Advertisement

Columns

  • Feb 21 2019 6:10AM

सतर्क-सजग रहे भारत

पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
 
सऊदी युवराज मुहम्मद बिन सलमान की भारत यात्रा को लेकर सरकारी हलकों में बहुत उत्साह देखने को मिला. विदेश मंत्रालय का यह दावा था कि भारत की आपत्ति को ध्यान में रखकर ही यह शाही मेहमान पाकिस्तान से भारत नहीं आये, बल्कि वापस रियाद लौटने के बाद ही उन्होंने दक्षिण एशिया के दौरे का दूसरा कदम उठाया. पर इस बात को कैसे नजरंदाज करें कि इस क्षेत्र के दौरे का आरंभ  पुराने मित्र और सऊदी सहायता समर्थन पर आश्रित पाकिस्तान से हुआ और भारत के बाद सीधे वह चीन गया?
 
सऊदी विदेश मंत्री का बयान भी उल्लेखनीय है. उनका कहना था कि युवराज का प्रयास भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव घटाने का रहेगा. यह समझ पाना कठिन है कि पाकिस्तान के प्रति पारंपरिक पक्षधरता दर्शानेवाला तथा वहां कट्टरपंथी वहाबी इस्लाम के प्रसार में निर्णायक भूमिका निभानेवाला देश यह कैसे कर सकता है? 
 
यह बात रेखांकित की जा रही है कि शाही दौरे के दौरान पांच बड़े महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किये गये, जिनसे यह प्रमाणित होता है कि सऊदी अरब के विश्व दर्शन में बदलाव आ रहा है और वह भारत के साथ दूरदर्शी सामरिक समझौते के लिए तैयार है. हिंद महासागर में नौसैनिक गश्त लगानेवाला समझौता सबसे अहम है. 
 
तेल शोध के क्षेत्र में काम करनेवाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों ने सऊदी प्रतिनिधि मंडल के सदस्यों के साथ उच्च स्तरीय वार्ताएं कीं और यह अपेक्षा की जा रही है कि ईरान पर लगाये अमेरिकी प्रतिबंधों का असर कम करने के लिए सऊदी हमारा साथ होगा. याद दिलाना जरूरी नहीं कि सऊदी अरब से भारत सबसे बड़ी मात्रा में तेल का आयात करता है. निश्चय ही उससे बेरुखी हमारे हित में नहीं है.
 
मगर यहां तत्काल यह जोड़ने की जरूरत है कि तेल की राजनीति ही इस देश के साथ हमारे संबंधों को संवेदनशील नहीं बनाती. मुसलमानों के पवित्र तीर्थ स्थल मक्का और मदीना भी सऊदी अरब में ही स्थित हैं और इनके रखवाले के रूप में वही हज यात्रा का प्रबंधन करता है. 
 
भारत में मुसलमानों की आबादी दुनिया के किसी भी बडे इस्लामी देश की तुलना में कम नहीं है. जनतांत्रिक चुनावी राजनीति के दबाव में किसी भी राजनीतिक दल के लिए सऊदी अरब के साथ दोस्ताना रिश्ते उपयोगी महसूस होते हैं.
 
कुछ और बातों का जिक्र बेहद जरूरी है. जिस समय युवराज मुहम्मद बिन सलमान का अभिषेक हुआ था, यह आशा की जा रही थी कि दकियानूसी से ग्रस्त सऊदी अरब में आधुनिकता तथा उदारवाद की नयी लहर उठ रही है. 
 
युवराज ने शुरू में भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए जो कड़े कदम उठाये, उन्होंने इस धारणा को पुष्ट किया. राजपरिवार से जुड़े अब तक ताकतवर दरबारियों को (शाही) जेल भेजने में उन्होंने देर नहीं लगायी और महिलाओं को ड्राइविंग का अधिकार दे दिया. अपनी प्रजा को इंटरनेट का सुख (सीमित ही सही) भोगने का अवसर निकट भविष्य में देने की पेशकश भी उन्होंने की. सऊदी शाह के साथ उन्होंने रूस का दौरा किया और यह संकेत दिया कि वह अमेरिका की छाया से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे हैं. 
 
