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  • Jun 12 2019 7:29AM
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सांस्कृतिक मुहिम की जरूरत

डॉ अनुज लुगुन 
सहायक प्रोफेसर, दक्षिण बिहार केंद्रीय विवि, गया
anujlugun@cub.ac.in
 
प्राचीन भारत में मगध की धरती ने तर्क और बुद्धि की बात को पूरी दुनिया में आंदोलन की तरह प्रसारित किया था. प्राचीन भारत में वैदिकों की आस्थावादी कर्मकांडी व्यवस्था के खिलाफ आंदोलन करनेवाले बुद्धिवादी दर्शन की जन्मस्थली मगध ही रही है. बुद्ध, जैन और आजीवक जैसे नास्तिकवादी संप्रदायों की तपोभूमि मगध रही है. 
 
राजगीर और उसके आस-पास की धरती इसकी ऐतिहासिक गवाह है. 483 ईपू प्रथम बौद्ध संगीति भी राजगीर में ही हुई थी. पिछले कुछ वर्षों से सवाल उठता रहा है कि आज जब उपर्युक्त संप्रदाय जनता के बीच लगभग प्रभाव में नहीं हैं, तब क्या मगध की वह तार्किकता और बौद्धिकता समाप्त हो गयी है? क्या वह विचार और दर्शन अब नहीं रह गया है? 
 
पिछले दिनों एक कार्यक्रम के सिलसिले में राजगीर जाना हुआ था. मगध के कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस आग्रह के साथ एक वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने का निवेदन किया था कि यह केवल वैवाहिक कार्यक्रम नहीं है, बल्कि ‘सांस्कृतिक मुहिम’ है. उस वैवाहिक कार्यक्रम में शामिल होने के बाद मुझे फिर से मगध की तार्किकता और बौद्धिकता के इतिहास पर विचार करने के लिए विवश होना पड़ा है.
 
भारतीय सामाजिक जीवन में ‘विवाह’ सामाजिक ढांचे के अंदर की मजबूत संस्था है. हमारे यहां पुराने समय से ही विवाह की कई पद्धतियां रही हैं. अाज भी विवाह की कई पद्धतियां हैं, लेकिन उन सबमें कर्मकांड, प्रदर्शनप्रियता और फिजूलखर्च है. वर-वधू के रिश्ते की बात की शुरुआत से लेकर विवाह के समापन तक कर्मकांड, अंधविश्वास और पाखंड की जड़ें इतनी गहरी हैं, और उन्हें इस तरह आत्मसात किया गया है कि वे सामान्य तौर पर हमें दिखायी ही नहीं देती हैं. 
 
ब्राह्मण परंपरा में तो ‘कुंडली’ ही रिश्ते की प्राथमिक कड़ी है. कुंडली मिलेगी तो बात बनेगी, अन्यथा नहीं. अगर कुंडली मिलान के दौरान लड़की ‘मांगलिक’ निकली तो लड़की के साथ ही उसके परिवार वालों पर आफत आ जाती है. मांगलिक लड़कियों के विवाह के जो उपाय ब्राह्मण पद्धति में बताये जाते हैं, उसमें न तार्किकता है और न ही कोई वैज्ञानिकता. उत्तर भारतीय समाजों में तो विवाह व्यवस्था ही अन्यायपूर्ण एवं सामंती लक्षणों से भरी हुई है. बाराती ऐसे आते हैं जैसे कि वे सामंत हों. उनके नाज-नखरों के तले लड़की वाले दबे रहते हैं. 
 
केवल धर्म और संस्कृति के नाम पर इस तरह के रस्मों का पालन किया जाता है. ‘तिलक-दहेज’ को तो अब लगभग सभी पद्धतियों, धर्मों और समुदायों ने स्वीकार कर लिया है. यहां तक कि वैवाहिक मामलों में सहज और उन्मुक्त रहनेवाले आदिवासी समाज की ‘गोनोंग’ प्रथा में भी अब कुरीतियां घुसने लगी हैं. यह मुख्यधारा की पद्धति से इस मामले में भिन्न है कि इसमें लड़की वालों को लड़के वाले मूल्य चुकाते हैं. 
 
