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  • Apr 23 2019 8:36AM

स्वास्थ्य सेवा तंत्र बने मजबूत

जगदीश रत्तनानी
वरिष्ठ पत्रकार
editor@thebillionpress.org
 
करीब दो साल पहले बेहद सम्मानित चिकित्सक स्टैनफोर्ड विवि के डॉ जॉन पीए ऑयोनिदिस ने एक लेख में लिखा था कि बाजार के दबाव में चिकित्सालयों को वित्त-आधारित बना दिया गया है. कई जगहों पर चिकित्सा और स्वास्थ्य सेवा द्वारा सामाजिक संसाधनों को नष्ट किया जा रहा है और ये मनुष्य की भलाई के लिए खतरा बनते जा रहे हैं. विज्ञान को नकारने की प्रवृत्ति और नीम-हकीमों की संख्या भी बढ़ रही है. 
 
हमने ऐसे डॉक्टरों को समर्थन दिया है, जो बुनियादी रूप से अधिक पैसा सोखनेवाले प्रबंधक हैं. हैदराबाद के एलवी प्रसाद आई इंस्टीट्यूट के उपाध्यक्ष डॉ जी चंद्रशेखर कहते हैं कि मैं जब भी इस आलेख को पढ़ता हूं, बेहद दुखी होता हूं. कुछ दिन पहले आईआईएम, उदयपुर में एक गोष्ठी में डॉ जी चंद्रशेखर डॉ ऑयोनिदिस की उक्त बात को उद्धृत कर रहे थे, जो विकसित देशों के कई हिस्सों में स्वास्थ्य सेवा की बदहाली बताती है.   
 
हमारे देश में स्वास्थ्य का बुनियादी ढांचा कमजोर है, रोगियों के पास भुगतान की क्षमता सीमित है और नीम-हकीमों और स्वयंभू डॉक्टरों की भरमार है.
 
इसलिए स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में संकट बढ़ता जा रहा है और एक बहुत खराब स्थिति पैदा होने की आशंका बढ़ रही है- मसलन उपचार का खर्च बढ़ना, भरोसा कम होना, मरीजों के अधिकारों की कमतर समझ, शोषण और बीमारियों का बोझ बढ़ना. देश को एक तरफ दवाओं को बेअसर करनेवाले तपेदिक (टीबी) की बढ़त तथा पोषण और स्वच्छता की समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, तो दूसरी ओर आलीशान अस्पताल तेजी से फल-फूल रहे हैं. डॉ चंद्रशेखर कहते हैं, अति विशेषज्ञता (सुपर स्पेशलिटी) जैसी कोई चीज नहीं होती है, कोई भी डॉक्टर अधिक-से-अधिक उप-विशेषज्ञता (सब-स्पेशलिटी) का दावा ही कर सकता है, यानी एक छोटे हिस्से की विशेषज्ञता.   
 
मुंबई में कुछ 'सुपर स्पेशलिटी' अस्पताल हैं, जहां शुक्रवार को मरीज को कहा जा सकता है कि शनिवार या रविवार को उसकी कोई जांच होनी है. फिर उससे सप्ताहांत का हवाला देकर दोगुना या उससे भी अधिक पैसा वसूला जाता है. अस्पतालों द्वारा तय लक्ष्य को डॉक्टरों को पूरा करना होता है, जांच करनेवाले रेफर करने के एवज में डॉक्टरों को हिस्सा देते हैं. मनमानी फीस भी ली जाती है. इसलिए रोगी या उसके परिजन डॉक्टरों के बजाय नीम-हकीमों के पास जाना पसंद करते हैं.  
 
