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  • May 16 2019 1:58AM

बैलेट के दौर में था बुलेट का जोर

सुशील कुमार मोदी
उपमुख्यमंत्री, बिहार
delhi@prabhatkhabar.in
 
विपक्ष को जब-जब चुनाव हारने की आशंका होती है, तो वह ईवीएम पर संदेह करके बैलेट से चुनाव कराने की मांग करने लगता है. ऐसे लोग पुराने दिनों की ओर लौट कर बुझ चुकी चुनावी हिंसा की आग सुलगाने और बूथ लूट के दौर को फिर वापस लाना चाहते हैं. ईवीएम से चुनाव के कारण ही आज गरीब और कमजोर तबके के लोग भी लाईन में लग कर मतदान कर रहे हैं. 
 
इससे जहां मतदान का प्रतिशत बढ़ा है, वहीं मतगणना की प्रक्रिया और चुनाव परिणाम की घोषणा भी आसान हुई है. बैलेट से मतदान की मांग करनेवालों को पिछले महीने इंडोनेशिया में हुए चुनाव की जटिलता और मतगणना के दौरान हाथ से मतपत्रों की गिनती की वजह से थकान के कारण 272 कर्मियों की मौत और ओवरटाइम करने से 1,878 कर्मियों के बीमार पड़ने की परिघटना याद करनी चाहिए. 
 
नहीं भूलना चाहिए कि बैलेट के दौर में बिहार जैसे राज्य में बुलेट का जोर था. तब हिंसा, बूथ कैप्चरिंग, बैलेट बॉक्स की लूट, मार-पीट, दबंगई, गरीब-कमजोर वर्ग के लोगों को वोट देने से रोकना, नक्सलियों के कहर आदि की वजह से चुनाव किसी युद्ध से कम नहीं था. 
 
देश में सर्वाधिक पुनर्मतदान व चुनावों के रद्द होने का रिकाॅर्ड भी तब बिहार के नाम था. प्रशासन दबंगों, बाहुबलियों के आगे लाचार रहता था. हथियारों के बल पर खुलेआम मतदाताओं में दहशत पैदा करने तथा पोलिंग एजेंट को बूथ पैकेट के साथ कारतूस भेजने, अपराधियों व हथियारों का जखीरा जमा करने का खास चलन था. 
 
करीब डेढ़ दशक तक बिहार का चुनाव बूथ लूट और हिंसा का पर्याय रहा है. साल 1990 में हुए विधानसभा के चुनाव में 87 लोग मारे गये. वहीं 1995 में विधानसभा के चुनाव में 54 मौतें हुईं तथा 163 लोग घायल हुए. विधानसभा चुनाव 2000 में कुल 61 व्यक्ति मारे गये. 
 
बूथ लूट रोकने व उपद्रवी तत्वों से निबटने के लिए पुलिस ने 39 स्थानों पर गोलियां चलायीं, जिसमें 15 व्यक्ति मारे गये. बिहार सरकार के करीब दो दर्जन मंत्रियों को बूथ पर कब्जा करने के आरोप में थाने पर रोका गया और कई के खिलाफ मामले भी दर्ज किये गये.
 
बिहार में 2001 में 23 वर्षों बाद छह चरणों में हुए पंचायत चुनाव में 196 लोग मारे गये थे. इनमें 73 लोगों की हत्या की गयी थी. मारे गये लोगों में 40 विभिन्न पदों के प्रत्याशी थे. पंद्रह लोग पुलिस फायरिंग में मारे गये, तो 56 लोग आपसी रंजिश, गुटबंदी व टकराव में मारे गये. तीन बम विस्फोट में मारे गये, तो 46 अन्य घटनाओं में. साल 1990 से लेकर 2004 तक देश में सर्वाधिक पुनर्मतदान और चुनाव रद्द होने का रिकाॅर्ड बिहार के नाम रहा. 
 
बड़े पैमाने पर बूथ कब्जे की पुष्टि के बाद चुनाव आयोग ने 1991 में पटना और पूर्णिया लोकसभा क्षेत्र का चुनाव रद्द कर दिया था. बिहार में 1990 के विधानसभा चुनाव के दौरान 1,239, 1995 में 1,668 और 2000 में 1,420 मतदान केंद्रों पर बूथ लूट, हिंसा और फर्जी मतदान की वजह से पुनर्मतदान कराये गये थे. 
 
ईवीएम के प्रयोग से बूथ लूट, फर्जी व बोगस मतदान पर रोक लगी. ईवीएम के जरिये मतगणना का काम तेजी से संपन्न होता है और एक लोकसभा सीट के लिए डाले गये मतों को महज तीन से पांच घंटों में गिना जा सकता है, जबकि बैलेट पेपर के दौर में इसी काम को करने में 40 से 72 घंटों का समय लगता था
 
. बैलेट पेपर से मतदान के बाद एक जटिल प्रक्रिया के तहत सभी मतपत्रों को एक बड़े बक्से में रखकर मिक्सिंग करना, फिर छटाई और बंडल बनाने के बाद उसकी गिनती शुरू होती थी. बैलेट पेपर पर लगी मुहर को लेकर आमतौर पर मतगणना कर्मियों और पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच तू-तू, मैं-मैं होती थी.
 
 बैलेट पेपर को अमान्य करने को लेकर भी अक्सर मतगणना केंद्रों पर झगड़े की स्थिति पैदा होती थी. कई बार असामान्य या पुनर्गणना की स्थिति में तो 4 से 6 दिन भी लग जाते थे. 
 
साल 2005 में बिहार में नयी सरकार बनने के बाद वहां हुए चुनावों में कानून के राज का असर देखा गया. दबंगों-बाहुबलियों पर नकेल, चुनाव आयोग और राज्य प्रशासन की सख्ती, ईवीएम का उपयोग, मताधिकार को लेकर मतदाताओं की जागरूकता आदि के कारण चुनावी हिंसा, झड़प, बूथ कैप्चरिंग, लूट-पाट, बोगस वोटिंग, मतदाताओं को धमकाने और मतदान से रोकने जैसी घटनाएं गुजरे दिनों की बात हो गयीं. 
 
मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनाव की पवित्रता के लिए जो प्रयास 1991 में शुरू किये थे, उसे चुनाव आयोग के सलाहकार केजे राव ने 2005 में पूरी मुस्तैदी से अमल कराया. 
 
आर्म्स एक्ट का सख्ती से अनुपालन, फास्ट ट्रैक कोर्ट, स्पीडी ट्रायल और पुलिसिंग की नयी व्यवस्था अपराधियों के मनोबल को तोड़ने में कारगर रही है. बड़ी संख्या में कोर्ट के फैसलों के द्वारा अपराधियों को जेल में भेजा गया. अपराध की घटनाओं में लगातार गिरावट आयी. इसका असर चुनाव पर भी पड़ा. 
 
इन सबका परिणाम रहा कि चुनावी हिंसा में मरनेवालों की संख्या 2009 में घटकर नौ हो गयी. साल 2014 के लोकसभा चुनाव में हिंसा की घटना में सिर्फ चार तथा 2015 के विधानसभा चुनाव में केवल एक व्यक्ति की मौत हुई. चुनावी हिंसा की घटनाएं जहां लगतार कम होती गयीं, वहीं पुनर्मतदान भी यदा-कदा कराने की नौबत आयी. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में अब तक शांतिपूर्ण मतदान की ही खबर है.

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