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  • Dec 10 2019 7:07AM
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विभागों की अनदेखी का नतीजा

दुनू रॉय
निदेशक, हजार्ड्स सेंटर, दिल्ली
hazardscentre@gmail.com
 
देश की राजधानी दिल्ली में अनाज की मंडी के एक बिल्डिंग में बीते रविवार की सुबह भयानक आग लग गयी, जिसने कई लोगों (मुझे जानकारी मिलने तक 43) की जिंदगियां खत्म कर दी. अब सवाल उठ रहा है कि वहां इतनी भीषण आग लगी कैसे और अगर लगी भी, तो बचाव कार्य कैसे नहीं हो पाया, जिससे जिंदगियां खत्म हो गयीं. इस पर राजनीति शुरू हो गयी, जबकि यह सब किया धरा राजनीति का ही है.
 
एक तरफ भाजपा केजरीवाल सरकार को दोषी मान रही है, तो वहीं दूसरी तरफ आप के नेता भाजपा के नेतृत्व वाले दिल्ली नगर निगम को दोषी मान रहे हैं. हर बड़े आपदा का यही हाल है हमारे देश में. बिना किसी विचार-विमर्श करने या कोई ठोस उपाय निकालने के आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो जाता है. निश्चित रूप से यह एक बड़ी विडंबना है कि आज की भारतीय राजनीति से संवेदनशीलता खत्म हो गयी है. भारतीय राजनीति का यह पतनकाल कहा जा सकता है. 
 
आग जिस मंडी की बिल्डिंग में लगी, उसको अच्छी तरह समझने की जरूरत है. किसी भी मंडी में उत्पादन का काम नहीं होता है, बल्कि उत्पादित सामानों के सौदे का काम मंडिया करती हैं. अनाज लाये जाते हैं और उन्हें बेचा जाता है. इसलिए किसी मंडी में आग जैसी दुर्घटना की संभावना शून्य होती है. उस मंडी में भी सौदे का ही काम एक जमाने में हुआ करता था. यह बात केजरीवाल सरकार से पहले की है. 
 
एक जमाने में दिल्ली में जितनी मंडियां थीं, थोक के बाजार थे, उन सभी को सरकार ने एक-एक कर हटाना शुरू कर दिया था या बाहर करना शुरू कर दिया, यह कह कर कि यहां पर घनी आबादी है, जिससे परेशानियां बढ़ जाती हैं, इसलिए इनको हटा दिया गया. लेकिन, इन मंडियों और थोक के बाजारों को पुरानी दिल्ली से हटाने के बाद उन्हें नयी जगह देनी चाहिए थी, जो कि नहीं दी गयी. दिल्ली सरकार के डीडीए (दिल्ली विकास प्राधिकरण) को अपने मास्टर प्लान के मुताबिक करीब 50 नये औद्योगिक क्षेत्र बनाने थे. लेकिन, बने सिर्फ बीस, वह भी बड़ी मुश्किल से.
 
तो जब सरकार औद्योगिक क्षेत्र बनायेगी ही नहीं, तो मंडियों और थोक बाजारों से निकले लोग कहीं न कहीं तो जायेंगे ही. अब हुआ यूं कि मंडियां तो खत्म हो गयीं, लेकिन जब बाजार को नयी जगहें नहीं मिलीं, तो उन मंडियों की बिल्डिंगों में लोगों ने धीरे-धीरे छोटी-मोटी फैक्ट्रियां लगानी शुरू कर दीं. मसलन, प्लास्टिक की, रैक्सीन की, थैलियां बनाने आदि की फैक्ट्रियां इन मंडियों की इमारतों में बढ़ने लगीं. लेकिन सरकार ने इन पर जरा भी ध्यान नहीं दिया कि ये फैक्ट्रियां वहां काम कर रही हैं, तो उनको बंद किया जाना चाहिए. क्योंकि वे सब अवैध रूप से ही काम कर रही थीं. 
 
दूसरी बात, मंडियों में और थोक बाजारों वाली जगहों अनाजों को चूहों और कीड़ों से बचाने के लिए ऐसी इमारतें बनती हैं, जिनमें सिर्फ एक दरवाजे ही हुआ करते हैं. छोटी-छोटी खिड़कियां होती हैं और उनमें भी लोहे की ग्रिल लगी होती हैं. लेकिन, मंडी बंद होने के बाद जब उनमें फैक्ट्रियां लगीं, तो उसी के भीतर कई घुप्प अंधेरेनुमा कमरे बना दिये गये, जहां मजदूर काम करने लगे. इसका नुकसान यह हुआ कि जब आग लगी, तो किसी को भागने तक की जगह नहीं मिल सकी. इन फैक्ट्रियों को सिर्फ अवैध ठहराने भर से काम नहीं चलना है, क्योंकि सरकारी व्यवस्था तो तब भी नहीं बदलनी है. सरकार जब तक नयी व्यवस्था नहीं बनायेगी, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे. 
 