इस खेल में स्वास्थ्य बीमा कारोबार बढ़ता जा रहा है, बीमा दावों का अनुपात (वसूली गयी बीमा प्रीमियम की राशि और दावे में भुगतान हुई राशि का) घटता जा रहा है, कारोबार की प्रतिस्पर्द्धा के कारण एजेंटों के कमीशन में बढ़ोतरी हो रही है तथा सेवा की गुणवत्ता भी कमतर होती जा रही है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक फाइनेंस एंड पॉलिसी के एक अध्ययन के मुताबिक, समान कानूनी प्रावधानों के क्षेत्रों- कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका के कैलिफोर्निया- की तुलना में बीमा कंपनियों के खिलाफ शिकायतों की दर भारत में सर्वाधिक है. निजी क्षेत्र की बीमा कंपनियों के दावों के अनुपात में कमी आ रही है. साल 2013-14 में यह 67 फीसदी थी, जो 2015-16 में 58 फीसदी पर आ गयी थी. वर्ष 2017-18 में इसमें बढ़त हुई और यह आंकड़ा 62 फीसदी पहुंचा. ये आंकड़े बता रहे हैं कि प्रीमियम अधिक हैं और दावों का निपटारा समुचित तरीके से नहीं हो रहा है. 
 
लेकिन सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में दावों का अनुपात 100 फीसदी से भी अधिक है, जिससे इंगित होता है कि यह अधिक समय तक चल नहीं सकता, क्योंकि वे प्रीमियम कम वसूल रही हैं और दावों में भुगतान ज्यादा कर रही हैं.    
 
नेशनल इंस्टीट्यूट के अध्ययनकर्ताओं- शेफाली मल्होत्रा, इला पटनायक, शुभो रॉय और अजय शाह ने पिछले साल इन बातों को रेखांकित किया था कि बीमा नहीं लेनेवाले परिवारों से बीमाधारक परिवारों की स्थिति अधिक खराब हो सकती है.
 
यह गंभीर दोषारोपण है और स्वास्थ्य सेवा- जहां मरीज लुटेरे डॉक्टरों और चूसनेवाली बीमा कंपनियों के बीच फंसे हुए हैं- की दिशा को लेकर ठोस बुनियादी मंथन की मांग करता है. कहा जाता है कि बीमा रखना बेमतलब जांचों वगैरह की मुश्किल को निमंत्रण देना है, क्योंकि अस्पताल ज्यादा खर्च दिखाना चाहते हैं. मामूली बीमारी में भी हजारों रुपये खर्च होना सामान्य बात है. स्थिति यह है कि जिन्हें रोगों से छुटकारा दिलाना था, अब उन्हीं से लोग नफरत करने लगे हैं. 
 
धोखा खाने की शिकायतें बेशुमार हैं. और, हमारा तंत्र इसका जवाब आईआईएम, उदयपुर की गोष्ठी के रूप में देने की कोशिश कर रहा है. इसे समुचित स्वास्थ्य सेवा पहुंच समूह कहा जाता है, जिसमें प्रबंधन विशेषज्ञ, चिकित्सक और संस्थान एक साथ मिलकर चिकित्सकीय पेशे को पैसा बनानेवालों के चंगुल से छुड़ाना चाहते हैं. 
 
ऐसा कैसे किया जाये, इसको लेकर अनेक नवोन्मेषी मॉडल हैं, पर इन पर मेडिकल संस्थानों में विचार नहीं किया जाता है. दिलचस्प है कि नीति शास्त्र किसी मेडिकल कॉलेज के पाठ्यक्रम में नहीं है. ऐसे में छात्रों के कमाई के चक्कर में पड़ने की आशंका बढ़ जाती है. 
 
अफसोसनाक है कि ज्यादातर अस्पतालों में भी नैतिक व्यवहार का प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है, गलती को उजागर करने की नीतियां नहीं हैं और मरीजों के अधिकार की दिशा में भी कुछ नहीं होता है. जब तक इस पेशे के भीतर से आवाजें नहीं उठेंगी तथा विभिन्न मसलों पर धारदार राजनीतिक बहसें नहीं होंगी, तब तक वर्तमान स्थिति में बदलाव की संभावना नहीं है.
 

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