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  • Apr 16 2019 12:11AM
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शैक्षिक योग्यता और कामकाज

आकार पटेल
कार्यकारी निदेशक,
एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया
aakar.patel@gmail.com
 
एक नेता को कितना शिक्षित होना चाहिए और उसमें बौद्धिक सुसंगति के अभाव के क्या नतीजे हो सकते हैं? कांग्रेस मजाक उड़ा रही है कि स्मृति ईरानी ने कभी किसी कॉलेज में दाखिला नहीं लिया. उन्होंने एक पत्राचार पाठ्यक्रम में अपना नामांकन तो कराया था, पर वे उसे पूरा न कर सकीं.
 
स्मृति ईरानी एक बुद्धिमान तथा चतुर महिला हैं और औपचारिक शिक्षा का अभाव उनकी प्रगति की राह का रोड़ा नहीं बन सका. अलबत्ता यह अपनी जगह सही है कि उनके गुणों की परख केवल उनके नीतिगत कदमों को लेकर की जा सकती है, जिसके विषय में हममें से अधिकतर को कोई जानकारी नहीं है. 
 
कॉलेज नहीं जाने में कोई शर्म की बात नहीं है, मगर ईरानी की मुश्किलें इसलिए पैदा हुईं कि उन्होंने अपनी शिक्षा से संबद्ध कुछ ऐसे दावे कर डाले, जो यदि सिरे से गलत नहीं, तो भ्रामक जरूर थे. यह कहा जाना चाहिए कि खुद कांग्रेस पार्टी की वंशावली भी शैक्षिक दृष्टि से कोई खास सुयोग्य नहीं है.
 
राजीव गांधी पढ़ाई के लिए कैम्ब्रिज तो गये, पर वे अपनी परीक्षा में विफल रहे और उन्हें कोई डिग्री नहीं मिल सकी. उनके भाई संजय गांधी तो हाई स्कूल भी नहीं पास कर सके. उन्होंने मोटर गाड़ियों की मरम्मत का एक कोर्स करने के लिए स्कूली शिक्षा छोड़ दी. यह अचरज की ही बात है कि एक ऐसा व्यक्ति भी इतना शक्तिशाली था और उनकी मां ने उन्हें नीतिगत मामलों में इतने अधिक दखल की छूट दे रखी थी.
 
संजय गांधी की मेनका से शादी तब हुई, जब वे 18 वर्ष की थीं और इसलिए उन्हें भी उचित शिक्षा नहीं मिल सकी. लोकसभा के रिकॉर्ड में सिर्फ इतना दर्ज है कि वे स्कूल गयीं. सोनिया गांधी भी कॉलेज नहीं जा सकीं. उनकी शिक्षा 18 वर्ष की उम्र में समाप्त हो गयी और उन्होंने भी शीघ्र ही शादी कर ली. इंदिरा गांधी के पास भी कोई डिग्री नहीं थी.
 
राहुल गांधी के आलोचक उन्हें पप्पू कहते हैं, पर शैक्षिक रूप से वे अधिक आगे नजर आते हैं. उन्हें ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज से विकासात्मक अर्थशास्त्र में एमफिल की डिग्री हासिल है. यह वही जगह है, जहां पर नेहरू ने भी शिक्षा ग्रहण की थी. पाठकों को यह तथ्य दिलचस्प लग सकता है कि नेहरू कोई अच्छे छात्र न रहे और वे तृतीय श्रेणी में ही उत्तीर्ण हो सके थे. गांधी परिवार के इतिहास में राहुल गांधी सर्वाधिक शिक्षित व्यक्ति हैं.
 
ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों में सर्वाधिक विख्यात विंस्टन चर्चिल भी कॉलेज नहीं जा सके थे और उन्हें कोई औपचारिक शिक्षा भी नहीं मिली थी. यह तथ्य इसलिए भी काबिलेगौर है कि वे एक इतिहासकार एवं उपन्यासकार थे और उन्हें वर्ष 1953 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला था. एक अन्य ब्रिटिश प्रधानमंत्री जॉन मेजर थे, जिन्होंने 16 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और कॉलेज नहीं गये. ब्रिटिश प्रधानमंत्रियों में कुल 11 व्यक्ति ऐसे थे, जिन्होंने कॉलेज की शिक्षा हासिल नहीं की थी.
 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्रह साल की उम्र में अपना घर छोड़ दिया और इसलिए वे भी कॉलेज नहीं गये, पर औपचारिक शिक्षा के अभाव के बावजूद हम यह तो भांप ही सकते हैं कि वे एक अच्छे राजनेता हैं. फिर भी मैं यह समझता हूं कि उनमें एक अहम कमी यह है कि नीतिगत मामलों में वे मनमोहन सिंह अथवा ओबामा या फिर किसी अन्य बौद्धिक व्यक्ति की तरह गहराई तक नहीं जाते.
 
