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  • Nov 7 2018 7:16AM

कश्मीर में बर्फ और बारिश

कुमार प्रशांत
गांधीवादी विचारक
k.prashantji@gmail.com
 
एक नवंबर, 2018 की सुबह है. श्रीनगर में अचानक ही बारिश हो रही है- ठंडा मौसम ठिठुरने की तरफ मुंह करने लगा है. कोई चिंतित स्वर में बताता है कि मैदान में जब बारिश होती है, तो पहाड़ पर बर्फ गिरती है. सारे रास्ते बंद होने लगते हैं. वे कहती हैं- ‘हम अपने कश्मीर की बारिश अौर अपनी ठंड का स्वागत करने को अधीर हैं. यह समय पर न हो अौर भरपूर न हो, तो हमारा जीवन ही न चले.…’ लेकिन, मेरी अांखों में लिखा यह सवाल पढ़ने से भी वे नहीं चूकतीं कि अाज अपने कश्मीर का अपना जीवन चल रहा है क्या?… 
 
सभी सहमे हैं, अनिश्चय से घिरे हैं, अंदर गुस्सा उबलता रहता है. लेकिन, यह एहसास भी उतना ही गहरा हो कि इस उबलते गुस्से की अांच पर दूसरा तो क्या, एक प्याली कहवा भी नहीं बनता है…. ऐसा ही है ‘हमारा अभिन्न अंग कश्मीर’, जो हमारे शरीर से कहां जुड़ा है, न वे जानते हैं न हम! 
 
कुछ रोज पहले मैं जम्मू में था अौर वहां वे सब शेरदिल मोदी के समर्थक भी थे, जो जोश-खरोश से कह रहे थे कि हालात बहुत अच्छे हैं जी; अौर अब देश के पास एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो न डरता है, न झुकता है. जम्मू में अाप कहीं भी जाअो, कोई खतरा नहीं है.
 
मैं इस जोश के खोखलेपन को खूब समझता हूं. इससे पहले भी कुछ दफा कश्मीर अा चुका हूं. तब वह दौर शेरदिल मोदी का नहीं, शेरे-कश्मीर शेख अब्दुल्ला का था. तब एक अौर अादमी भी था- देश की राजनीतिक गतिविधियों से दूर, पटना में बैठा जयप्रकाश नारायण (जेपी). उसका दिल देश के अाम नागरिकों के साथ धड़कता था. उसे देश के हर घायल हिस्से की अावाज सुनायी देती थी, अौर ‘मैं अापके अांसुअों में अपने अांसू मिलाने अाया हूं’, कहता हुअा वह देश के हर कोने तक दौड़ता-भागता रहता था. घायल कश्मीर की अावाज में अपनी अावाज मिलाकर इसने नेहरू को, शेख साहब को, इंदिरा गांधी को कई बार अपना रास्ता बदलने पर मजबूर किया था. 
 
यह इतिहास लिखा जाना बाकी है कि लोकतंत्र में सजग-सक्रिय नागरिक की भूमिका की जैसी अवधारणा जेपी ने रेखांकित की, उसने हमारे लोकतंत्र के कितने ही नये अायामों को उद्घाटित किया. साल 1974-1977 के दौर में इसी अादमी ने लोकतंत्र की गाड़ी को फिर से पटरी पर ला खड़ा किया था. उसके ही निर्देश पर, उनका पत्रवाहक बन मैं एकाधिक बार कश्मीर अाया था.     
 
वे सारे अनुभव समेटकर मैंने अाज के ‘भक्तों’ से प्यार से पूछा, ‘इस प्रांत का नाम जम्मू है या जम्मू-कश्मीर?’ वे मेरा सवाल समझ जाते हैं. मैं फिर पूछता हूं, ‘पूरे घर में अाग लगी हो, तो क्या उसके एक कमरे में अाप सुरक्षित रह सकते हैं?’ 
 
