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  • Mar 13 2019 5:59AM

भारत के लिए घोषणापत्र

प्रभु चावला
वरिष्ठ पत्रकार
prabhuchawla
@newindianexpress.com
 
राजनीतिक महाभारत का नवीनतम संस्करण व्यूह-रचना के दौर में है. आधा दर्जन राष्ट्रीय तथा पचास से अधिक क्षेत्रीय पार्टियां अपने घोषणापत्र रूपी मिसाइलों के साथ रणक्षेत्र में जाने को तैयार हैं, जिनमें नया भारत, समावेशी भारत, सहिष्णु भारत, समृद्ध भारत, शक्तिशाली भारत एवं एकजुट भारत जैसे नारों की बारूद भरी हुई है. 
 
पर क्या जनादेश हेतु प्रस्तुत ये सभी घोषणापत्र अपने शब्दों पर खरे उतरेंगे अथवा उनके सभी सजावटी शब्द गंदे, गाली-गलौज भरे, अपमानजनक, जातिवादी तथा मूर्खतापूर्ण मौखिक हमलों में बदल जायेंगे? 
 
पिछले कुछ चुनाव सकारात्मक वादों से कहीं ज्यादा नकारात्मक बयानियों के बूते जीते गये हैं. पूर्व उप प्रधानमंत्री चौधरी देवी लाल के सारगर्भित शब्दों में कहें, तो ‘केवल घोषणापत्र के मुखपृष्ठ पर एक नया चित्र चस्पा हो जाता है, जबकि बाकी चीजें लगभग वही रहती हैं, क्योंकि उनमें से कभी कोई भी पूरी नहीं की जाती.’ 
 
ग्रामीण भारत के इस यथार्थवादी नेता के इस कथन में दम है, जिनके दशकों बाद आज भारत विश्व की छठी सबसे बड़ी तथा सबसे तेज बढ़नेवाली अर्थव्यवस्था है. पिछले तीन दशकों के दौरान राष्ट्र की प्रतिव्यक्ति आय में 300 फीसदी का इजाफा हुआ है. भारत की अंतरराष्ट्रीय हैसियत आज पहले से कहीं ज्यादा वजनी है. 
 
यहां विश्वस्तरीय विमानपत्तन तथा स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं. घरेलू नागर विमानन उद्योग दो अंकों की दर से वृद्धि पा रहा है. पिछले एक दशक में देश के अरबपतियों की तादाद में 500 प्रतिशत की बढ़त दर्ज की गयी है. विश्व के 200 शीर्ष धनाढ्यों में दर्जन से ज्यादा भारतीय हैं. मगर गरीबी हटाओ आज भी एक प्रासंगिक सियासी नारा है. 
 
हमारे सामाजिक तथा सियासी परिदृश्य को एक विडंबना परिभाषित किया करती है. पहले भारत को एक ऐसा समृद्ध देश माना जाता था, जहां निर्धन आबादी निवास करती है, मगर आज यह एक ऐसा समृद्ध राष्ट्र है, जो चंद महाधनिकों के हाथों बंधक बना पड़ा है. यहां यत्र-तत्र विपुलता अवश्य बिखरी है, पर गरीबी रेखा से नीचे निवास करनेवाली सबसे बड़ी जनसंख्या भी यहीं मौजूद है. आजादी के 71 वर्षों बाद भी हमारे सियासतदां कृषि ऋण माफ करने की बातें किया करते हैं. 
 
चार दशक पूर्व कृषि जीडीपी में 50 प्रतिशत का योगदान करते हुए 60 प्रतिशत ग्रामीण आबादी के लिए आय का स्रोत थी. आज उसका यह योगदान घटकर 17 प्रतिशत पर पहुंच गया है, जबकि उस पर 50 प्रतिशत ग्रामीण आबादी निर्भर है. प्रत्येक चुनावी घोषणापत्र ने उनके साथ बेहतर व्यवहार के वादे कर उन्हें ठगा है, किंतु किसानों की आत्महत्याएं अंतहीन ढंग से बढ़ती ही जा रही हैं.
 
इस देश की मुश्किलों का ज्यादातर दारोमदार आरक्षण की विकृति का है. दस वर्षों के लिए जाति आधारित आरक्षण सामाजिक रूप से भेदभाव के शिकार लोगों को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने का साधन बना था, मगर आज ज्यादा से ज्यादा जातियां आरक्षण की आस लगाये बैठी हैं. 
 