इस तरह की वैवाहिक रस्में कर्मकांड और अंधविश्वास की उपज हैं. पुरोहितों का तर्क यह होता है कि रस्म पूरा किये बिना जीवन सुखी नहीं होता है. लेकिन, इस तर्क का क्या किया जाये, जिसमें पूरा परिवार ही बोझ से दब जाये? हमारे समाज में स्त्री उत्पीड़न और भ्रष्टाचार की जड़ें हमारी विवाह पद्धतियों से भी जुड़ी हुई हैं. 
 
आमतौर पर माना जाता है कि गरीब और अशिक्षित लोग ही अंधविशवास और पाखंड को बढ़ावा देते हैं, लेकिन कथित सभ्य और शिक्षित लोग भी इससे मुक्त नहीं है. 
 
कितनी बड़ी विडंबना है कि जो लोग दहेज प्रथा के विरुद्ध निबंध लिखकर अफसर बनते हैं, वे तक दहेज से मुक्त नहीं है. अब तो जो जितना बड़ा ओहदा वाला अधिकारी होता है, उसके दहेज की रकम भी उतनी ही भारी-भरकम होती है. दहेज निरोधक कानून के बावजूद समाज में यह धड़ल्ले से न केवल प्रचलित है, बल्कि इसे लोग ‘स्टेटस सिंबल’ की तरह देखते हैं. 
 
ऐसे दौर में राजगीर में संपन्न उस वैवाहिक कार्यक्रम की तार्किकता और सार्थकता अच्छी लगती है. थकाऊ और उलझाऊ कर्मकांड के बजाय सीधे सरल तरीके से वर-वधू को बाराती-और सराती ने मिलकर शुभकामनाएं दीं. 
 
वर-वधू समेत दोनों पक्षों ने सामाजिक असामनता, अंधविश्वास और गरीबी दूर करने की प्रतिज्ञा की. सबसे विलक्षण तो स्त्रियों द्वारा गाये जा रहे विवाह के गीत थे, जिनमें शोषण से मुक्ति, गरीबी, अशिक्षा दूर करने और समानता लाने के बोल थे. ऑर्केस्ट्रा या मंचीय नाच जैसी सामंती अश्लीलता के बजाय जनता को जागरूक बनानेवाले नाटकों का मंचन दुर्लभ था. फिल्मी गीतों के बजाय जनगीत ज्यादा सार्थक थे. उपहारों की जगह वहां उपस्थित जन सांप्रदायिकता एवं जातिवाद के विरुद्ध समतामूलक समाज के निर्माण के लिए अपना पक्ष रखकर वर-वधू को शुभकामनाएं दे रहे थे.
 
मगध क्षेत्र में अर्जक संघ एवं युवक संघ जैसी सामाजिक संस्थाएं इस तरह की सांस्कृतिक मुहिम चला रही हैं. इनके द्वारा संचालित विवाह पद्धति दहेज मुक्त होती है. महिलाएं भी विवाह करा सकती हैं. प्रतिज्ञा, माल्यार्पण, शुभकामना जैसे तीन सामान्य चरणों में विवाह पूरा हो जाता है. अर्जक संघ का जातिवाद के खिलाफ आंदोलन का अपना इतिहास है. बिहार में यह शहीद जगदेव प्रसाद के नेतृत्व में अपने रेडिकल विचार के साथ प्रसारित हुआ है. 
 
इसे देख लगता है कि मगध की धरती में अब भी तार्किकों का अस्तित्व है. मानववादी होने की बात कहनेवाली ये संस्थाएं भले ही कम हों, लेकिन उनके इतिहास की जड़ें मजबूत हैं. हम इनसे तर्क और विचार लेकर मौजूदा कर्मकांडों और पाखंडों से मुक्त होने की लड़ाई लड़ सकते हैं.
 

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