सन्नाटा खिंच गया. कश्मीर में चुप्पी इतनी ही मुखर होती है कि बहरा भी सुन ले. उनमें से एक बोला, ‘जी, अाप जिसे कश्मीर कहते हैं, वह अब कहीं है ही नहीं.’ इतना साफ बोलकर वह खुद ही अचकचा गया. सभी अचकचा गये, लेकिन प्रतिवाद किसी ने नहीं किया. मैंने पूछा, तो ‘कहां गया वह कश्मीर?’
 
जवाब किसी के पास नहीं. लेकिन इस बारे में अनेक तरह से सहमति जतायी गयी कि कश्मीर में प्राय: हर अादमी ने यह निर्णय कर लिया है कि हमें साथ नहीं रहना है. यह निर्णय हर तबके ने किया है, दिल से किया है अौर अाप कितनी भी किलिंग करें, मिलिट्री से दबाने की कसरत करें, यह निर्णय बदला नहीं जा सकता है.
 
कश्मीर में हर कहीं, हर कोई एक ही सवाल पूछता है : हमारे साथ इतनी नाइंसाफी क्यों? महिला कॉलेज की प्रोफेसर बड़ी तल्खी से कहती हैं : ‘हमारे लिए दूसरे सारे सवाल अर्थहीन हो गये हैं, क्यों हमारे बच्चों का जीवन खत्म किया जा रहा है? हम उन्हें कैसे बचाएं? यह बड़ा सवाल दूसरे सारे सवालों की तरफ से हमने कान बंद कर लिये हैं.’ 
 
कॉलेज में पढ़नेवाली वह लड़की तीखी अावाज में बोली, ‘अापने हमारे लिए कोई 'स्पेस' ही नहीं छोड़ा है. हम न बोल सकते हैं, न विरोध कर सकते हैं; न हम सड़कों पर कुछ कह सकते हैं, न अपने घरों में. हम भी रोज देखते हैं कि दूसरे राज्यों में लड़के किस तरह हिंसक विरोध करते हैं. 
 
कैसे वहां बसें जलायी जाती हैं, दूसरे प्रांतों से अाये लोगों की हत्या कर दी जाती है. खून-रेप-लूट क्या-क्या नहीं चल रहा है. लेकिन ऐसे राज्यों में कहीं तो हम नहीं देखते हैं कि सरकार इनका सामना बम व बंदूक से कर रही हो? हमारे कश्मीर में ऐसी एक भी वारदात बताइये! 
 
हमारे लड़कों ने हिंसा की कार्रवाई की हो, ऐसा एक वाकया तो कोई बता दे! जहां भी ऐसा कुछ हुअा है, वह सरकारी हिंसा के जवाब में हुअा है; अौर बहुत हुअा तो कुछ लड़कों ने पत्थरबाजी की. गोली, टैंक, पैलेट गन के सामने पत्थर! यह राजद्रोह हो गया? 
 
अौर कितने लड़के ऐसा करते हैं? सरकार ही कहती है कि मुट्ठीभर लोग गड़बड़ करते हैं; तो मुट्ठीभर को अाप काबू में नहीं कर सकते? सीमा पार से शैतानी होती है, तो किस कश्मीरी ने रोका है कि अाप सीमा पार की ताकतों से न लड़ें? उनको जवाब दीजिये न! हमारी तो मांग है कि फौज का काम सीमा की रक्षा करना है, तो उन्हें सीमा पर भेजिये, हमारे खिलाफ खड़ा मत कीजिए.’
 
कश्मीर कराह रहा है, लेकिन बोल भी रहा है. हम उसकी कराह अौर उसकी बात दोनों नहीं सुनने की मूर्खता कर रहे हैं. हमें याद रखना चाहिए कि इतिहास मूर्खों की कब सुनता है कि अाज सुनेगा? 
 
बाहर बारिश अब भी हो रही है. ठंड बेहद बढ़ गयी है. लेह जानेवाला रास्ता बंद कर दिया गया है. अब लद्दाख से हमारा सीधा संबंध नहीं रह गया है. कश्मीर से सीधा संबंध बचा है क्या?
 

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