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  • Feb 11 2019 7:36AM
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संसद में बसवन्ना, मुक्तिबोध, सर्वेश्वर

रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
ravibhushan1408@gmail.com
 
संसद में समय-समय पर नेता, मंत्री, प्रधानमंत्री, कवियों की काव्य-पंक्तियां पढ़ कर तालियां बटोरते रहे हैं. कविता और कवियों से उनका लगाव नहीं होता, पर यह सिलसिला लंबे समय से चल रहा है. वित्त मंत्री अपने बजट-भाषण में कवियों को याद करते रहे हैं. क्या हम इसे राजनीतिक दलों का कवि-प्रेम या काव्य प्रेम मान लें या यह केवल हल्के-फुल्के अंदाज में उनके द्वारा उद्धृत काव्य-पंक्तियां हैं? 
 
अंतरिम वित्त मंत्री पीयूष गाेयल ने अपने बजट-भाषण में मुक्तिबोध का नाम लिये बगैर उनकी एक कविता 'मुझे कदम-कदम पर' की दो पंक्तियां पढ़ी, वह भी गलत. कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं, 'एक पैर रखता हूं/ कि सौ राहें फूटतीं/ व मैं उन सब पर से गुजरना चाहता हूं.' वित्त मंत्री ने 'पैर' को 'पांव' बना दिया और 'सौ राहें' 'हजार राहें' बन गयीं. भाषण का समापन 'एक पांव रखता हूं, हजार राहें फूट पड़ती हैं' से किया. यह भी कहा, 'हिंदी के बहुत विख्यात कवि थे, बहुत प्रगतिशील माने जाते थे. 
 
हिंदी में कविता करते थे, पर मूलत: महाराष्ट्र से आते थे, जहां से मैं भी आता हूं.' इसके बाद उन्होंने नये भारत के निर्माण के लिए नये सशक्त प्रभावी कदम उठाने की बात कही, जिससे 'आज भारत हर क्षेत्र में दुनिया के स्तर पर अनेक संभावनाओं से भरा देश माना जाता है.' कवि का नामोल्लेख उन्हें आवश्यक नहीं लगा.
 
मुक्तिबोध की पुस्तक 'भारत : इतिहास और संस्कृति' पर कानूनी प्रतिबंध लगाने और जलाने की मांग जबलपुर में 1962 में उठी थी. रायपुर में जनसंघ ने मुक्तिबोध के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया था और कई आरोप लगाये थे. अंग्रेजी साप्ताहिक पत्र 'ऑर्गनाइजर' ने उनके खिलाफ लेख लिखा था और दीनदयाल उपाध्याय ने मुक्तिबोध को 'विकृत मस्तिष्क' का लेखक कहा था.
 
मुक्तिबोध ने उसी समय यह लिखा था, 'दक्षिणपंथी उग्र सांप्रदायिकता या धर्मवाद इतिहास के शास्त्रीय क्षेत्र में जोर आजमाना चाहता है.' आज के खतरों को उसी समय मुक्तिबोध ने पहचान लिया था. उन्होंने 'तीन बड़े खतरों' की बात कही थी- लेखक की निजी लेखकीय स्वतंत्रता, विचार स्वतंत्रता काे खतरा, इतिहास शास्त्र को अशास्त्रीय रचना से खतरा और शास्त्रीय क्षेत्र में, शास्त्रीय क्षेत्र के प्रकाशनों में शासन के हस्तक्षेप से खतरा.' उस समय 1962 में मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी. आज केंद्र में भाजपा की सरकार है. 
 
उस समय मुक्तिबोध ने सांप्रदायिक दल और उग्र दक्षिणपंथियों की पहचान कर ली थी. एक पैर रखने पर मुक्तिबोध के यहां जो सौ राहें फूटती हैं, वे सामान्य नहीं हैं. इसी कविता में वे 'प्रत्येक वाणी में महाकाव्य-पीड़ा' देखते हैं. इस कविता का संभावित रचना-काल नेमिचंद्र जैन ने 1959-60 माना है और यह कविता दिसंबर 1961 की 'लहर' पत्रिका में 'चौराहे' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी.
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अब तक कई बार 12वीं सदी के लिंगायत दार्शनिक, महान कन्नड़ कवि, समाज सुधारक और क्रांतिकारी बसवन्ना को अपने भाषणों में याद किया है. 
 
