्फ इसलिए नहीं है कि बीजेपी के जीत के फासले ने सभी को हैरान कर दिया है. सिर्फ इसलिए नहीं की पहली बार कोई गैर कांग्रेस सरकार दोबारा पूर्ण बहुमत से चुनकर आयी है, बल्कि इसलिए भी कि इस चुनाव के परिणाम हमारे लोकतंत्र के दूरगामी भविष्य को तय करेंगे.
 
एक बात तो साफ है - इस चुनाव में भाजपा से भी ज्यादा नरेंद्र मोदी को स्पष्ट जनादेश मिला है. बेशक इस चुनाव में काफी ऊंच-नीच हुई, बेशक चुनाव आयोग अंपायर की जगह खिलाड़ी बन गया, लेकिन बीजेपी की जीत के लिए ऐसे किसी बहाने का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता. सच यह है कि मोदी जीते हैं, क्योंकि देश की जनता उन्हें एक और मौका देना चाहती थी. ना इस जनादेश के सबक से मुंह चुराना चाहिए, ना ही इसके खतरों से.
 
पहला सबक विपक्ष के लिए है. सवाल यह है की जनता मोदीजी को दोबारा मौका देना क्यों चाहती थी? विजय के फासले से ऐसा भ्रम हो सकता है कि यह मोदी सरकार के पांच साल के रिकॉर्ड पर स्वीकृति की मुहर है. मगर यह सच नहीं है. वर्ष 2014 और 2019 की जीत एक समान प्रतीत हो सकती है, लेकिन दोनों के चरित्र में बहुत फर्क है.
 
साल 2014 में जनता के मन में एक ओर कांग्रेस की भ्रष्ट और नकारा सरकार के प्रति आक्रोश था, तो दूसरी ओर बीजेपी और नरेंद्र मोदी के प्रति आशा थी. इस बार मोदी सरकार से मोहभंग शुरू हुआ था, संदेह थे, आशंका भी थी. लेकिन जब वोटर विपक्ष की तरफ देखता था तो उसे कोई उम्मीद नजर नहीं आती थी. अंततः मोदी के प्रति असंतोष दब गया और विपक्ष के प्रति अविश्वास भारी पड़ा. यह जनादेश जितना मोदीजी के लिए है उतना ही विपक्ष के निकम्मेपन के खिलाफ भी है.
 
दूसरा सबक यह कि चुनाव जीतने के पुराने दांव पेच अब बेमानी हो गये हैं. केवल मोदी विरोध की राजनीति जनता को स्वीकार नहीं है. इस से नरेंद्र मोदी की बजाय मोदी विरोधियों को ज्यादा नुकसान होता है. उधर उत्तर प्रदेश का चुनावी नतीजे इस बात का जीता जागता प्रमाण है कि जनता का विश्वास जातीय समीकरण बैठाकर नहीं जीता जा सकता. 
 
सिर्फ दलित, मुस्लिम और यादव के समीकरण की बात करने से इन जातियों का वोट भी नहीं मिलता. पार्टियों के गठबंधन उपयोगी है, शायद जरूरी भी हैं, लेकिन सिर्फ गठबंधन कर लेना काफी नहीं. कर्नाटक में कांग्रेस और जद सेकुलर का गठबंधन कागज पर मजबूत था, महाराष्ट्र का गठबंधन पुख्ता था, बिहार और झारखंड के गठबंधन भी बहुत बड़े थे, लेकिन सब ने मुंह की खायी.  
 
तीसरा सबक यह है कि जनादेश का निर्माण करने के लिए जनता को देश से जोड़ना जरूरी है. मोदी जी ने देश के औसत नागरिक के साथ संवाद बनाया. बेशक उस संवाद में झूठ की बहुतायत थी. बेशक उस संवाद में सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक बातें थी. इस बार उनके संवाद में आशा से ज्यादा आशंका जगाने की कोशिश थी, फूट डालो और राज करो की रणनीति भी थी. 
 
बेशक प्रधानमंत्री ने चुनाव के दौरान बहुत कुछ ऐसा कहा जो प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप नहीं था. बेशक देश का अधिकांश मीडिया मोदी जी के सामने बिछा हुआ था. लेकिन इस सबके सहारे मोदी जी ने एक औसत वोटर को यह एहसास दिलाया कि वह अपने नफे-नुकसान के लिए नहीं, देश के लिए वोट डाल रहा है. विपक्ष के पास एक औसत वोटर के लिए न ऐसा कोई बड़ा संदेश था, न कोई बड़ा सपना था, और न ही कोई आशा थी.
 
चौथा बड़ा सबक यह कि जनता इस आशा का एक सगुण चेहरा देखना चाहती है. एक ऐसा नेता चाहती है जिस पर वह भरोसा कर सके. अगर जनता ने नरेंद्र मोदी को ऐसे चेहरे के रूप में स्वीकार किया तो इसलिए नहीं कि उनकी हर कारगुजारी जनता को अच्छी लगी. सच यह है कि नरेंद्र मोदी से मोहभंग की शुरुआत हो चुकी थी. लेकिन उनके विकल्प के रूप में कोई भरोसेमंद चेहरा नहीं था. 
 
मोदी से निराश जनता जब राहुल गांधी की ओर देखती थी, तो घबरा कर फिर मोदी में गुण ढूंढने लगती थी. उनमें सच्चाई नहीं तो कम-से-कम एक मजबूती देखती थी. विपक्ष के पास ना तो संदेश था, ना ही संदेश वाहक. आप चाहें ना चाहें, दुनियाभर के लोकतंत्र अब सीधे सीधे व्यक्तित्वों का मुकाबला होते जा रहे हैं. और आज देश को एक भरोसेमंद चेहरे की तलाश है. इस जनादेश के सबक के साथ इसके खतरे भी समझने की जरूरत है. ऐसा जनादेश अहंकार पैदा करता है. हिंदू-0 मुस्लिम द्वेष पैदा कर जीता गया चुनाव डर भी पैदा करता है.
 
 आगामी पांच साल में देश के स्वधर्म के दो बड़े स्तंभ यानी लोकतंत्र और विविधता पर खतरा है. सवाल है कि इन खतरों का मुकाबला कौन करेगा? स्थापित विपक्ष इसका मुकाबला करने में पूरी तरह नकारा साबित हुआ है. देश की प्रमुख राष्ट्रीय विपक्षी दल के रूप में कांग्रेस तो इस काम के लिए अप्रासंगिक ही नहीं, इस काम में रोड़ा साबित हुई है. 
 
ऐसे में देश के स्वधर्म की रक्षा के लिए एक नये विकल्प की जरूरत है. ऐसे विकल्प का रास्ता आसान नहीं होगा. उसे सत्ता, पूंजी और मीडिया तीनों से लड़ना पड़ेगा. लेकिन देश के स्वधर्म की रक्षा में जुटे सिपाहियों के साथ इस देश की मिट्टी है, देश का संविधान है, राष्ट्रपिता गांधीजी की विरासत है.
 

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