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  • Jan 24 2020 7:51AM
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जननायक कर्पूरी ठाकुर जयंती : सामाजिक समता के प्रबल योद्धा

जननायक कर्पूरी ठाकुर जयंती : सामाजिक समता के प्रबल योद्धा

केसी त्यागी

राष्ट्रीय प्रवक्ता, जदयू

kctyagimprs@gmail.com

24 जनवरी, 1924-17 फरवरी, 1988

जननायक कर्पूरी ठाकुर का आज जन्मदिन है. जननायक की उपाधि उन्हें अपने जीवन काल में ही विषमता, सामंतवाद, पूंजीवाद और सामाजिक अन्याय के विरुद्ध अनवरत संघर्ष के लिए बिहारवासियों द्वारा ही दी गयी थी. कर्पूरी ठाकुर जिस दौर में पैदा हुए और अस्पृश्यता, विषमता और अन्याय के खिलाफ जो राजनीतिक-सामाजिक संग्राम उनके द्वारा छेड़े गये थे, उसमें कई प्रकार के जोखिम भी भरे होते हैं.

ख्याति के साथ ही इसमें अपमान भी भरा होता है. ऐसी ही चुनौती का सामना डाॅ भीमराव आंबेडकर को भी करना पड़ा था. दुर्बल वर्गों में चेतना पैदा करना, उन्हें संगठित कर संघर्ष के लिए तैयार करना, संचार माध्यमों के अभाव में मुश्किल कार्य हुआ करता था. समाज में बसी हुई सदियों की उदासी, विवशता और जाति की श्रेष्ठता के सामंती तत्वों के मुकाबले परिवर्तन की चाह और राह दोनों अक्सर पराजित हो जाया करती हैं. डाॅ अांबेडकर जाति व्यवस्था के कुचक्र के कारण इतने नफरत में भर गये थे कि अपने समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म को स्वीकार कर लिया. 

आज भारत ही नहीं समूचा उप महाद्वीप उनके चिंतन और दर्शन को स्वीकारता है. संविधान और आरक्षण के विरोध में जरा-सी आहट भी करोड़ों लोगों को विरोध करते हुए सड़क पर ले आती है. अब किसी दल, व्यक्ति या समूह का साहस नहीं कि दबी जुबान से भी कोई टीका-टिप्पणी कर सके. 

कर्पूरी ठाकुर के दर्शन व विचार डाॅ लोहिया से प्रभावित हैं. अगर स्वतंत्र भारत में विचार और कर्म में लोहिया का कोई सच्चा उत्तराधिकारी है, तो वह कर्पूरी जी ही हैं. स्वतंत्र भारत में बड़ी आबादी सामाजिक-शैक्षणिक विषमता का दंश झेल रही थी. 

दक्षिण में द्रविड़ आंदोलन ने पिछड़े, वंचित, लाचार और विवश वर्गों को जो सम्मान और साझेदारी पेरियार व अन्ना दुरई के नेतृत्व में हासिल हुई, उत्तर भारत में पिछड़ों व अति पिछड़ों के सामाजिक सशक्तिकरण के कर्णधार निःसंदेह कर्पूरी ठाकुर ही होंगे. स्वतंत्रता के तुरंत बाद ही इन वर्गों की हिस्सेदारी को लेकर समय-समय पर आंदोलन चलते रहे और आयोग भी गठित हुए. 

पहला सफल प्रयोग काका काकेलकर आयोग से प्रारंभ होता है, जिसमें इन वर्गों के सामाजिक-शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने हेतु विशेष अवसर प्रदान करने और आरक्षण की व्यवस्था सुनिश्चित करने के सुझाव थे. उस समय के लगभग सभी राजनीतिक दलों की संरचना आज से सर्वथा भिन्न थी. जिला से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक सभी दलों में उच्च वर्ग व वर्ण का नेतृत्व बहुतायत था. यद्यपि लोहिया ने अपने प्रयासों से इस चक्र को भेदने की कोशिश की थी, लेकिन समाजवादी आंदोलन में भी निःसंदेह इन्हीं वर्ग के लोग नेतृत्व में बड़े पदों पर थे. 