इस बार उन्होंने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपने धन्यवाद भाषण में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा पढ़े गये बसवन्ना के कुछ वचनों पर यह कहा- 'मैं चाहूंगा कि हर कांग्रेसी घर में बसवन्ना का वचन संजो कर रखें और अभी-अभी जहां सरकार बनाने का आपको मौका मिला है, वहां तो बड़े अक्षरों में लगाकर रखें.' दक्षिण राज्यों में कर्नाटक में ही भाजपा की सरकार रही है. 
 
क्या सचमुच भाजपा बसवन्ना से कुछ सीख पायी? बसवन्ना ब्राह्मण थे, पर वर्ण-व्यवस्था के विरुद्ध थे. उन्होंने सामाजिक भेद-भाव को अस्वीकृत किया, अंधविश्वास और धार्मिक कृत्य, अनुष्ठान की आलोचना की, नयी लोक लोकसंस्थाएं बनायीं. बसवन्ना के नामोल्लेख भर से कोई उनके आदर्शों पर नहीं चल सकता. हम जिसे आचरण की पवित्रता-शुचिता कहते हैं, उससे भारतीय राजनीति का कोई रिश्ता नहीं है. 
 
 प्रधानमंत्री ने बसवन्ना का नाम तो लिया, पर सर्वेश्वरदयाल सक्सेना का नहीं, जिनकी काव्य-पंक्तियां उन्होंने उद्धृत कीं. बारहवीं सदी के बसवन्ना ही नहीं, बीसवीं सदी के मुक्तिबोध और सर्वेश्वर भी आज 'अर्बन नक्सल' बता दिये जाते. खड़गे ने अपने भाषण में सर्वेश्वर की काव्य-पंक्तियां पढ़ी थीं- 'ये हुस्न-ओ-आब तो ठीक है/ लेकिन गुरूर क्यों तुमको इस पर है/ मैंने सूरज को हर शाम इसी/ आसमां में ढलते देखा है.' 
 
एक शब्द 'हुस्न' को उनके सामान्य अर्थ में रखकर नरेंद्र मोदी ने सवाल किया, 'मुझे समझ नहीं आया कि उनको हुस्नवाली पंक्ति क्यों पसंद आयी?' न उन्हें 'गुरूर' शब्द याद रहा और न 'सूरज का ढलना'. कविता का अगला अंश उन्होंने पढ़कर सुनाया, जिसमें झूठ की बस्ती में सच को तड़पते देखने, अपने भीतर बच्चे के सिसकने आदि की बात थी. कविता की पंक्तियां एक-दूसरे से अविच्छिन्न हैं, पर मोदी ने उन्हें एक-दूसरे के विपरीत ला खड़ा किया. 
 
अपने मनोनुकूल पंक्तियां दोहरा दीं और उनका आरंभिक पंक्तियाें से संबंध नहीं माना. अपने भाषण के अंत में पुन: उन्होंने सर्वेश्वर की कविता, 'मैं सूरज को नहीं डूबने दूंगा' की पंक्तियां पढ़ीं, जो कविता की अंतिम पंक्तियां हैं. कवि ने किसी भी सूरज को 'न डूबने देने' की बात कही थी. 
प्रधानमंत्री ने 'सूरज' का अर्थ और संदर्भ बदल दिया, अपने पक्ष और हित में उसे रख दिया. यह कविता का अर्थ है या अनर्थ, इस पर हमारा ध्यान नहीं जाता. नेताओं के मुख से जब काव्य-पंक्तियां निकलती हैं, तो उनकी मंशा कुछ और ही होती है. कविता का मर्म और अर्थ उनकी समझ से परे होता है. 
 

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