सियासी पार्टियां गरीबी उपशमन कार्यक्रमों के ढोल पीटने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देतीं, फिर भी सात दशक बाद प्रत्येक चौथा भारतीय गरीबी रेखा से नीचे ही है. हर अगले घोषणापत्र में ये नेता करोड़ों रोजगारों के वादे बांटते हैं. पर प्रत्येक दस योग्य युवाओं में एक लाभप्रद रोजगार से वंचित है. प्रत्येक पांच वर्ष पर नेतागण गरीबों के लिए सस्ते आवासों की सौगंध खाते हैं, पर प्रत्येक पांचवां परिवार अपने सिरों पर बगैर किसी पक्के छत के दिन-रैन गुजारता है. 
 
मतों की भिक्षा मांगनेवाले सबके लिए पेयजल की रोजाना आपूर्ति के आश्वासन दिया करते हैं, किंतु 70 प्रतिशत से भी अधिक भारतीयों को दैनंदिन आधार पर स्वच्छ पेयजल नसीब नहीं होता. विश्व की 16 फीसद आबादी को मीठा जल मुहैया कराने का जिम्मा कांधे पर लिए इस देश के हिस्से में विश्व के मीठे जल भंडार का कुल चार फीसद ही मौजूद है.
 
स्वच्छ भारत, स्वस्थ भारत अद्भुत शब्दावलियां हैं. हमारे अतीत के किसी अन्य नेता ने भारतीय मानस में बुनियादी बदलाव लाने को नरेंद्र मोदी जैसा नेतृत्व नहीं प्रदान किया. मगर शुरुआती सफलताओं के बाद नामचीन बदलाव दूतों ने उनके सपने के समर्थन में अपनी दिलचस्पी खो दी. 
हमारे अधिकतर नगर कचरे से भरे हैं, जबकि छोटे कस्बे और गांव और भी बदतर हालत में हैं. बदतरीन होते शहरों को स्मार्ट सिटी योजना के द्वारा विश्वस्तरीय स्वच्छता एवं सुचारुता के प्रतीक बना मोदी ने उन्हें निवेशकों तथा सैलानियों के लिए आकर्षक गंतव्य बनाने का लक्ष्य तय किया था. पर अधिकतर प्रशासकों ने इस योजना का मजाक बनाकर रख दिया. 
 
स्कूलों, ग्रामीण परिवारों एवं शहरी मलिन बस्तियों में शौचालय निर्माण की बड़ी परियोजनाएं ‘मैला भारत’ के ठप्पे से मुक्ति हेतु चलायी गयी थीं. किंतु नागरिक योजना निर्माताओं ने उसके साथ ही सतत जलापूर्ति तथा देखभाल कर्मियों की व्यवस्था नहीं की. नतीजतन कम से कम 16 प्रतिशत नव निर्मित शौचालय अनुपयोगी बने पड़े हैं.
 
हमारे नेता आइआइटी, आइआइएम तथा एम्स जैसे शिक्षा के प्रत्येक उत्कृष्ट संस्थान पर प्रतिवर्ष 500 करोड़ रुपये खर्च कर गर्व किया करते हैं, जिसमें दो हजार से भी कम छात्रों को प्रवेश मिलता है. पर 70 वर्षों बाद भी हमारे अधिकतर स्कूलों को प्रशिक्षित शिक्षक एवं बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नहीं हो सकी हैं. 
 
निजी स्वास्थ्य चर्या संस्थान एवं इंश्योरेंस कंपनियां चांदी पीट रही हैं, जबकि ग्रामीण एवं कस्बाई इलाकों की 80 प्रतिशत आबादी को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं, जहां से गंभीर रोगग्रस्त मरीज बड़े शहरों की ओर भागते हैं. 
 
इन घोषणापत्रों में वनों में वृक्षों की बातें निश्चित रूप से नहीं होंगी. सियासी पार्टियों को चाहिए कि वे भाषणबाजी की स्पर्धा छोड़ प्रयोजनपरक देशभक्ति का वरण करें. नब्बे के शुरुआती दशक के सुधारों का उद्देश्य संपदा का निर्माण था और उन्हें उसमें सफलता भी मिली.
 
मगर हुआ यह कि उसका 90 प्रतिशत अंश भारत के चार प्रतिशत लोगों के पास चला गया. सभी देशवासियों को समृद्ध-स्वस्थ बनाने हेतु आवश्यक यह है कि ये घोषणापत्र भारत के लिए न कि इंडिया के लिए बनाये जायें. याद रखें कि प्रत्येक दूसरा भारतीय गांवों-कस्बों में रहता है. 
 
स्वस्थ, समृद्ध, स्वच्छ तथा समावेशी भारत के निर्माण हेतु हमारा मंत्र स्वच्छ शिक्षा, स्वच्छ चिकित्सा, स्वच्छ शासन तथा  स्वच्छ सोच होना ही चाहिए. गरीबी के सागर में समृद्धि तथा विलासिता के चंद द्वीपों के दृश्य का मेरा भारत महान की सोच के साथ कोई तालमेल नहीं बैठता.
(अनुवाद: विजय नंदन)                                    

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