Advertisement

Columns

  • Jun 20 2018 6:37AM

आयुष्मान भारत : सतर्कता जरूरी

II डॉ अश्विनी महाजन II 
एसोसिएट प्रोफेसर, डीयू
ashwanimahajan@rediffmail.com  
 
वर्ष 2018-19 के वित्त वर्ष के लिए बजट में जब वित्तमंत्री ने यह घोषणा की कि 10 करोड़ परिवारों यानी 50 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य पर आनेवाले खर्च के लिए पांच लाख रुपये तक के खर्च को सरकार वहन करेगी, तो यह एक सपने जैसा प्रतीत हुआ था. बजट भाषण में वित्तमंत्री ने ‘आयुष्मान भारत’ योजना का जिक्र किया था, जिसके अंतर्गत दो प्रकार की स्वास्थ्य योजनाओं की घोषणा हुई थी. 
 
पहला, देशभर में स्वास्थ्य और आरोग्य केंद्रों की स्थापना और दूसरा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना. हाल ही में केंद्र सरकार ने एक अधिसूचना जारी कर ‘आयुष्मान भारत’ योजना के बारे में बताया है. 
 
लंबे समय से सरकारी अस्पताल और डिस्पेंसरियां बुरी हालत में हैं, क्योंकि राज्य सरकारें और केंद्र सरकार बढ़ती स्वास्थ्य जरूरतों के अनुपात में स्वास्थ्य पर बहुत कम खर्च कर रहीं हैं. कई राज्यों में नये एम्स तो खुले, लेकिन जरूरतों को पूरा करने के लिए वह पर्याप्त नहीं हैं. 
 
सरकारी सुविधाओं के अभाव के कारण निजी क्षेत्र में अस्पतालों व नर्सिंग होम का खासा विस्तार हुआ है. सामान्य इलाज के लिए डॉक्टरों व विशेषज्ञों द्वारा बड़ी संख्या में क्लिनिक खोले जा रहे हैं. यानी भारी कीमत के बदले निजी क्षेत्र में इलाज और जांच सुविधाएं उपलब्ध हैं. 
 
लेकिन, यह इलाज महंगा होता है और यह दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है. 'राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण' की एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2004 और 2014 के बीच ग्रामीण क्षेत्रों में अस्पताल भर्ती का औसत बिल 5,695 रुपये से बढ़ कर 14,855 रुपये पहुंच गया. इसी दौरान शहरी क्षेत्रों में यह 8,851 रुपये से बढ़ कर 24,456 रुपये पहुंच गया.
 
जहां एक ओर 1,354 प्रकार के इलाज के लिए पैकेज की दर ‘आयुष्मान भारत’ योजना के तहत तय कर दी गयी है, तो दूसरी ओर सामाजिक आर्थिक जाति जनगणना, 2011 के आधार पर इस योजना के लाभार्थियों की सूची तैयार करने की घोषणा की गयी है. 
 
इलाज के बढ़ते खर्च के चलते गरीबों की हालत बदतर होती जा रही है. कई सरकारी रिपोर्टों में यह बात कही गयी है कि देश में गरीबी को बढ़ाने में स्वास्थ्य पर खर्च एक बड़ा कारण है. 
 
स्वास्थ्य पर बढ़ते खर्च और सरकारी खर्चे में कटौती के कारण निजी खर्च बढ़ता जा रहा है. स्वास्थ्य पर कुल खर्च जीडीपी के चार प्रतिशत से भी कम है, जबकि सरकार का स्वास्थ्य पर खर्च तो जीडीपी के मात्र 1.3 प्रतिशत से भी कम है. यानी स्वास्थ्य पर लोगों की जेब से खर्च जीडीपी के 2.7 प्रतिशत तक पहुंच चुका है. जरूरत इस बात की है कि गरीब को बढ़ते स्वास्थ्य पर खर्च की त्रासदी से बचाया जा सके.
 
इस योजना में प्रारंभिक तौर पर 10.74 करोड़ परिवारों यानी लगभग 50 करोड़ लोगों को शामिल किया गया है. इसमें सामान्य स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए प्राथमिक स्वास्थ्य एवं आरोग्य केंद्र और गंभीर रोगों के निदान हेतु स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य संरक्षण योजना के तहत 50 करोड़ लोगों के लिए पांच लाख रुपये तक के इलाज का प्रावधान है. 
 
यह एक महत्वाकांक्षी योजना मानी जा रही है. हालांकि, नीति आयोग और अन्य सरकारी थिंक टैंक इस योजना की विस्तृत स्कीम तैयार कर रहे हैं. अभी जिन इलाजों के अधिकतम शुल्क तय किये गये हैं, उससे पता चलता है कि ये शुल्क वर्तमान में अस्पतालों द्वारा लिये जा रहे शुल्कों से कम हैं. 
 
उदाहरण के लिए घुटना बदलने की लागत अच्छे अस्पतालों में 3.5 लाख रुपये है, तो इस सीमा के अनुसार मात्र 80 हजार रुपये ही रहेगी. प्रति परिवार बीमा प्रीमियम राशि तय कर सभी परिवारों का बीमा करवाया जायेगा. यदि दावे प्रीमियम राशि के 120 प्रतिशत से ज्यादा होंगे, तो उसके 50 प्रतिशत के बराबर राज्य सरकारें वहन करेंगी और उससे कम होने पर उन्हें कोई अतिरिक्त राशि नहीं देनी होगी. 
 
इस संबंध में या तो बीमा कंपनियों के माध्यम से कार्य किया जायेगा, अन्यथा राज्य के स्तर पर ट्रस्ट बनाकर इस योजना को कार्यान्वित किया जायेगा. ट्रस्ट में केंद्र सरकार निश्चित राशि देगी और उस ट्रस्ट से दावों का भुगतान किया जा सकेगा. सवाल है कि इस कार्य को किन बीमा कंपनियों द्वारा किया जायेगा और उनके प्रीमियम की राशि क्या होगी? 
 
नीति आयोग द्वारा सुझाये गये प्रति परिवार प्रीमियम राशि 1,082 रुपये को बीमा कंपनियों ने खारिज कर दिया है, जिसे संशोधित किया जा रहा है. देश में दो प्रकार की बीमा कंपनियां काम करती हैं- सरकारी और गैर-सरकारी. गैर-सरकारी कंपनियां अधिकांश बहुराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी से काम करती हैं. 
 
यदि गैर-सरकारी कंपनियों को यह जिम्मेदारी दी जाती है, तो इससे दो प्रकार के खतरे हो सकते हैं. पहला, उनके दावों को निबटाने की दर बहुत कम होती है, जिससे जरूरतमंदों को इस योजना का लाभ नहीं मिल पायेगा. दूसरा, ये कंपनियां बीमा व्यवसाय में अपने जोखिम को कम करने के लिए पुनर्बीमा कंपनियों से सौदा करती हैं. भारत में कोई पुनर्बीमा कंपनी न होने के कारण इस धन के विदेश जाने की आशंका है. 
 
इसलिए स्वाभाविक तौर पर सरकार के लिए यह सही होगा कि वे भारतीय कंपनियों से ही इसका बीमा कराएं. नीति आयोग समेत कई सलाहकार विदेशी कंपनियों से बीमा कराने की वकालत करते हैं. उनका तर्क है कि सरकारी बीमा कंपनियां ज्यादा प्रीमियम लेती हैं. अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सरकार क्या फैसला लेती है.   
 

Advertisement

Comments