सऊदी आचरण में बदलाव का विश्लेषण करनेवाले विशेषज्ञों का मानना है कि इस हृदय परिवर्तन का मुख्य कारण तेल की कीमतों में गिरावट तथा कार्बन प्रसरण को लेकर जीवाश्म ईंधन में कटौती तथा तेल की निरंतर कम होती खपत से जुड़ी आशंकाएं हैं. कभी बेशुमार अमीर समझा जानेवाला यह देश आज अपने भोग-विलासी खर्च में झिझकता दिख रहा है. 
 
बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूरों, पेशेवरों को नये करों के बोझ से वहां रहना दूभर हो रहा है. कई छंटनी के शिकार हो घर लौटने को मजबूर हुए हैं. भारत के लाखों नागरिक सऊदी अरब में बरसों से काम करते आये हैं, इन सबका भविष्य संकटग्रस्त लग रहा है. 
 
सऊदी अरब के सांस्कृतिक तथा सामरिक महत्व को चुनौती देनेवाला नया आक्रामक रूप से कट्टरपंथी संगठन आईएसआईएस यानी बगदादी की नयी खिलाफत भी सीरिया तथा शम्स में सऊदी अरब के लिए सरदर्द पैदा करता रहा है. 
 
इन सब बातों का लुब्बो-लुवाब यह है कि शिखर पर सत्ता परिवर्तन की सुगबुगाहट के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय परिवेश भी सऊदियों के लिए पहले जैसा अनुकूल नहीं रहा. ईरान, लेबनान और रूस के संयुक्त मोर्चे ने निश्चय ही उनके वर्चस्व को चुनौती दी है. दक्षिण एशिया और चीन की तरफ दृष्टिपात की प्रेरणा यही है. 
 
अंत में इस बात को भुलाना असंभव है कि सऊदी मूल के अमेरिकी पत्रकार खशोगी की तुर्की में सऊदी  दूतावास में हत्या के बाद युवराज सलमान विवादों के घेरे में रहे हैं. अमेरिका तथा ब्रिटेन इस बात को कबूल कर चुके हैं कि खशोगी की निर्मम हत्या के अभियुक्त सऊदी युवराज के अंतरंग अनुचरों में थे और इस हत्या की साजिश उन्हें प्रसन्न करने के लिए ही रची गयी थी.
 
यदि यह बात मान भी लें कि इस वारदात को अति उत्साही बेलगाम दरबारियों ने अंजाम दिया, तब भी इस बारे में आश्वस्त होना कठिन है कि निरंकुश राजतंत्र में तुनकमिजाज शासक के व्यक्तिगत फैसलों या उसके विश्वासपात्र अधिकारियों के अवसरवादी उतावले आचरण के क्या अप्रत्याशित परिणाम हो सकते हैं. भारत के लिए सतर्क-सजग रहना ही समझदारी होगी.
 
दुर्भाग्य से इस यात्रा को ग्रहण लगानेवाले पुलवामा के आतंकवादी हमले ने रही-सही कसर पूरी कर दी. भारत सतर्क और सजग रहकर ही तेजी से बदलते परिरप्रेक्ष्य में अपने राष्ट्रहित सुरक्षित रख सकता है. 
 
हमारे लिए यह समझना परमावश्यक है कि सऊदी अरब तथा अमेरिका के सामरिक और आर्थिक रिश्ते आधी सदी से भी अधिक पुराने हैं. इन्हें युवराज सलमान चाहें भी तो पलक झपकते नहीं बदल सकते. वह बदलना चाहेंगे भी क्यों? 
 
उनकी प्राथमिकता अपनी छवि को संवारना-सुधारना है और स्वदेश में अपनी राजनयिक सक्रियता से आलोचकों का मुंह बंद करना है. वैसे राजशाही में जनमत का कोई महत्व होता नहीं, तख्तनशीं शासक ही सर्वशक्तिमान होता है. यह सुझाना तर्कसंगत है कि भारत को ईरान तथा इस्राइल से विमुख करने के लिए ही यह विकल्प सार्वजनिक रूप से विज्ञापित किया जा रहा है. 
 
अफगानिस्तान में असफलता के बाद अमेरिका भी यह स्वीकार करने को बाध्य हुआ है कि तालिबान तबके से संवाद करना होगा. सऊदी-पाकिस्तानी-अमेरिकी-चीनी हितों का सन्निपात भारत के अनुकूल नहीं और आनेवाले समय में भी प्रतिकूल ही रहेगा. 

Advertisement

Comments

Advertisement