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  • Apr 15 2019 5:36AM

गोवा में हिंदू स्मृति का जागरण

तरुण विजय
वरिष्ठ भाजपा नेता
tarunvijay55555@gmail.com
 
गोवा में गुड़ीपाड़वा उत्सव अर्थात नूतन विक्रमी संवत् 2076 का आरंभ एक विशाल समारोह से हुआ. हजारों लोग सुबह चार बजे उठे. हिंदू स्त्रियों ने मंदिर जानेवाले विशेष परिधान पहने, थालियों में दीपक सजाये, तो सौ से अधिक युवतियों ने केसरिया पगड़ियां और अश्वारोही की तरह कसी हुई साड़ियां पहन कर सौ मोटरसाइकिलों पर भगवा ध्वज के साथ सवारी संभाली. 
 
युवकों ने भगवा ध्वज के साथ नगर संकीर्तन और जय भवानी, जय शिवाजी तथा भारत माता की जय के नारे लगाये. मैं इस समारोह के मुख्य अतिथि के नाते आमंत्रित था. 
 
देर तक सोनेवाले अलसाई सुबहों के लिए प्रसिद्ध गोवा में सूर्योदय से पूर्व नगर के प्रमुख देवालय श्री रुद्र मंदिर में पूजन-अर्चन और उसके बाद नगर से शोभा यात्रा निकालते हुए एक मैदान मेें एकत्र हुए, जहां भव्य मंच पर भारत माता के चित्र के साथ आर्यभट्ट और भारत की उपग्रह शक्ति के नवीनतम चित्र अंकित थे. 
 
क्या यह गोवा वहीं गोवा था, जिसके बारे में आमतौर पर लोग बस यूं ही कह देते हैं- ओ हो! गोवा यानी पूर्व का रोम? जहां सेंट जेवियर का बेसिलिका है और पश्चिमी धुनों पर थिरकते गायकों का कार्निवाल होता है? 
 
गोवा के बारे में यही आम धारणा आज भी देखने को मिलती है कि इस छोटे से प्रदेश में पुर्तगाली असर वाली ईसाई संस्कृति की ही मुख्यधारा है, जबकि सत्य यह है कि 450 वर्ष लगातार पुर्तगालियों के बर्बर और अमानुषिक हिंदू विरोधी राज को झेलने के बाद भी हिंदुओं ने अपने धर्म को बचाये रखा और आज वहां पैंसठ प्रतिशत हिंदू विद्यमान हैं. हिंदुओं ने अपनी धर्मरक्षा के लिए सिर कटाये, इंक्वीजिशन की सता-सता कर चमड़ी गला कर धीमी आंच पर तपा कर दी जानेवाली मृत्यु स्वीकार की, सागर तट से अपने मंदिर भीतर के सुरक्षित जंगलों में ले गये, पर धर्म की अग्नि को खत्म नहीं होने दिया. हिंदुओं के मंदिर तोड़े गये, उन पर चर्च बनाये गये. हिंदुओं ने वह सब देखा और भोगा. 
 
गोवा के अधिकांश ईसाई ब्राह्मण हिंदुओं से ही धर्मांतरित बताये जाते हैं, लेकिन गोवा की मानसिकता ऐसी बना दी गयी, मानो गोवा में पुर्तगालियों का 450 साल का शासन उदार और प्रजा वत्सल था. किसी भी पाठ्यक्रम में आज तक हिंदुओं पर अत्याचार का विषय पढ़ाया ही नहीं गया. 
 
हिंदुओं की पहली विशेषता स्मृतिलोप होती है. गोवा भी उससे अछूता नहीं रहा. इस स्थिति को तोड़ा और बदला पणजी से कुछ दूर म्हापसा नगर के हिंदू कार्यकर्ताओं ने. उन्होंने गुड़ीपाड़वा को सार्वजनिक उत्सव का रूप दे दिया, जैसे कभी लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने गणेश चतुर्थी को दिया था. कुछ वर्षों में यह आयोजन म्हापसा नगर का सर्वप्रमुख एवं अत्यंत लोकप्रिय कार्यक्रम बन गया और अन्य नगरों में भी फैलने लगा. 
 
यह केवल एक नये वर्ष का कार्यक्रम नहीं, जिसमें रंगारंग सांस्कृतिक छटा बिखरती हो. यह हिंदू वीरता, विजय तथा उन बलिदानी महापुरुषों के स्मरण का भी दिन बना, जिनके शौर्य, तप और बलिदान से हिंदू आज इस स्थिति तक पहुंचे कि उन्हें अपने मंदिर छुपा कर जंगलों में बनाने की जरूरत नहीं पड़ती और न ही अब हिंदुओं पर कोई अत्याचार करने का साहस तक कर सकता है. 
 
संघ के स्वयंसेवक गिरीश बरणे और संजीव वालावरकर जैसे सैकड़ों कार्यकर्ता एक टीम के नाते जुटे. महत्वपूर्ण बात थी कि इस प्रकार के आयोजन का सार्वजनिक श्रीगणेश हुआ. 
 
इस आयोजन में छत्रपति शिवाजी का हिंदवी साम्राज्य, अफजल खां जैसे असुरों का वध, औरंगजेब के हाथों गुरु गोविंद सिंह के वीर साहिबजादों का बलिदान और गोवा में 450 वर्ष तक पुर्तगालियों द्वारा किये गये अत्याचार तथा उनके समक्ष हिंदू दृढ़ता एवं वीरता के प्रेरक उदाहरण आदि का स्मरण किया जाता है. 
 
जो बातें नयी पीढ़ी के मानस से धीरे-धीरे लुप्त हो रही थीं तथा हिंदुओं की नयी पीढ़ी केवल विदेशियों के प्रति ही कृतज्ञ भाव से खड़ी दिखने लगी थीं, उन्हें अपने उन पुरखों से परिचित कराने का यह अनुष्ठान देश का एक प्रतिष्ठित और प्रेरक समारोह बना है, जो स्मृति जागरण कराता है. स्मृति के बिना मनुष्य, समाज और राष्ट्र तीनों मृत हो जाते हैं. 
 
विदेशी आक्रांता सबसे पहले अपनी शासित प्रजा की स्मृति मिटाने अथवा उसे भ्रमित करने का प्रयास करता है, ताकि उसके राज्य का काला पक्ष धीरे-धीरे भुला दिया जाए. म्हापसा की गुड़ीपाड़वा आयोजन समिति ने विदेशी औपनिवेशिक शत्रुओं के षड्यंत्र को विफल करने का स्मृति जागरण अभियान आरंभ किया. विश्व के महानतम देश अपने विद्यालयों में देश के सैनिक तथा स्मृति के प्रहरी निर्मित करते हैं. 
 
स्वतंत्र भारत में स्मृति का विलोप करनेवाले लोग तो आये, जिन्होंने विभिन्न सत्ताधिष्ठान संभाले, लेकिन बाल्यकाल से किसी भी विद्यालय में ऐसे पाठ्यक्रम नहीं प्रारंभ किये गये, जिनमें भारत राष्ट्र में जन्मे धर्मों के विरुद्ध विदेशी आक्रमणकारियों और उसका हिंदू वीरों द्वारा किये गये गौरवशाली प्रतिरोध का जिक्र तक हो. 
 
गोवा में गुड़ीपाड़वा के माध्यम से स्मृति जागरण का पर्व वास्तव में देश के हर गांव, गली-कूचे के धार्मिक-सांस्कृतिक संगठनों द्वारा अपनाया जाना चाहिए. 
 

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