लेकिन, न तो सरकार ने नयी व्यवस्था बनायी और न ही पुरानी पड़ चुकी चरमराती व्यवस्था पर ध्यान दिया. मुक्त बाजार तो ऐसे मौके की ताक में रहता है. मुक्त बाजार को मौका मिला, तो उसने किसी तरह जुगाड़ लगाकर मंडियों की संकरी इमारतों में फैक्ट्रियां डाल दी. न तो नगर निगम ने यह पूछा कि वहां यह सब क्यों हो रहा है, और न ही फायर विभाग वालों ने इसकी तहकीकात की कि वहां क्या चल रहा है.
 
नगर निगम और फायर विभाग, इन दोनों का काम होता है, बल्कि जिम्मेदारी होती है कि ये दोनों अपने क्षेत्रों की तमाम गतिविधियों पर नजर रखें और सरकार को बताएं कि वहां क्या हो रहा है. लेकिन, इन दोनों विभागों के भ्रष्ट अधिकारियों ने उस फैक्ट्री को और उसके जैसी तमाम अन्य फैक्ट्रियां जो वहां अभी हैं, सबको चलने दिया. जाहिर है, यह सब मुक्त व्यापार और अधिकारियों के भ्रष्टाचार का नतीजा है कि इतनी जानें चली गयीं. 
 
एक तरफ तो डीडीए है, जिसको मंडियां खत्म होने के बाद नयी व्यवस्था बहाल करनी चाहिए थी. वहीं दूसरी तरफ सरकारी विभाग, मसलन नगर निगम, औद्योगिक सुरक्षा अधिकारी और फायर विभाग हैं, जिन्हें इन सब गतिविधियों की निगरानी की जिम्मेदारी है, उन सब ने कोई ध्यान नहीं दिया. 
 
इसी का नतीजा है कि आज भी दिल्ली में बरसों से कई अवैध फैक्ट्रियां चल रही हैं, तमाम विभागों के अधिकारी जानते हुए भी घूस लेकर उसे चलने देते हैं और मुक्त बाजार अपनी मुक्तता के हिसाब से लोगों की जान लेता रहता है. 
 
 दिल्ली ही क्या, देशभर के शहरों में अवैध फैक्ट्रियों को लेकर लचर सरकारी रवैया कोई नयी बात नहीं है. मैं पिछले दो दशक से यह सब देख रहा हूं. सरकार की नीति है कि बाजार को और भी मुक्त किया जाये. ऐसे में लोगों को क्या दोष दिया जाये. पूरी तरह से सरकार की नीति, उसके विभिन्न विभाग ऐसे हादसों के लिए जिम्मेदार हैं. 
 
फायर विभाग तो यह समझता है कि उसके पास जब फाेन आयेगा, तब वह अपनी गाड़ी लेकर घटनास्थल पर पहुंच जायेगा, जबकि यह फायर विभाग की जिम्मेदारी है कि वह शहरभर की उन जगहों की निगरानी करे, जहां घटना होने की आशंका ज्यादा है. उसके अधिकारियों को चाहिए कि वे समय-समय पर जाकर निरीक्षण करें कि कहीं कोई ऐसा निर्माण तो नहीं है, जिससे कि बड़े हादसे हो सकते हैं. 
 
वहीं उद्योग विभाग का काम है कि वह यह देखे कि कहां-कहां ऐसे अवैध तरीके से उद्योग चल रहे हैं, उनको या तो बंद कराये, या फिर बाकायदा जांच के बाद कानून के मुताबिक एनओसी दे. सरकारी विभागों से जब पूछा जाता है कि आप अपनी जिम्मेदारी क्यों नहीं निभाते, तो जवाब मिलता है कि स्टाफ नहीं है. स्टाफ क्यों नहीं है, तो पता चलता है कि पिछले बीस साल से सरकार ने नियुक्तियां ही नहीं की है. अब जब नयी नियुक्तियां नहीं होंगी, तो जाहिर है कि सरकारी व्यवस्था तो ऐसे ही जर्जर हो जायेगी. फिर इन सरकारी विभागों के होने का कोई मतलब ही क्या है!  
(वसीम अकरम से बातचीत पर आधारित)
 
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