डाॅ लोहिया का गैर-कांग्रेसवाद 1967 में अल्पकालीन दौर के लिए व्यवस्था पर अपनी मजबूत दस्तक लगाने में कामयाब हो गया, जब कई राज्यों में किसान व पिछड़ी जातियों के मुख्यमंत्री भी बने तथा मंत्री परिषद् में भी शामिल हुए. 

इन वर्ग समूहों के नेता किसी की दया-भाव की बजाय अपनी राजनीतिक क्षमता के आधार पर पद-प्रतिष्ठा पाने में कामयाब होने लगे. सबसे बड़े प्रांत उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह और हरियाणा में राव वीरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बने. बिहार में कर्पूरी ठाकुर उप मुख्यमंत्री पद पर सुशोभित हुए. जानकारों का विश्लेषण है कि सर्वाधिक संख्या प्राप्त सोशलिस्ट पार्टी के नेता होने के बावजूद कर्पूरी संख्या बल में तो जीत गये, लेकिन सामाजिक रुतबे में हार गये. लेकिन आंदोलन परिवर्तन की राह पकड़ गया.

आधे से अधिक आबादी वाले वंचित समाज की हिस्सेदारी सबसे पहले बिहार में सुनिश्चित हुई, जब कर्पूरीजी ने विधानसभा में पिछड़ों के आरक्षण की संरचना तैयार कर लागू कराने का प्रस्ताव कर दिया. साल 1978 का वर्ष पिछड़ी जातियों के इतिहास की एक इबारत लिख गया. जेपी के प्रयासों तथा विचारों पर खड़ी हुई जनता पार्टी दो फांक हो गयी. कुछ समाजवादी भी जाकर अपनी जाति के साथ ही चिपक गये. कर्पूरी जी समता के सिद्धांत के लिए बलि चढ़ गये, लेकिन इन वर्गों के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त कर गये. उनका आरक्षण वितरण किसी वर्ग के खिलाफ नहीं था.  

राजनीतिक पंडितों का आकलन है कि जिस मंडल कमीशन की अनुशंसाओं को लागू कराने के लिए कर्पूरी ठाकुर जीवन भर संघर्षरत रहे, उनके क्रियान्वयन की तिथि भी उनकी मृत्यु के दो वर्ष बाद तय हो गयी. 

साल 1990 का मुख्यमंत्री पद उनके लिए आरक्षित था, जो उनकी अनुपस्थिति में लालू प्रसाद को मिला. वह 1996 में एचडी देवगौड़ा की जगह प्रधानमंत्री भी होते. समूचे जनता दल में उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, उड़ीसा, कर्नाटक के सभी नेताओं में उनका कद सबसे बड़ा था. वह इतिहास निर्माण से पहले ही चले गये. 

आज तो देश के प्रधानमंत्री भी बिहार की जनसभाओं में कहते हैं कि 'मैं पिछड़े समाज से आता हूं और मुझे इस पर गर्व है.' आज किसी दल, व्यक्ति या समूह में इतना दम-खम नहीं, जो 'कर्पूरी फॉर्मूला' को नजरअंदाज कर सके.

खुशी है कि उनके अनुयायी नीतीश कुमार द्वारा कर्पूरी के संग्रामों को जस का तस पूरा किया जा रहा है. अति पिछड़ा वर्ग आयोग अस्तित्व में है. महादलितों के सशक्तिकरण की प्रक्रिया चरम पर है. सामाजिक परिवर्तन के नायकों के चित्र जब किसी सभागार में स्थापित होंगे, तो भगवान बुद्ध, महात्मा फूले, अांबेडकर, पेरियार के साथ-साथ कर्पूरी ठाकुर भी उसमें बिहार का नाम ऊंचा कर रहे होंगे.

 
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