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  • Dec 12 2019 6:44AM
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मूर्तियों की राजनीति और विचार

नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
naveengjoshi@gmail.com
 
कोलकाता के फुटपाथ और चौराहों पर पिछले कुछ समय से एक नयी भीड़ दिख रही है. यह भीड़ मूर्तियों की है. महात्मा गांधी और नेताजी सुभाष बोस की प्रतिमाएं कोलकाता के लिए अनजानी नहीं, लेकिन इन दिनों अपेक्षाकृत कम चर्चित बांगला-नायकों की भी बड़ी-बड़ी मूर्तियां बड़ी संख्या में दिखने लगी हैं. कुछ के दर्शन सुलभ हैं, जबकि कई बड़ी-बड़ी पन्नियों में लिपटी हुई हैं. इन्हें उचित समय पर उद्घाटन की प्रतीक्षा है. यह ‘उचित समय’ लगभग आ ही गया है. कोलकाता नगर निकायों के चुनाव चार महीने दूर हैं. बंगाल विधानसभा के चुनाव भी 2021 में होने हैं. ये मूर्तियां चुनावों में बड़ी भूमिका निभानेवाली हैं. 
 
एक अंग्रेजी दैनिक के अनुसार, अकेले उत्तरी कोलकाता में बीस से अधिक नयी मूर्तियां प्रकट हो गयी हैं. महानगर के दक्षिणी हिस्से के लिए और भी ज्यादा मूर्तियां तैयार हो रही हैं. 
 
इनमें महात्मा गांधी और सुभाष बोस तो हैं ही, रबींद्रनाथ टैगोर, विवेकानंद, रामकृष्ण परमंस, राजाराम मोहन राय, सिस्टर निवेदिता, ईश्वरचंद विद्यासागर तथा कई अल्पज्ञात बांग्ला-गौरव-नायक शामिल हैं. कुछ मूर्तियां 30-35 फुट ऊंची हैं, तो कुछ अपेक्षाकृत छोटी हैं. सभी मूर्तियों को स्थापित करने का श्रेय सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और उसके स्थानीय पार्षद या नेता को देने के लिए शिलापट्ट लगे हैं. इन नामों पर रात में भी रोशनी पड़ने का इंतजाम किया गया है.
 
जिस दिन यह समाचार आया, उसी दिन उत्तर प्रदेश के समाचार पत्रों में प्रमुखता से यह छपा कि पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 25 फुट ऊंची प्रतिमा ‘लोक भवन’ में स्थापित होने के लिए लखनऊ पहुंच गयी है. लखनऊ से पांच बार सांसद रहे अटलजी के जन्म दिन, 25 दिसंबर को इसका लोकार्पण किया जायेगा. 
पिछले कुछ वर्षों से मूर्तियों की राजनीति या राजनीति में महापुरुषों के नाम का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है. गुजरात में सरदार पटेल की ‘विश्व की सबसे ऊंची’ प्रतिमा अब भी चुनावी-राजनीति का विशेष केंद्र बनी हुई है. शायद ही कोई शहर हो जहां गांधी जी की प्रतिमाएं न हों. अस्सी के दशक के बाद आंबेडकर की छोटी-बड़ी प्रतिमाएं शहरों ही नहीं, कस्बों, देहातों और बस्तियों तक स्थापित होती रही हैं. लखनऊ में आंबेडकर और अन्य दलित नायकों की मूर्तियों के अलावा जीवित मायावती की मूर्तियां भी बड़ी तादाद में हैं, जिनकी सुरक्षा के लिए विशेष बल तैनात है. इन मूर्तियों के अंग-भंग या अपमान की वारदात भी राजनीति का हिस्सा बनती हैं. 
 
महापुरुषों के मूल विचार नहीं, उनकी प्रस्तर-प्रतिमाएं हमारे देश की चुनावी राजनीति का नया हथियार हैं. जिन राष्ट्रीय या स्थानीय नायक-नायिकाओं की प्रतिमाओं से फुटपाथ-चौराहे जगमगा रहे हैं, उनके विचार राजनीतिक दलों के लिए कितना महत्व रखते हैं? उनके विचारों को कितना समझा जाता है? आम जनता को ये मूर्तियां क्या संदेश देने के लिए स्थापित की जा रही हैं? 
 
