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  • Aug 19 2019 1:39AM
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कश्मीर पर संरा का पाक को साफ जवाब

प्रो सतीश कुमार
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
singhsatis@gmail.com
 
अनुच्छेद 370 की समाप्ति के बाद पाकिस्तान बेचैन है और चीन गुस्से में है. बीते शुक्रवार चीन द्वारा सुरक्षा परिषद् की बैठक बुलायी गयी. पाकिस्तान को उम्मीद थी कि 15 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में उसको समर्थन मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. 
 
केवल चीन ने तल्ख भाषा का प्रयोग किया, बाकी देश चुप रहे. ब्रिटेन चीन के समर्थन में दिखा. यह भारत की कूटनीतिक जीत है. अरसा पहले संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर मुद्दे को ले जाने की भूल हुई थी, जिसका खामियाजा सात दशकों तक देश झेलता रहा. 
 
जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देनावाले अनुच्छेद 370 को खत्म करने के बाद से देश से लेकर विदेश तक राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गयी है. पाकिस्तान इल्जाम लगा रहा है कि भारत ने इस मामले पर संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का उल्लंघन किया है. 
 
संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख गुटेरेस कलह की स्थिति से चिंतित है. कश्मीर मुद्दे पर चीन की मांग पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की आपात बैठक बुलायी गयी थी. यह बैठक बंद कमरे में हुई. सुरक्षा परिषद् के मौजूदा अध्यक्ष पोलैंड ने इस मुद्दे को चर्चा के लिए सूचीबद्ध किये जाने की जानकारी दी. 
 
इस बैठक में पांच स्थायी सदस्य और 10 अस्थायी सदस्य शामिल हुए. बैठक में भारत के पक्ष में रूस, ब्रि‍टेन और अमेरिका खड़े हुए. रूस ने कश्मीर को द्विपक्षीय मुद्दा बताया. वहीं चीन ने कहा कि वह कश्मीर के मसले पर चिंतित है. कश्मीर के हालात तनावपूर्ण और खतरनाक हैं. कश्मीर मुद्दे पर चीन ने एकतरफा कार्रवाई से बचने की सलाह दी. संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि अकबरुद्दीन ने कहा कि अनुच्छेद 370 भारत का आंतरिक मामला है. 
 
जम्मू-कश्मीर का फैसला सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए हुआ है. इस फैसले से बाहरी लोगों का कोई मतलब नहीं है. एक देश जम्मू-कश्मीर को लेकर जेहाद और हिंसा की बातें कर रहा है. जम्मू-कश्मीर में पाबंदियां धीरे-धीरे हटेंगी.  
 
पाकिस्तान न तो संयुक्त राष्ट्र का स्थायी सदस्य है, ना ही अस्थायी. वहीं चीन के अलावा किसी और स्थायी सदस्य ने पाक का साथ नहीं दिया है. ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस और रूस का कहना है कि यह मुद्दा संयुक्त राष्ट्र का नहीं, बल्कि द्विपक्षीय है. 
 
विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोमवार को बीजिंग में चीन के विदेश मंत्री वांग यी के साथ हुई द्विपक्षीय मुलाकात में स्पष्ट किया था कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 खत्म करने का फैसला भारत का आंतरिक मामला है. उन्होंने कहा था कि यह बदलाव बेहतर प्रशासन और क्षेत्र के सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए है एवं फैसले का असर भारत की सीमाओं और चीन के साथ लगती वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर नहीं पड़ेगा.
 
संयुक्त राष्ट्र में 1948 में कश्मीर पर पहला प्रस्ताव आया. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की सूची में यह प्रस्ताव नंबर 38 था. इसके बाद उसी साल प्रस्ताव 39, प्रस्ताव 47 और प्रस्ताव 51 के रूप में तीन प्रस्ताव और आये. प्रस्ताव 38 में दोनों पक्षों से अपील की गयी कि वे हालात को और न बिगड़ने दें. 
 
इस प्रस्ताव में यह भी कहा गया कि सुरक्षा परिषद के अध्यक्ष भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों को बुलाकर सीधी बातचीत करायें. प्रस्ताव 39 में सुरक्षा परिषद् ने एक तीन सदस्यीय आयोग बनाने का फैसला किया, जिसे तथ्यों की जांच करनी थी. 
 
21 अप्रैल 1948 को प्रस्ताव संख्या 47 में जनमत संग्रह पर सहमति बनी. प्रस्ताव में जम्मू-कश्मीर पर नियंत्रण के मुद्दे को जनमत संग्रह से तय करने की बात कही गयी. इसके लिए शर्त रखी गयी कि कश्मीर से पाकिस्तानी लड़ाके बाहर जायें और भारत कम-से-कम सेना रखे. साल 1972 में हुए शिमला समझौते में भी दोनों देश इस मुद्दे का हल आपसी बातचीत से निकालने पर सहमत हुए.
 
बड़ा सवाल यह है कि कश्मीर मामले में क्या संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् दखल दे सकती है?
 
इसका जवाब संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने ही दिया है. उन्होंने दोनों देशों को 1972 में हुए शिमला समझौते की याद दिलायी, जिसमें इस मुद्दे का हल शांतिपूर्ण और द्विपक्षीय तरीके से निकालने की बात की गयी है. 
 
बंटवारे के समय तय किया जा रहा था कि कौन सा हिस्सा भारत के साथ होगा और कौन सा पाकिस्तान का, तब मोहम्मद अली जिन्ना कहते थे कि कश्मीर तो उनकी जेब में है. भारत-पाक के बीच संघर्ष बढ़ने लगा, तब गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटन की सलाह पर जवाहरलाल नेहरू इस मामले को एक जनवरी, 1948 को संयुक्त राष्ट्र में ले गये. 
 
इस बात की पूरी उम्मीद है कि अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था भारत के पक्ष में है. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने संकल्प लिया है कि वह इस मुद्दे को दुनिया के हर मंच पर उठायेंगे. देखना यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसमें दखल देगा? 
 
अब भारत के लिए पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) पर अपना मालिकाना हक ज्यादा महत्वपूर्ण बन जायेगा. चीन इसलिए चिंतित है, क्योंकि पीओके में ही चीन का 'चीन-पाक आर्थिक गलियारा' (सीपेक) है, जहां से पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट पहुंचने का रास्ता तय होता है. 
 
लेकिन, इस वक्त चीन के पास कोई दलील नहीं है. चीन का तो खुद ही झिंजिआंग प्रांत और इनर मंगोलिया विवाद के घेरे में है. तिब्बत भी एक मसला है ही. वहीं ताइवान पर अमेरिका कमान कसे हुए है. अगर इस वक्त भारत का साथ इन मुद्दों पर अमेरिका को मिल जाता है, तो चीन की मुश्किलें बढ़ जायेंगी.
 
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