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  • Mar 15 2019 5:06AM
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देश में देशभक्ति की वापसी

तरुण विजय

वरिष्ठ नेता, भाजपा

tarunvijay55555@gmail.com

ऐसा कभी हुआ नहीं कि भारतीय वायुसेना अधिकृत ट्विटर पर अपने वायुवीर अभिनंदन वर्तमान की प्रशस्ति में लिखी कविता प्रसारित की हो. देश के मीडिया ने उसे मान्य किया, उसकी खबर छापी. यूं तो हमारे देश में देशभक्ति का जज्बा हमेशा विद्यमान रहा ही है. पर यह भी कटु सत्य है कि सामान्यत: दरबार में हाजिरी लगानेवाले रायबहादुर और रायसाहब लोग ऐश और विलास करते रहे, जबकि भगत सिंह फांसी पर चढ़ते रहे. 

आज माहौल बदला हुआ है. देशभक्ति सिर्फ सीमा की रक्षा में प्राण देना मात्र नहीं, दुश्मन के घर में घुसकर आतंकी अड्डे तबाह करना मात्र नहीं, बल्कि मीडिया के अवतारों में राष्ट्रीय विश्वास पर हो रहे हमलों का करारा जवाब देना भी है. पहली बार सेकुलर कहे जानेवाले उस वर्ग को मुंह छुपाये रक्षात्मक होना पड़ रहा है, जो सात दशकों से देश के बौद्धिक आकाश में एकछत्र राज और प्रभुत्व जमाये हुए था. 

देश की बहुसंख्यक जनता हिंदू है- इसी कारण कुछ लोगों को सभी मतों, संप्रदायों को समान अधिकार, अवसर और हिंदुओं पर क्रुद्ध होने, उनका मजाक उड़ाने के भी अधिकार प्राप्त हैं. पूरे देश में दो लाख से ज्यादा कश्मीरी मुसलमान छात्र-छात्राएं या तो गृह मंत्रालय से छात्रवृत्ति पाकर या अपने खर्च पर पढ़ने के लिए देश के विभिन्न नगरों में जाते हैं और इनमें शाल, कश्मीरी हस्तकला के व्यापारी, निजी व सरकारी दूरदर्शन मीडिया में कार्यरत कश्मीरी संवाददाता भी शामिल हैं. 

एक दुर्भाग्यजनक घटना लखनऊ में होती है, तो उसे सेकुलर मीडिया 'कश्मीरियों पर हमला' कहकर पूरे देश पर थोप देता है. लेकिन, पूरे देश में कश्मीरी सुरक्षित और निर्भय काम करते आ रहे हैं- इनकी कोई चर्चा नहीं होती. मैं स्वयं देहरादून में कश्मीरी मुस्लिम छात्राओं से मिला था, उन्हें उस वक्त पुलिस ने हर सुरक्षा दी थी. 

राफेल विमानों का मामला ऐसा ही एक अन्य उदाहरण है. वे सब जो विभिन्न आर्थिक अपराधों, घोटालों में अभियुक्त बने हैं या अदालती और जांच एजेंसियों के घेरे में हैं, जिन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने में कभी दिलचस्पी नहीं दिखायी, आज क्यों लामबंद हो गये? अपुष्ट आधार पर शक पैदा कर वे भारतीय सैन्य बल का मनोबल बढ़ा रहे हैं या भारत के शत्रुओं का? पर आम तौर पर उन्हें जो शाब्दिक प्रहार झेलने पड़े, इसके वे आदी नहीं थे. 

हिंदुओं को अपमानित कर देश वैसे ही नहीं चलाया जा सकता, जैसे किसी भी जाति या मतावलंबी को तिरस्कृत कर संविधान बचाया नहीं जा सकता. विभिन्न दलों व क्षेत्रों में हिंदू मानस भारत की शक्ति है, कमजोरी नहीं. 

पर आज तक हिंदू संवेदनाओं का अपमान प्रगतिशील का मानक बना हुआ था. अब खबरें बनती हैं कि पहली बार इस देश के प्रधानमंत्री ने कुंभ में डुबकी लगायी या काशी विश्वनाथ धाम का भूमि पूजन किया. अमेरिकी जनता को पता चलता है कि भारत से एक ऐसा प्रधानमंत्री भी आया है, जो व्हॉइट हाउस के शानदार डिनर में नवरात्रों का व्रत होने के कारण केवल पानी पीता रहा और न्यूयार्क, लंदन, जेद्दाह, दुबई से शंघाई तक भारत की भाषा में बोलता रहा. 

जिन कश्मीरी मुसलमानों ने वहां के हिंदुओं को निकाले जाने के समय सन्नाटा ओढ़े रखा, वे आशा करते हैं कि शेष देश में हिंदू उनके साथ प्रेम और आत्मीयता का व्यवहार करेंगे. वैसा तो होता ही है.

पर क्या आज तक एक भी कश्मीरी मुस्लिम या दिल्ली के सेकुलर पत्रकार ने पांच लाख हिंदुओं के कश्मीर से बर्बरतापूर्वक किये गये निष्क्रमण का विरोध किया और मुस्लिम जेहादियों को कठघरे में खड़ा किया? 

देशभक्ति अब हिंदू उदय के साथ जुड़कर अधिक प्रभविष्णुता पा गयी है. संविधान की सर्वोच्चता, राष्ट्र में हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई के नारे का धरातल पर सच होना केवल तब तक संभव है, जब तक भारत में हिंदू बहुसंख्यक हैं.

जिस दिन हिंदू अल्पसंख्यक होने की तरफ मुड़ गया, भारत अभारत हो जायेगा. यह कहना, सुनना बेतुका बतानेवाले कभी भी वर्ष 1947 के नरसंहार, मीरपुर और बहावलपुर में हिंदुओं पर हुए हमलों की पाशविकता का स्मरण नहीं करना चाहते. वे सब ओर धनाढ्य सुरक्षित बिलों में वैसे ही सुरक्षित हैं, जैसे अंग्रेजों के जमाने में रायसाहब हुआ करते थे. 

पिछले दिनों देश के एक वरिष्ठ राजदूत के साथ सायंकालीन रिसेप्शन में बातें हुईं. वे बोले- 'पहली बार भारत के प्रति देखने का वैश्विक नजरिया बदला है. 

एक ऐसा क्षण था, जब पोखरण-2 हुआ, पर पाकिस्तान के भीतर घुसकर हजार-हजार किलो के बम गिराकर लौट आना, यह भारत के लिए अविश्वसनीय है. क्योंकि अब तक भारत एक दब्बू, युद्ध के बाद भी हानिकारक समझौते करनेवाला, भ्रष्ट और विलासी राजनेताओं का देश माना जाता रहा. 

देशभक्ति भारत का धर्म है. यहां गुरु तेगबहादुर साहब 'हिंद की चादर' कहे गये- सिखों या पंजाब की नहीं. शिवाजी के नाम पर तमिलनाडु में लोग अपना नाम रखते हैं. विवेकानंद जब धर्म पर बोलते हैं, तो भारत उसमें हर वाक्य में अभिव्यक्त होता है. लोग गर्व से अपने बच्चों का नाम भारत रखते हैं. यह किसी अन्य देश में नहीं होता.

देशभक्ति अब लोकतंत्र के वर्तमान उत्सव का भी मुख्य बिंदु बनी है, तो यह शुभ है. पहली बार देश में हर नेता (हर दल से) स्वयं को बेहतर हिंदू, बेहतर देशभक्त बता रहा है. जय हो!

 

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