तृणमूल कांग्रेस का कहना है कि ये मूर्तियां बांग्ला संस्कृति और सांप्रदायिक एकता की प्रतीक हैं और इनका उद्देश्य भाजपा की सांप्रदायिक राजनीति का मुकाबला करना है. ये मूर्तियां 19वीं-20वीं शताब्दी के बांग्ला पुनर्जागरण के नायकों की हैं, जिन्होंने समाज में क्रांतिकारी बदलाव किये. 
 
पूछा जाना चाहिए कि तृणमूल कांग्रेस को आज अपने इन विस्मृत नायकों की याद क्यों आयी? इनकी मूर्तियों की स्थापना अब क्यों प्राथमिक एजेंडा बन गया? उत्तर कतई कठिन नहीं. ममता बनर्जी के गढ़ में सेंध लगाने के लिए भाजपा अरसे से प्रयासरत है. हिंदू-ध्रुवीकरण का अभियान भी इसका हिस्सा है. 
 
लोकसभा चुनाव के काफी पहले से वहां व्यापक स्तर पर हनुमान जयंती और रामनवमी मनाये जाने का सिलसिला शुरू किया गया, जिसकी बंगाल में कोई परंपरा नहीं थी. तृणमूल इसे भाजपा के सांप्रदायिक अभियान के रूप में देखती है. इस बीच एनआरसी तथा नागरिकता संशोधन विधेयक लाये जाने से ममता की चुनौती बढ़ रही है. इन चुनौतियों के मोर्चे पर भाजपा का सामना करने के लिए वह बांग्ला-गौरव-नायकों की मूर्तियों का सहारा ले रही हैं. ये मूर्तियां राजनीतिक युद्ध का हथियार बन रही हैं, जैसे कि भाजपा ने ‘हिंदू-पर्वों’ को अपना अस्त्र बनाया है.
बीते लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़ दी गयी थी. भाजपा और तृणमूल कांग्रेस दोनों ने इसके लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराया था और दोनों ने ही नयी और भव्य मूर्ति बनवाने का वादा किया था. उसी रणनीति की अगली कड़ी अब कोलकाता में दिखायी दे रही है.  
 
हमारे देश में सबसे अधिक प्रतिमाएं आंबेडकर की दिखती हैं. बड़े शहरों में लगी भव्य प्रतिमाओं से लेकर छोटी-छोटी बस्तियों में लगी छोटी मूर्तियों तक. बहुजनवादी दलों के लिए ये मूर्तियां दलित-राजनीति और सामाजिक चेतना की प्रतीक रही हैं. पिछले कुछ वर्षों से दलित-पिछड़ा वर्ग में राजनीतिक पैठ बनाने के लिए भाजपा ने भी आंबेडकर को अपनाया है. 
 
वर्तमान में आंबेडकर सभी दलों के प्रिय बने हुए हैं. प्रश्न यह है कि क्या आंबेडकर के जो विचार और मूल्य बहुजनवादी दलों के लिए महत्वपूर्ण हैं, क्या वही भाजपा के लिए भी हैं? भाजपा ने तो कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के समर्थन में भी आंबेडकर को खड़ा कर दिया था. विडंबना है कि बहुत बड़ी संख्या में आंबेडकर-पूजन के बावजूद इस देश में दलितों से छुआछूत और उनका दमन जारी है. 
महात्मा गांधी को जो संघ-परिवार देश के विभाजन और मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के लिए दोषी ठहराता है, वही अब उनकी 150वीं जयंती मना रहा है. लेकिन गांधी के विचार वहां कितने सम्मानित हैं? हर बात में ‘बापू-बापू’ करनेवाली कांग्रेस ने अगर स्वतंत्रता के बाद ही उनका रास्ता त्याग दिया, तो अब भाजपा ने अपने आचरण और कर्म में उन्हें कितना अपना लिया है?
 
सरदार पटेल की विशालकाय प्रतिमा और भी राजनीतिक विद्रूप पैदा करती है. भाजपा ने अपने सत्तारोहण दौर में पटेल को नेहरू के मुकाबिल खड़ा किया है. 
 
यह देखने की चिंता किसे है कि पटेल और नेहरू के वैचारिक मतभेद क्या थे, क्यों थे? क्या पटेल सचमुच नेहरू के वैसे ही विरोधी थे या गांधी और नेहरू ने पटेल को सचमुच उसी तरह किनारे किया जैसा कि प्रचारित किया जा रहा है? मूर्तियों की यह राजनीति नयी पीढ़ी को इन महापुरुषों के वास्तविक विचार और मूल्य समझा रही है या उन्हें अपनी सुविधा के लिए नये नायक-खलनायक के रूप में स्थापित कर रही है? आप सोचिए! 
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