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  • Mar 15 2019 5:08AM
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आतंकवाद और चीन का वीटो

अविनाश गोडबोले
असिस्टेंट प्रोफेसर, जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी 
avingodb@gmail.com
 
यह बिल्कुल अपेक्षित ही था, एक बार फिर से चीन ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् (यूएनएससी) के प्रस्ताव 1267 के तहत मसूद अजहर को प्रतिबंधित सूची में डालने पर वीटो लगा दिया है. हाल के दिनों में ‘तकनीकी रोक’ लगानेवाला यह चीन का चौथा वीटो है. अपने इस कदम से चीन ने भारत को यह बता दिया है कि आतंकवाद भारत की अपनी राष्ट्रीय समस्या है.
 
साथ ही उसने यह भी जता दिया है कि ‘वैश्विक आतंकवाद’ और उसकी दक्षिण एशिया नीतियों में अंतर बरकरार है. यहां तक कि 41 जानें लेनेवाला आतंकी हमला भी चीन के नजरिये में कोई परिवर्तन नहीं ला पाया. भारतीय चिंताओं को लेकर उसके दृष्टिकोण में कोई बदलाव नहीं आया है.
 
इससे यह संदेश स्पष्ट है कि पाकिस्तान के साथ चीनी संबंध समुद्र से गहरा और शहद से भी मीठा है. यहां तक कि उभरती जिम्मेदार शक्ति के तौर पर प्रतिष्ठा से ज्यादा उसके लिए राष्ट्रीय हित अधिक मायने रखते हैं. कुल मिलाकर चीन एक स्वार्थी उभरती शक्ति रूप में अपनी पहचान बना चुका है.
 
लंबे समय से भारत इस बात को जानता है कि वैश्विक आतंकवाद जैसी कोई चीज है ही नहीं. अमेरिका ने 9/11 के बाद अपने दोस्तों और दुश्मनों के बीच लाइन खींचने के लिए इस मुहावरे को गढ़ा था. एक बड़े व विकासशील देश के तौर पर भारत को एक पक्ष लेना था. हालांकि, वैश्विक आतंक पर हमले के नाम पर जब अमेरिका अपने वास्तविक और काल्पनिक दुश्मनों पर अफगानिस्तान और फिर इराक में कहर बरपा रहा था, तब भारत उसके समर्थन में खड़ा था. 
 
इसी दौरान अमेरिका ने सबसे महत्वपूर्ण गैर-नाटो सहयोगी के तौर पर पाकिस्तान की खोज की थी. अपनी राज्य-प्रायोजित आतंकवाद की नीतियों से पाकिस्तान जब भारत में आतंकवाद को जारी रखे हुए था, तब अमेरिका उसे नजरअंदाज करता रहा. इस दौरान पाकिस्तान नकदी व सामान के रूप में सहायता प्राप्त करता रहा. आप देख सकते हैं कि पिछले दिनों भारत के खिलाफ हवाई हमले में पाकिस्तान ने अमेरिकी एफ-16 विमान का इस्तेमाल भी किया.
 
इस बार चीन है और आर्थिक मदद के रूप में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) प्रोजेक्ट है. यह चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) की प्रमुख परियोजना है. चीन का 62 बिलियन डॉलर का वादा पाकिस्तान के आर्थिक भविष्य को नहीं बदल सकता, लेकिन यह उसके स्व-उद्देश्य के लिए एक बड़ी वजह है. 
 
सीपीईसी पाकिस्तान की उस क्षमता का उदाहरण है, जिसके माध्यम से वह ग्राहक राज्य (क्लाइंट स्टेट) बनकर महान या प्रमुख शक्ति के हितों की पूर्ति कर रहा है. चीन के लिए सीपीईसी वह नब्ज है, जिसके माध्यम से वह न सिर्फ पाकिस्तान, बल्कि अफगानिस्तान, हिंद महासागर, ईरान और खुद के झिंजियांग प्रांत में अपने हितों को एक साथ साध रहा है. जाहिर है, चीन एक साथ अपने कई हितों को साधनेवाले देश का साथ आखिर क्यों छोड़ेगा? 
 
