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  • Mar 4 2019 7:08AM

क्या हों आम चुनाव के मुद्दे

योगेंद्र यादव
अध्यक्ष, स्वराज इंडिया
yyopinion@gmail.com
 
पुलवामा हमले के अगले ही दिन मैंने राष्ट्रीय सहमति का एक प्रस्ताव रखा था. सोच यह थी कि आतंकी और उसके सरगना हमें एक-दूसरे से लड़ने-भिड़ने और भारतीय राजनीति को पटरी से उतारने के अपने मंसूबे में कामयाब ना हों. संकट के समय राष्ट्रीय एकता ही आतंकियों को सबसे करारा जवाब है.
 
मेरे प्रस्ताव के तीन सूत्र थे. पहला तो यह कि सरकार विपक्ष को विश्वास में ले. राष्ट्रीय सुरक्षा की गोपनीयता को बनाये रखते हुए घटना और उसके प्रतिकार की सोच को वह विपक्ष के चुनिंदा नेताओं के साथ साझा करे. दूसरा, विपक्ष इस मौके का इस्तेमाल सरकार के छिद्रान्वेषण के लिए न करे और संकट समाप्त होने तक इस मुद्दे पर सरकार की आलोचना न करे. 
 
तीसरा, सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों सहमति बनायें कि वे पुलवामा हमले और उसके प्रतिकार से जुड़े राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले को चुनावी मुद्दा नहीं बनायेंगे. कश्मीरियों के खिलाफ वारदातों के बाद मैंने चौथा सूत्र भी जोड़ा: इस मौके पर देश के किसी भी व्यक्ति या समुदाय को हिंसा या नफरत का शिकार नहीं बनने दिया जायेगा.
 
इस प्रस्ताव को आम लोगों से बहुत समर्थन मिला, लेकिन बड़ी पार्टियों ने इसे आधे मन से सुना. बालाकोट में जवाबी हमले के बाद इस बात पर राष्ट्रीय सहमति की जरूरत और बढ़ गयी. 
 
यह तो स्पष्ट था कि पुलवामा से शुरू हुआ सिलसिला बालाकोट पर नहीं रुकेगा. इमरान खान और पाकिस्तानी सेना दोनों को अपनी इज्जत और सत्ता बचाये रखने के लिए कुछ जवाबी कार्रवाई करनी ही थी. पाकिस्तान सरकार ने दावा किया है कि बालाकोट में जान-माल की हानि नहीं हुई. जाहिर है ऐसे में रोज नये तथ्य आयेंगे और उत्तर-प्रत्युत्तर की चर्चा होगी.
 
इस बार इस मुद्दे के राजनीतीकरण की संभावना और भी ज्यादा है. वैसे तो वायु सेना के हमले के बाद सभी दलों ने सुरक्षाबलों को बधाई दी, कम-से-कम पहले दिन आरोप-प्रत्यारोप शुरू नहीं हुए. लेकिन पहले दिन ही राजस्थान के चूरू में प्रधानमंत्री के भाषण से इस सवाल पर होनेवाली राजनीति की झलक मिल गयी. विपक्ष के नेताओं ने भी आलोचना शुरू कर दी है. आमतौर पर ऐसे में सत्तारूढ़ दल राष्ट्रीय सहमति बनाने की कोशिश करता है, लेकिन भाजपा इस मुद्दे पर सहमति नहीं असहमति चाहेगी, ताकि यह चुनावी बहस का केंद्र बन सके.
कुल मिला कर यह संभावना बन रही है कि 2019 का चुनाव गांव, किसान और खेती या फिर युवा शिक्षा और बेरोजगारी के सवाल पर न होकर राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल पर केंद्रित हो जाये. ऐसा होता है, तो यह हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा और हमारे लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं.राष्ट्रीय सुरक्षा के सवाल का राजनीतीकरण करने के कई खतरे हैं. 
 
एक तो सरकार और सुरक्षाबलों पर अनावश्यक दबाव बनेगा. देश में युद्धोन्माद का माहौल बनेगा. देश के भीतर व्यक्तियों या समुदायों को निशाना बनाने की प्रवृत्ति बढ़ेगी. राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए चुपचाप से दीर्घकालिक कदम उठाने की बजाय शोरगुल करने का आग्रह प्रबल होगा. दूसरी बात यह भी है कि राजनीतिक दल की छींटाकशी से अनावश्यक सवाल उठेंगे. 
 
क्या राष्ट्रीय सुरक्षा के कर्ता-धर्ता लोगों में से कुछ को पुलवामा की दुर्घटना का पूर्वाभास था? क्या उसे टाला नहीं जा सकता था? क्या बालाकोट में आतंकी कैंप को नष्ट करने और आतंकियों को नेस्तनाबूद करने के दावे वाकई सही हैं? ये सब वाजिब प्रश्न हैं, जिन्हें चुनावी दंगल में उछालने से इनका सही उत्तर नहीं मिलेगा, बल्कि सुरक्षा बलों का मनोबल ही कमजोर होगा.
 
लोकसभा के चुनाव को राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर केंद्रित करने से हमारे लोकतंत्र को भी नुकसान होगा. पांच साल के बाद केंद्र सरकार का हिसाब करने और उससे जवाब मांगने का यह अवसर देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं के मूल्यांकन का समय है, यह सेकुलर ढांचे पर हुए असर को जांचने का समय है, यह अंतिम व्यक्ति को किये गये वादे के हिसाब-किताब का समय है. 
 
इस बार यह संभावना बनी थी कि लोकसभा चुनाव खेती, गांव, किसान, शिक्षा और बेरोजगारी जैसे जमीन से जुड़े मुद्दों पर होगा. अगर इन सबको भूल कर सिर्फ पाकिस्तान और आतंकियों के सवाल पर चर्चा होने लगी, तो हमारी लोकतांत्रिक प्रक्रिया पटरी से उतर जायेगी. ऐसा हुआ, तो हमारे लोकतंत्र की भी वही हालत हो जायेगी जो नेपाल, बांग्लादेश या पाकिस्तान की है. 
 
इन देशों में हर बार चुनाव भारत-विरोध के मुद्दे पर लड़ा जाता है और भावनाएं भड़का कर जीता जाता है. अगर हमारा 70 साल पुराना लोकतंत्र भी इसी स्तर पर उतर आता है, तो यह पुलवामा के आतंकी और उनके पाकिस्तानी आकाओं की भारत पर सबसे बड़ी विजय होगी.
 
लोकसभा चुनाव की प्रक्रिया शुरू होने में बस कुछ ही दिन बचे हैं. इसलिए यह बेहद जरूरी है कि सभी दल मिल कर यह न्यूनतम सहमति बनायें कि इस चुनाव में राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न को राजनीतिक दंगल में नहीं घसीटा जायेगा. 
 
अगर पुलवामा और बालाकोट से शुरू हुए घटनाक्रम के बारे में कुछ सवाल हैं, अगर उसमें कुछ ऊंच-नीच हुई है, तो उसे उसकी चुनाव के बाद समीक्षा होगी, लेकिन उसे चुनावी वाद-विवाद से अलग रखा जायेगा. न कोई पार्टी देश की सेना और राष्ट्रीय सुरक्षा पर उंगली उठायेगी, न कोई नेता सुरक्षाबलों के पराक्रम का श्रेय लेगा. राष्ट्रीय सुरक्षा, सैनिक कार्रवाई और जवानों की शहादत पर किसी भी तरह की राजनीति करना देशप्रेम का लक्षण नहीं है. 
 

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