अपने एक इंटरव्यू के दौरान नरेंद्र मोदी ने स्वयं ही यह बताया है कि वे किस तरह काम करते हैं. वे कहते हैं- ‘जब मैं गुजरात का मुख्यमंत्री बना, तो उसके तीन-चार दिनों बाद राज्य के मुख्य सचिव (सीएस)  मेरे पास आये.
 
वे अपने साथ ढेर सारी फाइलें लेकर आये थे, जिनका कुल वजन 15-20 किलो रहा होगा. मुख्य सचिव ने मुझसे कहा: यह फाइल नर्मदा की है. फिर इसी तरह तीन और फाइलें थीं, जिनके बारे में उन्होंने कहा कि ये सब गुजरात के संवेदनशील तथा अहम मामलों की फाइलें हैं. आप इन सबको पढ़ जाने का वक्त निकाल लें. आप को कभी भी इन सब पर बोलने, अपना मत व्यक्त करने और इन्हें निबटाने की जरूरत पड़ सकती है.
 
‘मैंने इन फाइलों को तीन-चार बार ऊपर से नीचे तक देखा और उनसे कहा: आप इन्हें यहां छोड़ दें और कुछ दिनों में मुझसे मिलें. ‘मैंने वे फाइलें खोलीं तक नहीं. वे जहां थीं, वहीं पड़ी रहीं. मेरे अंदर से एक आवाज आयी कि मैं किसी अकादमिक अध्ययन के द्वारा काम नहीं कर सकता. 
 
मुझसे यह नहीं होगा. यह आवाज मेरे अंतर से आयी थी. मैंने अपने साथ काम करनेवाले तीन अफसरों को कहा कि मुख्य सचिव ने मुझे ये फाइलें दी हैं. मैं इतना ज्यादा पढ़ नहीं सकूंगा. आप लोग मुझे बतायें कि इन फाइलों में क्या है. यदि मैं इन्हें पढ़ना शुरू करूंगा, तो उसका अंत नहीं होगा. फाइलें पढ़ना मेरी प्रकृति में नहीं.
 
‘तीन-चार दिनों बाद मुख्य सचिव पुनः मेरे पास आये. मैंने उनसे कहा कि आप मुझे बतायें कि इन फाइलों में क्या अहम चीजें हैं. उन्होंने वैसा ही किया और फिर मैंने उनसे कहा, मेरे लिए इतना पर्याप्त है, आप इन्हें वापस ले जा सकते हैं.
 
‘उसके बाद मुझे इन मुद्दों पर किसी को कुछ भी बताने की जरूरत नहीं पड़ी, और तब से 13 वर्ष बीत चुके हैं. मुझमें ऐसी क्षमता रही है कि मैं मुद्दों की तह तक पहुंच सकता हूं. अफसरों पर ऐसी चीजों का असर पड़ा. मैं बहस नहीं करता. 
 
मैं एक अच्छा श्रोता हूं. मेरे बारे में बाहर क्या कुछ कहा जाता है, उस पर मत जाइए. मैं काफी अधिक सुनता हूं. आज मैं यह कह सकता हूं कि मेरे विकास में पढ़ने की भूमिका यदि 30 प्रतिशत है, तो सुनने की भूमिका 70 प्रतिशत तक रही है. मैं जो कुछ सुनता हूं, उसका विश्लेषण किया करता हूं और उसको अपने मस्तिष्क के विभिन्न बक्से में वर्गीकृत किये देता हूं. मुझे इसमें कोई वक्त नहीं लगता और जब भी आवश्यकता होती है, मैं उसे अपने जेहन में वापस ला सकता हूं. मैं इस विशिष्ट विधा को विकसित कर सका हूं. 
 
आज भी जब मेरे अफसर मुझे कोई कागजात दिखाते हैं, तो मैं उनसे कहता हूं कि मुझे दो मिनट में यह बताइए कि इनमें क्या है. मेरे लिए 10 पृष्ठों की किसी सामग्री के लिए दो मिनट बहुत हैं. मैंने यह हुनर विकसित किया है.’
 
दुर्भाग्यवश, एक विशाल तथा जटिल देश को चलाने के लिए ऐसा करना उचित नहीं है. यह उम्मीद की जानी चाहिए कि अपने द्वितीय कार्यकाल में मोदी गंभीर तथ्यों को पढ़ने में ज्यादा वक्त देंगे, चाहे उन्हें उससे ऊब क्यों न हो, या वह उनकी प्रकृति के विपरीत ही क्यों न हो.
 

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