भारत किस चीज की पेशकश कर सकता है, जो पाकिस्तान की भूमिका के मुकाबले चीन को ज्यादा आकर्षक लगे, यह भी एक महत्वपूर्ण प्रश्न है. दिल्ली में कई लोग ऐसा मानते हैं कि संयुक्त राष्ट्र की वित्तीय कार्रवाई कार्यबल (एफएटीएफ) में उपाध्यक्ष पद के लिए भारत द्वारा चीन का समर्थन उसकी सोच में बदलाव ला सकता है. हालांकि, स्पष्ट तौर पर यह मुद्दा नहीं है. 
 
चीन को भारत से जिस सौदे की आस है, वह संभवत: यह है कि भारत बीआरआई में शामिल होने का इरादा कर ले. यद्यपि, कई आधारों पर बीआरआई के विरोध में ध्वजवाहक की अपनी स्थिति के बारे में भारत को गहराई से पता है, जो श्रीलंका, मलेशिया, युगांडा और एशिया और अफ्रीका के अन्य देशों की स्थिति को देखते हुए बारंबार सही प्रतीत होता है. एेसे में इस आधार पर किसी वादे की उम्मीद करना बेकार है.
गौरतलब है कि चीन के झिंजियांग प्रांत में बीते पांच वर्षों में आतंकवाद संबंधी ज्यादातर घटनाएं दक्षिणी झिंजियांग में ही घटी हैं, जिसकी सीमा अफगानिस्तान और पाक अधिकृत कश्मीर से लगती है. 
 
चीन जानता है कि पाकिस्तान ही इन आतंकी घटनाओं का स्रोत है, फिर भी वह पाकिस्तान का रक्षा कवच बना हुआ है. यह कहा जाता है कि पाकिस्तान खुद आतंकवाद से परेशान देश है और इसके लिए वह खुद ही जिम्मेदार भी है. अब इस वीटो के बाद इस तरह के दोतरफा आतंकवाद विरोधी अभ्यासों को रोकना ही तर्कसंगत कदम होना चाहिए. अब यह स्पष्ट है कि भारत और चीन में द्विपक्षीय संबंध सामान्यत: कमजोर हुए हैं. 
 
अब प्रश्न है कि वर्तमान परिदृश्य में भारत का विकल्प क्या होगा? यहां यथार्थवादी दृष्टिकोण से यह तर्क दिया जा सकता है कि एक बार फिर वीटो करने की चीन की नीति जैश-ए-मोहम्मद के बालाकोट शिविर पर भारत द्वारा किये गये एहतियातन हमले को न्यायोचित ठहराता है. भारतीय दृष्टिकोण से, वैश्विक प्रणाली आज की तारीख में अराजकता का प्रतिनिधित्व करती है. किसी को वैश्विक आतंकवादी घोषित करने या प्रतिबंधित करने की संयुक्त राष्ट्र की प्रक्रिया टूट चुकी है. 
 
यह प्रमुख शक्तियों के हितों की संरक्षक भर है. भारत संयुक्त राष्ट्र से जो अपेक्षा करता है, उसे स्वयं करना होगा. सीमा पार से जिस आतंकवाद की समस्या का वह सामना करता है, उसे खत्म करने के लिए वह जो उपाय कर रहा है, वह सही है, लेकिन इसे लेकर भारत को व्यावहारिक होना होगा. भारत की बदले की प्रतिक्रिया, भारत के लिए उपलब्ध विकल्पों का नतीजा है.
 
दूसरे स्तर पर, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में अपने राष्ट्रीय उद्देश्य हेतु शामिल होने के लिए भारत के अथक प्रयास से भी यह प्रश्न उठता है कि क्या भारत दक्षिण एशिया में चीन की शक्ति को एक महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में मान्यता देता है. अगर ऐसा है, तो इसे आगे बीजिंग के साथ कूटनीतिक उपायों के जरिये अपने तरीके से काम करना होगा. 
 
वहीं दूसरी ओर, अगर भारत का इरादा केवल इस आधार पर चीन को घेरना है कि वह ‘एक जिम्मेदार उभरती शक्ति’ की तरह व्यवहार नहीं कर रहा है, तो वह भी पर्याप्त नहीं है. चीन कभी भी पाकिस्तान के सामने असहज नहीं होने जा रहा है. भारत को अराजकता को पहचानने और खुद के बूते अपने राष्ट्रीय हित को आगे बढ़ाने की जरूरत है. 
 

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