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  • Apr 24 2019 6:42AM
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दलबदलुओं पर निर्भर होती राजनीति

प्रभु चावला
एडिटोरियल डायरेक्टर
न्यू इंडियन एक्सप्रेस
prabhuchawla
@newindianexpress.com
 
सफल नेतागण सिर्फ अपने वारिसों को गढ़कर ही अपनी विरासत टिकाऊ बना पाते हैं. चूंकि आदर्श रूप में किसी सियासी पार्टी की सक्रियता किसी खास विचारधारा से ऊर्जा पाती है, इसलिए नेताओं की विरासत पार्टी में नये झंडाबरदारों की लगातार भर्ती पर ही निर्भर होती है. पर लोकसभा के लिए वर्ष 2019 के संग्राम ने लगभग सभी राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय पार्टियों का वैचारिक दिवालियापन उजागर कर दिया है. 
 
हालांकि उनके शीर्ष पर बड़े-बड़े नेता बैठे हैं, पर वे अपने ही काडर से जीतनेवाले उम्मीदवार तलाश पाने में असमर्थ हैं. वाम दलों को छोड़कर बाकी सभी पार्टियों को ऐसे व्यक्तियों की खोज है, जिनका बाहुबल, धनबल अथवा उनका सामुदायिक बल, न कि उनकी वैचारिक संबद्धता, उनकी जीत पक्की करता हो. भाजपा एवं कांग्रेस दोनों पार्टियां जमीनी प्रचार की अपेक्षा दूसरी पार्टियों के ऐसे उम्मीदवारों की खरीद पर ज्यादा धन खर्च कर रही हैं. विचारधारा मर चुकी. व्यक्ति की अहमियत अमर हो चली है.
 
यह एक विडंबना ही है कि 135 वर्ष पुरानी कांग्रेस और 11 करोड़ सदस्यों वाली विश्व की सबसे बड़ी पार्टी भाजपा लोकसभा की कुल सीटों के लिए 542 उम्मीदवार भी नहीं तलाश सकतीं और दोनों में से कोई इन चुनावों के कुल सात चरणों में दो के संपन्न हो जाने के बाद भी अपने उम्मीदवारों की संपूर्ण सूची प्रकाशित नहीं कर सकी है. स्पष्ट है कि मुख्य धारा की राष्ट्रीय पार्टियां भी विचारधारा अथवा अपने प्रदर्शन की बजाय सिर्फ गठबंधनों तथा व्यक्तिगत एवं सामुदायिक रूप से प्रभावशील उम्मीदवारों की ही आस लगा रखी हैं. 
 
वरना कांग्रेस तथा भाजपा दोनों के लिए इस बात का क्या औचित्य हो सकता है कि वे दिल्ली तथा हरियाणा के लिए अपने सभी उम्मीदवार ससमय घोषित नहीं कर सके? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह वर्ष 2014 के अपने वायदों की भरपाई पर गर्व प्रकट करते हुए बड़ी-बड़ी रैलियों को संबोधित कर रहे हैं. इसी तरह कांग्रेस भी सत्ता में आने पर न्याय करने के प्रण प्रकट करने का एक भी मौका नहीं छोड़ रही. 
 
पर दोनों में से किसी को भी यह यकीन नहीं कि उनके आजमाये और वफादार कार्यकर्त्ता अपनी व्यक्तिगत स्वीकार्यता तथा विश्वसनीयता के बूते जीत सकते हैं. केरल में तो भाजपा अपनी चुनावी संभावनाओं की बेहतरी के लिए कट्टर मार्क्सवादियों का और कांग्रेस संघी-भाजपा पृष्ठभूमि के दलबदलुओं का भी स्वागत करने को तैयार है. 
 
पिछले दो दशकों के दौरान पार्टी झंडों के रंग भले ही न बदले हों, पर उनके मानव संसाधन में नाटकीय परिवर्तन आ चुका है. चुनावी मौसम में सियासी व्यापार की यह प्रक्रिया और भी तेज हो उठती है. भारत के दो-तिहाई राज्यों से भी अधिक पर शासन करनेवाली भाजपा ने पिछले ही सप्ताह गोरखपुर सीट के लिए कांग्रेस के एक दलबदलू को चुना. 
 
यह वही सीट है, जिसका प्रतिनिधित्व यूपी के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ पिछले पांच कार्यकालों से करते आ रहे थे. इसी तरह, सपा-बसपा महागठबंधन के उम्मीदवार के विरुद्ध उनका जवाब भोजपुरी फिल्मों के पुराने पड़ चुके नायक रवि किशन पर टिका है. वर्ष 2017 के उपचुनाव में विजयी संयुक्त विपक्षी उम्मीदवार प्रवीण निषाद को अब भाजपा ने अपना लिया और उन्हें संत कबीर नगर से अपना प्रत्याशी बना डाला. पूर्वी यूपी को संघ का गढ़ माना जाता है. 
 
फिर भी भाजपा को अपने कार्यकर्ताओं के बीच इस सीट को भरने हेतु कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल सका. सो एक बार फिर वह पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के विरुद्ध आजमगढ़ से भोजपुरी सिनेमा के ही एक अन्य नायक निरहुआ को उतारने के सिवाय कुछ और न सोच सकी. पूर्व सिने तारिका तथा समाजवादी समर्थक जयाप्रदा को भी इस बार उसने अपना उम्मीदवार बना रामपुर से खड़ा कर दिया.  
 
इससे भी बढ़कर अचरज की बात इसके द्वारा आतंकी अभियुक्त साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के विरुद्ध उतारना है. 
 
भोपाल पारंपरिक रूप से ही संघ के प्रभाव क्षेत्र में रहा है. आजादी के बाद से अब तक 16 लोकसभाओं के लिए संपन्न आम चुनावों में जनसंघ या भाजपा के उम्मीदवार यहां से 10 दफा विजयी हो चुके हैं और उसके उम्मीदवारों ने औसतन 50 प्रतिशत से भी अधिक मत प्राप्त किये हैं. 
मध्य प्रदेश में इस निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व उमा भारती एवं कैलाश जोशी जैसे पूर्व मुख्यमंत्री भी करते रहे हैं. इस बार मुख्यमंत्री कमल नाथ ने दिग्विजय सिंह को यहां से उम्मीदवारी के लिए तैयार कर भाजपा को चकित कर दिया और भाजपा ने अपने कई वरिष्ठ तथा प्रतिबद्ध नेताओं की दावेदारी उपेक्षित कर साध्वी को यहां से अपना उम्मीदवार बनाकर अपनी विश्वसनीयता तथा संगठनात्मक कमजोरी ही उजागर कर डाली. 
 
इसी तरह, कांग्रेस एवं अन्य पार्टियां भी बाहरी तत्वों को पटाने में पीछे नहीं हैं. कांग्रेस ने करिश्माई बॉलीवुड अभिनेता और तीन दशकों से भाजपाई रहे शत्रुघ्न सिन्हा का खुशी-खुशी स्वागत किया. समाजवादी पार्टी ने भी सिन्हा की पत्नी पूनम सिन्हा को गृह मंत्री राजनाथ सिंह के विरुद्ध लखनऊ से अपना उम्मीदवार बना लिया.  
 
कोई भी राज्य अथवा पार्टी व्यक्तिपूजन संस्कृति का अपवाद नहीं रही. उत्तर-पूर्व में भाजपा के चमत्कारिक विस्तार का मार्ग प्रशस्त करनेवाले असम के वित्तमंत्री हेमंत बिस्वाशर्मा ने 25 वर्षों तक कांग्रेसी रह 2015 में भाजपा का दमन थामा. संभव है, पश्चिम बंगाल तथा ओड़िशा में भाजपा की प्राथमिक सदस्यता में भी वृद्धि हुई हो, पर उसके उम्मीदवारों में बड़ी तादाद स्थानीय सत्तारूढ़ पार्टियों से दलबदल कर आये नेता ही हैं. 
 
राहुल ने स्वयं भी विलय तथा अधिग्रहण की कला में महारत हासिल कर ली है. राष्ट्रीय नेताओं द्वारा स्थानीय नेताओं को ज्यादा ऊपर न उठने देने की कोशिशों ने बड़ी संख्या में जाति तथा क्षेत्र आधारित पार्टियों को जन्म दिया. कुल लगभग 300 छोटी पार्टियों में से 200 के करीब का जन्म उन व्यक्तियों द्वारा हुआ है, जिन्होंने अधिक लाभ के लिए अपने राष्ट्रीय अथवा क्षेत्रीय संगठन छोड़ दिये.
 
वर्ष 2019 का यह एक चिंताजनक घटनाक्रम है, जिसमें राष्ट्रीय स्तर के कद्दावर नेतागण भी अपनी जीत के प्रति पक्के न रहते हुए पेशेवर दलबदलुओं से सौदेबाजी को बाध्य हैं. सत्ता की अपनी भूख में वे भविष्य के लिए नैतिक तथा वैचारिक आधार पर एक नये नेतृत्व के पोषण एवं विकास की कला भुला बैठे हैं. 
 

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